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प्रारब्ध
--विवश
पोखरेल
इतने सालों
बाद तुमसे यूं अचानक मुलाकात होगी कभी सोचा नहीं था मोना !
परिचित के साथ मौन रहकर अपरिचित के साथ जैसे पूरी रात
गुजारना कितना कष्टकर होता है यह मैंने जाना। सच !
तुम्हारे साथ बिताई हुई यह रात मुझे एक साल से भी ज्यादा
लम्बी लग रही है। हां, सफर में अनेक सहयात्री मिलते हैं
और फिर बिछड़ते हैं। शायद इसी से सुख या दुःख जन्म लेते
हैं। जैसे सफर में सौन्दर्य से सम्मोहित आंखें, आंखों में
स्मृति के परिदृश्य सच में दूर होने को बाध्य हैं, उसी तरह
एक नदी की तरह विवशता के किनारों को भेदकर बिन रूके बह
जाता है समय भी।
आज की
मुलाकात ने मुझे एक दशक पीछे धकेल दिया है। मैं अतीत का
आइना देख रहा हूं। और न चाहते हुए भी मैं तुम्हारे साथ
बिताए हुए क्षण याद करने को विवश हूं। इस वक्त मैं
तुम्हारे साथ हूं बस में- ए लम्बी यात्रा के लिए। मेरे लिए
बस की खिड़की से दिखनेवाली काली रात गुजरे हुए समय की
परछाई देखने के लिए परदा बन गई है। मैं आंख बंद करके याद
कर रहा हूं, उस वक्त के पहाड़, वे कुहरे, गुरांस के फूल,
नदियां और उनके किनारे। तुम्हारे साथ नदी-किनारों में
जल्दी पहुंचने की चाह मन में संजोकर घने जंगलों और
झाड़ियों भेदते वक्त बेर की झाड़ियों में उलझे तुम्हारे
बाल, और उन्हे छुड़ाते हुए बिता हुआ पूरा दिन। खुले बाल
झाड़ियों में उलझ जाने की पीड़ा में गुलाब के पत्रों से एक
एक कर गिरते ओस के बूंद जैसे तुम्हारी आंखों से गिरते
स्निग्ध आंसू ! वाह ! कितना सुन्दर था वह वक्त। बारिस से
पूरी तरह भीग जाने पर भी छतरी ओड़ने का भ्रम पालकर छोटी सी
छतरी से शर ढक कर चलते हुए वक्त का रोमांचक क्षण। उस वक्त
हमें लगता था, जीवनभर ऐसे ही एकाकार जिएंगे। एक ही नाव के
यात्री हो कर, एक सुन्दर फूल और उसमें अपने आपको रंगकर। पर
जीवन क्योंकर कहां फिल्म के दृश्यों होने लगा, मोना ! कहां
जीवन अपनी इच्छाओं से चलता है। अचानक आ पड़नेवाले तूफान
जीवन को, आदमी के सपनों को, इच्छाओं को आकांक्षाओं को क्षत
विक्षत कर देते हैं। इतने वर्षों तक भूले हुए अतीत को
तुमसे मिलने पर फिर ताजगी मिली है। मैं अपने उमर में दश
वर्ष कम पड़ गया हूं और तैर रहा हूं स्मृति के पोखर में।
अपने जीवन से इस तरह जुडे हुए अतीत को कैसे इतनी आशानी से
भूलाया जा सकताहै
पहले तो मैं
तुम्हें सिर्फ बस के एक सहयात्री की तरह देख रहा था, फिर
कुछ हैरानी हुई। थोड़ा संकोच, थोडा अपराधबोध, फिर थोड़ी सी
लज्जा से मेरा शर झुक गया। इतने वर्षों बाद भी तुम कुछ
नहीं बदली थी। तुम वही पहलेवाली मोना थी। उतनी ही सौम्य,
सुन्दर और शिष्ट। तुम्हें अपने पास पाकर पहले तो बहुत खुसी
हुई, फिर न जाने क्यों दुःख भी हुआ। उफ ! कैसे व्यतीत करूं
यह लम्बा सफर- कुछ कठिनाई होने लगी। एक मन से सोचा क्यों न
दूसरी जगह जा बैठूं। पर पूरे बस में कहीं भी सिट(जगह) खाली
नहीं थी। दशहरे का समय था, जहां तहीं यात्री भरे पड़े थे।
मुडे में स्टुल में जहां देखो वहीं। किसी के साथ सिट बदला
भी तो जा सकता है, यह भी नहीं सोचा मैंने। तुम क्या कहोगी
! डर गया मैं। फिर खड़े होकर भी तो जाया नहीं जा सकता था।
बारह घंटे की इस यात्रा को समय और परिस्थितिने अठारह घंटे
या बीस घंटे का बना दिया था। और फिर निर्लज्ज लकड़ी के
कुन्दे के समान, एक अचेत लठ्ठे की तरह अपरिचित बना मैं
तुम्हारे साथ बैठने को बाध्य था मैं। पुरे सफर में न तो
मेरी बोली फूटी न ही तुम ने कुछ कहा। ठी ही तो है, मैं
क्या बोलता, मैंने कहां कुछ कसर बाकी छोड़ा था। अब हम
दोनों कल के एक दिल दो बदन तो थे नहीं। कल का आकाश और आकाश
के नीले रंग तो थे नहीं। अब हम एक नदी के दो किनारे थे।
जिसके पार जाने को न कोई पुल था न ही कोइ दूसरा उपाय।
मोना ! मैं
सदा अपराध बोध अनुभूत करता हूं। इतने बरस बीत गए लेकिन फिर
