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समय बिम्ब

-विवश पोखरेल

            चुनाव खत्म होने  पर गरीब बृहस्पतिया ने चुनाव के दौरान इकट्ठा किए विभिन्न पार्टीयों के चुनावी झण्डे व तुलों को मिलाकर अपने सालाना जन्मे बच्चों के लिए चड्डी व गंजी सिलवा दिए । उसके इस कार्य से बच्चे तो खुश हुए ही, ‘छि! बच्चों के लिए एक जोड़ा गंजी व चड्डी भी नहीं दिलवा सकते’ कहकर उसकी बेबसी को कुरेदनेवाली घरवाली फूलमतिया के मुंहपर भी कुछ समय के लिए ताला लग गया।

      ‘बृहस्पतिया ! तुझे लोचन बाबू बुलवा रहे हैँ।’ नए नए चड्डी व गँजी पहनकर उछलकूद करते बच्चों को देखकर चिलम पी रहे बृहस्पतिया का ध्यान उसे बुलाने आए किस्ना के आवाज ने भंग कर दिया ।

      ‘कथि रे कि काम छे? अब तो चुनाव ओरागेले।’ ( क्यों क्या काम है? चुनाव तो अब खत्म हो गया।)

      ‘कि जान ओते खुशियाले घरलग छे लोचन बाबू।’ ( क्या मालूम, उधर खुशिया के मकान के नजदीक हैं लोचन बाबू) बुलवाने कि जगह स्मरण कराकर बुलवाने वजह बिन बताए चला गया किस्ना।

      ‘नमस्कार हुजुर!’ जहां बुलवाया गया था वहां पहुंचकर भीड़ को चीरते हुए नमस्कार किया बृहस्पतिया ने। मुझे क्यों बुलावाया होगा?-मन में उत्सुक था बृहस्पतिया।

      ‘क्यों रे बृहस्पतिया? तुने बदमाशी क्यों की? ऐसी बदमाशी भी करते हैँ क्या?’ उसे उपर से नीचे तक घुरकर कहा लोचन बाबू ने।

      ‘कि मालिक! हमरा तो कुछो मालूम नहीं छे, कि बात् छे?’(क्यों मालिक , मुझे तो कुछ मालूम नहीं है, क्या बात है?) लोचन बाबू के सवाल पर बृहस्पतिया के माथे पर बल पड़ गए। वह उनकी अपूर्ण भाषा समझ नहीँ सका।

      ‘नहीं, क्यों यह हमें अपमान कर रहा है ? इसे सजा मिलनी ही चाहिए।’ भीड़ में से एक आदमी चिल्लाया।

      ‘क्या हुजुर! मैं तो कुछ समझा नहीं। मैंने क्या गलत किया जो मुझे सजा दी जा रही है?’ अभी भी विस्मित खड़ा था बृहस्पतिया।

      ‘क्यों रे बृहस्पतिया, हम सुन रहे हैँ की तुने हमारे पार्टी के झंडों से अपने बच्चों के लिए चड्डी व गंजी सिलवाकर पहनाया है!’ अपने एक कार्यकर्ता ने बृहस्पतिया के खिलाफ लगाए गए आरोप का संक्षिप्त ब्योरा उगलने लगे लोचन बाबू।

      ‘हां हुजुर, अब जब चुनाव खत्म ही हो गया ते इन झंडों का क्या काम? यही सोचकर मैंने अपने नंगे बच्चों के लिए, इन टुकडों को जोड़ बटोरकर गंजी व चड्डी सिलवाया है हुजुर। इनमेँ आपकी ही नहीँ बरन दुसरे पार्टीयों के झंडे भी सामिल हैँ।’ डरते डरते सच बोलने लगा बृहस्पतिया।

      ‘इसने हमारी पार्टी का अपमान किया है!                                                                 ’ बृहस्पतिया के स्वीकारोक्ती के साथ ही आरोप लगानेवाले पार्टी के कार्यकर्ताओं का समूह उमड़ पड़ा, जिन्हें सिर्फ विवाद का विषय चाहिए था।

          ‘जिस चीज का काम खत्म हो गया हो, उसे लेकर एक गरीब ने अपने नंगे बच्चों के लिए कपड़े सिलवाए तो, इसमें क्या कुसुर है हुजुर?’ नरम पड़ गया बृहस्पतिया।

