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संवाद भीष्म उप्रेती
एक हाथ में अखबार लिए आँखों में मोटा चस्मा चढ़ाए लाठी टेककर अनवरत सामने से आते सफेद हिमाल जैसे बृद्ध को ‘खहरे’ जैसे एक चञ्चल किशोर ने रास्ता रोककर पूछा ‘इतने सबेरे किधर चले बाबा ?’
समुद्र जैसी आँखों को किशोर उत्सुकता पर टिकाकर मुस्कुराया बृद्ध चेहरा व अनगिनत अनुभवों से गली हुई गम्भीर आवाज निकाली ‘अक्षरों को नहीँ भूल पाया मैँ समाचार तो कुछ नयाँ होता नहीँ पर अक्षर तो होते हैँ अखबार में अक्षरों के पास जाने की लालशा से अखबार खरीद लाया हूँ बेटा !’
खहरे- बर्षाकाल में पहाड़ों में बहनेवाली बेगवान नदी
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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