भी अपनी गलती और दुर्बलता के कांटे लगातार चुभते हैं।
चिकोटी काटते हैं, मुझे तकलीफ देते हैं। जिन्हें याद करते
वक्त यदाकदा मैं लज्जित हो जाता हूं। दूसरों को झूठ ही सही
पर अपने आप से तो झूठ नहीं बोला जा सकता। हां मुझे वैसा
नहीं करना चाहिए था। इतना क्रूर, इतना कठोर , इतना निष्ठुर
नहीं बनना चाहिए था मुझे। मेरे तुम्हारे संबधको गुड़ियों
का खेल नहीं समझना चाहिए था। मुझे क्या पता ? मेरे
पसन्दीदा फूल में किसी और के आंखें गड़ जाएंगी। मैं जिसे
कली समझता था वह फूल में तब्दील हो गई यह भी तो मैं नहीं
जानता था। मुझे लगता था समय लगातार अनुकूल है मेरे लिए।
मैं हमेशा सोचा करता था कि हमारा प्रेम को जीत पाना समय के
बूते के बाहर है। हम आशानी से समय को जीत जाएंगे। पर मोना
! वो तो नहीं हुआ। फिर तुम्हारे आग्रह- "तुसार चलो भाग
चलें, मेरी शादी की बात चल रही है।" - ने मुझे स्तब्ध कर
दिया था। तुम्हारी शादी किसी और से, यह बात तो कल्पना से
परे थी और यही घटना दुर्घटना बनकर रह गई हमारे जीवन में।
उफ ! मेरी नामर्दी ! तुम जितनी जांबाज भी नहीं निकला मैं।
मर्द होकर तुम जितना साहस नहीं दिखा पाया मैं। तुम्हारे
भाग जाने के प्रस्ताव के साथ मैं दूसरी जिम्मेदारी से
संयमित हो गया। उस वक्त तुम्हारे प्रस्ताव पर स्वीकृति का
मुहर नहीं लगा पाया मैं। मेरी एक मजबूरी थी। मेरे पास मेरी
विधवा मां के सपने थे। बेरोजगार और नामर्द तुम्हारे
राजकुमार के कन्धे पर दो यौवन की दहलीज लांघ चुकी बहनों की
शादी की जिम्मेदारी थी। फिर मैंने तुम्हें कहा था- "मोना !
कुछ बरस ठहर जाओ न, हो सके तो मां बाप को कन्भिन्स करो।"
पर वैसा हो नहीं सका। शायद मेरा कमजोर मन भी अपने परिवार
समक्ष प्रेमका उद्घोष नहीं कर सका, न ही तुम तुम्हारे मां
बाप को मना सकी। इसी कारण हमारा प्रेम कटी हुई पतंग और
उसकी डोर जैसा हो गया। संभवत हमारा प्रेम समय को स्वीकार्य
नहीं था।
मुझे माफ करो
मोना ! आज फिर वही घाव रिसने लगा है। पर हम दोनों ने चाहकर
यह घाव को नहीं कुरेदा है। कहते है दुनियां गोल है, यह तो
सच निकला। आज फिर जीवन के प्लेटफार्म पर तुमसे मुलाकात हो
गई। और फिर अठारह घंटे की अविश्मरणीय यात्रा मौनता में ही
गुजारी हमने। फिर यह मौन यात्रा मेरे मन में तुम्हारे
प्रति नवीन अनुभूति छोड़ गई, छु कर, सहलाकर चली गई।
बस की खिड़की
से मुझपर बरसनेवाले ठंडी हवाके झोंके तुम्हें भी आहत करते
हैं मोना। जब ठंड से मेरे हाथपैर सुन्न हो जाते थे, और मैं
उन्हे हिलाता, तब तुम मुझे बड़े प्यार से देखतीं, और मुझे
लगता तुम्हारा यह चेहरा निष्ठुर है, जो छल करता है। फिर
तुम अपनी ओढ़नी मिलाने के बहाने मेरा बदन भी पूरी तरह से
ढक देतीं। नींद के बहाने मैं चुपचाप तुम्हारे स्नेह की
अग्नि महसूस करता। जब पिछेले सिटवाले ने खिड़की का आइना
धकेला तो मेरा हाथ अटक गया था खिड़की पर। उस वक्त भी
तुम्हारी प्यारभरि नजर पड़ी थी मुझपर। जब मैं मेरे दुखती
अंगुलियों को सहला रहा था तो मैंने अनुभव किया मेरी पीड़ा
तुमपर चली गई है। लाइन होटल में खाना खाते वक्त भी कोई
जरूरत नहीं थी मोना ! फिर भी तुमने मेरे पैसे भी अदा कर
दिए। हमारा तो सम्बन्ध अपना नहीं था, हम मात्र सहयात्री
थे। हमारा सम्बन्ध आकाश और उसके नीले रंग जैसा तो था नहीं।
इसबार की यह मौन बस यात्रा मुझे एकदम अलग अनुभूति दे गई
मोना ! प्रेम का वास्तविक आनंद तो मृदु अनुभूति में होता
है न मोना ! न कि शारीरिक भोग विलास में। मैं आज तुमसे
पुछना चाहता हूं - "क्या तुम अब भी मुझसे प्यार करती हो
मोना ? सच कहो मोना।" पर मैं चारकर भी पूछ नहीं सकता।
अंधेरे को चीरते हुए बस आगे जा रही है। मैं इसवक्त
तुम्हारे और मेरे बीच का अतीत की मिट्टी खोद रहा हूं,
वर्तमान को याद कर रहा हूं और याद कर रहा हूं मेरा और
तुम्हारा प्रारब्ध।
मूल नेपाली
से अनुवादः कुमुद अधिकारी। |