      ‘ठीक है चुनावी चिन्हों से भरे झंडों से तुने अपने बच्चों के लिए चड्डी व गंजी सिलवाए, पर क्यों हमारे ही पार्टीका अपमान करके, हमारे पार्टी के चुनाव चिन्ह को अपने बेटे के नितम्बों पर लगावाया?’ अतिरिक्त जानकारी देते हुए दूसरा गर्जा।

      स्तब्ध हो गया बृहस्पतिया। क्या बिन बुलाइ आफत आ गयी उसपर। कहां की बात कहां जोड़ते हैं ये लोग। राइ का पहाड़ बना देते हैं। यह मात्र संयोग ही था कि उन लोगों के पार्टीका चुनाव चिन्ह उसके बेटे को नितम्बों पर पड़ गया था। बेसिर पैर की बात पर उसे जिस संकीर्ण कठघरे में खड़ा किया गया था, वह अब समझ गया था। वजह थी- चुनाव में उन्हें वोट न देना। लाचार बृहस्पतिया इसी मुद्दे के कारण रोजी-रोटी के लिए ठेला भी न निकाल पाया आज। मरे हुए बछडे़ को पड़ोसी के बगीचे में लटकाकर क्षतिपूर्ति माग करनेवालों के सामने पराजित हो गया बृहस्पतिया।

      ‘तुने जानबुझकर ऐसा किया है या नहीं?’ अपने कार्यकर्ताओं की शिकायत सुनकर निर्णय सुनाने बैठे लोचन बाबू ने सफाइ के लिए एक मौका दिया उसे।

      ‘हुजुर मैंने जानबुझकर ऐसा नहीं किया, क्षमा करें मैं अभी जाकर उन्हे फाड़ देता हूं या जला देता हूं।’ अपने उपर अप्रत्यासित रूप से लगे अभियोग से थरथर कांप रहा था बृहस्पतिया। उत्तेजित भीड़ उसके शब्द शब्द पर टूट रही थी। ‘ओए साले बृहस्पतिया, अब तू हमारे चुनाव चिन्ह अंकित झंडों को फाडे़गा.......... जलाएगा...?’ बृहस्पतिया के शब्दों ने दूसरी आफत को न्यौता दिया। उसके अच्छे शब्द भी अब प्रतिकूल हो उठे।

      ‘हम कुछ नहीं जानते! तुने हमारा चुनाव चिन्ह नितम्बों पर ही क्यों लगाया? बता! स्पष्टीकरण दे!’ सभी एक ही बात की रट लगा रहे थे। मूर्खों की जमात बड़ रही थी, धीरे धीरे बृहस्पतिया के खिलाफ। उसे मुसिबत में फसाने को उद्दत थी भीड़।

      ‘हुजुर मैंने सब पार्टीयों के झंडे जो इकठ्ठे किए थे उन्हे सिलवाने टेलर मास्टर को दिया था। उसीने आपका चुनाव चिन्ह चड्डी के पिछे लगवा दिया। इसमे मेरा कुसुर नहीं है।’ अब बृहस्पतिया अपनी खैरियत बचाना चाह रहा था। नम्रता के कितने ही शब्द बोलने पर भी किसी का दिल न पसीजता देख, पूरी जिम्मेदारी टेलर मास्टर पर डालकर लम्बी सांस लेकर बृहस्पतिया ने कहा ‘उफ! क्या आफत है!‘

      ‘कौन से मास्टर से सिलवाया है तुने?’ बात और जोर पकड़ने लगी।

      ‘सुलेमान मास्टर हुजुर, सिरौचिया में रहता है।’ दो हाथ जोड़कर कहा बृहस्पतिया ने।

      ‘उसको भी बुला ला।’ गवाही व प्रमाण लेने लगे थे वे लोग।

      ‘इसके कौन से लड़के ने पहना है हमारी पार्टी का चुनाव चिन्हवाला चड्डी?’दूसरा सवाल बरसाया गया।

      ‘हमरा छोटका बेटा ने हुजुर।’ बड़ा अपराधी सा खड़ा था बृहस्पतिया।

      डरते डरते सुलेमान मास्टर आ पहुंचा। टिङ्......टिङ्..... अपने कटिसूत्र पर लट्के हुए छोटे  घंट को हिलाते हुए विवादास्पद चड्डी पहना हुआ बृहस्पतिया का छोटा लड़का भी सबूत प्रमाण लेकर हाजिर हो गया।

      ‘अब देखिए, सबलोग, हमने क्या ऐसे ही कहा था क्या? यह हमारे पार्टीको सीधा डोमिनेट कर रहा है।’ अब बृहस्पतिया के अभियोग में अंग्रेजी भी आ धमकी। बृहस्पतिया के बेटे को देखकर सब खड़े हो गये, यह चड्डीवाला मुकदमा सबके लिए मनोरंजक बन गया था। वह लड़का गंजी भी पहने हुए था पर उसमे दुसरे पार्टीयों के चुनाव चिन्ह थे। उसकी चड्डी के नितम्बवाले भाग मे वही पार्टी का चुनाव चिन्ह था जो यह सब कर रही थी।

      ‘साले तू दूसरे पार्टीयों के चुनाव चिन्हवाले कपड़े से गंजी सिलवाता है और हमारे ही पार्टी के चुनाव चिन्हवाले कपड़े से चड्डी?’ भीड़ और गरम हो रही थी।

      ‘ए मास्टर ! इस लड़के का चड्डी तूने सिया है क्या?’ अब गुस्सा टेलर मास्टर पर भी बरसने लगा।

      ‘यह तेरा लड़का है बृहस्पतिया?’ कुछ देर गम्भीर हुआ सुलेमान मास्टर। उसने सीधे खड़े वही चड्डी पहने छोट्के को देखा और बृहस्पतिया की तरफ ताकने लगा।

      ‘हां, यह मेरा छोटा लड़का है।’ बृहस्पतिया  ने अपने बेटे का परिचय दिया तो, स्वीकार करते हुए सुलेमान बोला ‘हां हुजुर, यह चड्डी मैंने ही सिया है।’

      ‘तू हमारे पार्टी का अपमान करता है? दूसरे पार्टीयों के चुनाव चिन्हवाले कपड़े से गंजी और हमारे पार्टी के चुनाव चिन्हवाले कपड़े से चड्डी?’ एक आदमी उठकर सुलेमान का गर्दन दबोचने लगा।

      ‘मुझे बृहस्पतिया ने कुछ झंडे व तुल दिए थे गंजी और चड्डी सिलवाने के लिए, टुकड़ों को जोड़कर सिते वक्त आपकी पार्टीका चुनाव चिन्ह चड्डी में पड़ गया। मैंने जानबुझकर ऐसा नहीं किया है, धोने पर चला जाएगा हुजुर!‘ भयभीत सुलेमान ने अपना गर्दन छुड़ाया।

      ‘धोने पर चला जाएगा? तू हमें सिखाता है? न धोने तक क्या होगा?‘ अब सारा गुस्सा टेलर मास्टर पर बरसने लगा।

      ‘ये झंडे व तुल ऐसे ही फाड़ने या फेंकने के बदले इनसे मैंने अपने नंगे बच्चों का लाज ढककर अच्छा ही किया ना हुजुर? कुछ गलत कहा तो क्षमा करें।’ अपने दिल की बात को सामने रख दिया बृहस्पतिया ने। वोट न देने पर बदला लेने को जमा हुए इस भीड़ में बृहस्पतिया ने अपनी तरफ से जितनी दलीलें दी सब बेकार। अन्ततः उसने और विद्रोह करके उस जगहको कुरूक्षेत्र बनवाना नहीं चाहा। मौसम धीरे धीरे धुंधला रहा था। मौसम के साथ ही गुस्सा आसमान छू रहा था।

      ‘साला नेता बनता है!’ न चाहते हुए भी एक मुक्का सहना ही पड़ा बृहस्पतिया को।

      ‘फाड़ो इस चड्डी को’ भीड़ उसके बेटे पर टूट पड़ी। अपनी पार्टीका चुनाव चिन्ह नितम्ब में - यह बात उन लोगों के गले के नीचे नहीं उतर रही थी। उनके हाथ कौरव के हाथ बनकर बृहस्पतिया के लड़के  के चड्डी पर टूट पड़े। द्रौपदी का पर्याय बना हुआ था लडका। चड्डी पकड़कर रोने लगा ‘हुआं....हुआं...’ उसका अवोध बालमन चड्डीवाला मामला समझ नहीं पाया। उधर बृहस्पतिया मौन बिद्रोह कर रहा था प्रतिकूल समय के खिलाफ ‘समय मूर्दावाद।’

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 


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