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नपुंसक
ध्रुब
सापकोटा
दुर्भाग्य !
बहुत दिनों से मेरा घर खाली पड़ा
है । मेरी आमदनी का जरिया,
जीवन निर्वाह का स्रोत
!
कुछ वर्ष पहले तक मैं इस खेतीको ज्यादा महत्त्व नहीं देता
था । यह मेरी अतिरिक्त आमदनी थी । प्रमुखता पगार की थी ।
मेरा आफिस समृद्ध था । देखते-देखते
आफिस दिवालिया हो गया । मुझे अनिवार्य अवकाश देते वक्त तक
तो आफिस की पेन्सन देने की क्षमता बरकरार थी । मेरे अवकाश
ग्रहण की भी पाँच
बरस
गुजर चुके हैं । पहले पहले तो मैं यथासमय पेन्सन पाया करता
था । अब तो अनियमितता ने जगह बना ली है । सुनता हूँ पेन्सन
की व्यवस्था ही समाप्त करने की प्रक्रिया चल रही है ।
मेरा मकान दुमन्जिला है । एक में मैं रहता हूँ और दूसरा
किराए के लिए है ।
मेरे घर में किराए रहनेवाले लोग,
अपना मकान बनवाकर ही जाते हैं । मैं हर नव आगन्तुक को
सुनाता हूँ । एक आकर्षण
पेश
करता हूँ । मेरी यह शैली अब तक तो काम कर रही थी । कमरा
खाली नहीं हुआ था । पर इसबार
मेरा किराए पर चढ़ानेवाला
कमरा खाली पड़ा
है । मेरा वह आकर्षक
विज्ञापन
म्याद गुजरे दवा की तरह
हो जया है ।
बाहर
लिख देते है
'कमरा
किराए पर'
धर्मपत्नीका सुझाव है । उसके इस प्रस्ताव पर मुझे विश्वास
नहीं है ।
ऐसा नहीं है की लोग आते ही नहीं थे । कभी कभार आ टपकते थे
। थप आकर्षण
के लिए मैं कह उठता इस मकान से जानेवाले लोग इस से सुन्दर
व
बढिया
मकान बनवाकर गए हैं । जब यह नारा भी बेकाम हो चला तो
धर्मपत्नी ने बोर्ड लटकाने का सुझाव दिया । मैंने तो लोगों
को सच्ची बातें ही कही थी ।
क्यों
वे विश्वास नहीं करते
-
मैं क्या करुँ
-
‘यह
तरकीब रंग लाएगी
?’
मैं
उसे
पूछता हूँ । दूसरा विकल्प न देखकर ही मैंने यह सवाल किया
उसे ।
‘खिडकी
में और दिवाल में लटका देते हैं’
वह कह उठती है ।
मैं कागज खरीदता हूँ । लाल कलम खरीदता हूँ । मेरी हस्तलिपी
अच्छी नहीं है । नौकरी भर हस्तलेख अच्छी बनाने की जरुरत
कभी नहीं पड़ी।
नौकरी छुटने पर लिखाइ का काम पूरी तरह ठप्प हो गया ।
पहले मैंने नेपाली में ही लिखा और कागज को खिडकी में लगा
दिया । गोंद नहीं था,
भात से काम चला लिया । दूसरा कागज दिवाल पर चिपका दिया ।
अपने लिखे हुए कागज को सड़क
पर पहुँच कर आगन्तुक की तरह देखने लगा । मैं फिर कमरे
में
लौट आया । अगला कागज अंग्रेजी में तैयार किया और उसे भी
दिवाल में पहले कागज के बगल में चिपका दिया । अन्त में
धर्मपत्नी को बुलाया मैंने देखने के लिए ।
वह कहने लगी
‘विदेशी
तो आने से रहे । बेकार में स्याही और कागज जाया किया ।’
‘इसका
एक मनोवैज्ञानिक कारण तो है । यह घर किसी ऐरे गैरे का नहीं
है । आधुनिक लोगों का है ।’
मैं कह उठा
और
वह
हँसने
लगी । वह भी अपने को
'ऐरे
गैरे'
मे शामिल करने को तैयार नहीं है ।
'यह
हमारा घर पुराना ही सही लेकिन है बहुत महत्त्वपूर्ण,
इस बात को
दर्शाने
के लिए हम ने कोई
कसर बाकी नहीं छोड़ी
थी
। किराए पर देने के लिए नियम बनाए थे । जैसे,
नौकरीसुदा हो,
सपरिवार हो और किसी का सिफारिस लेकर आए । पर अब तो यह घर
बहुत दिनों से खाली पड़ा
है । हमारे बनाये नियम हम ही तोडने के लिए तैयार हैं ।
सिर्फ आदमी चाहिए-
जो किराए पर ले । अब सिर्फ यही नियम बचा है ।
‘लीजिए
इन्हें बेच दें ।’
पत्नी अलमारी से गहने निकाल कर देती है । मैं सोने के गहने
ले लेता हूँ । यह बड़ा
संकट का सूचक है ।
‘पैदल
जाइएगा ।’
वह कहती है ।
‘घण्टाभर
लग जाएगा।’
मैँ
कहता हूँ ।
‘और
क्या काम है
?’
पत्नी कहती है ।
‘बस
में गहने चारी हो सकते हैं ।’
वह मुझे सचेत कराती है ।
टैक्सी के लिए पैसे मांगने कि हिम्मत मुझ में नहीं है ।
हमारी क्षमता बायबाय कर चुकी है ।
‘लौटते
वक्त टैक्सी लेलें ।’
वह
कहती
है । उसे फिक्र है मैं ज्यादा थक न जाऊँ ।
‘उस
वक्त तो मैं पैसेवाला बन जाऊँगा,
तुम्हें
कहने की जरूरत
ही नहीं है ।’
मैं कहता हूँ ।
अब मैं सड़क पर हूँ
।
सड़क में लोगों की भीड़
है । मैं उसी भीड़
का हिस्सा बन जाता हूँ । जीवन भर मैं इसी भीड़
का हिस्सा तो था । अब इस जीवन के उत्तरार्द्ध
में क्या परिवर्तन होगा
-
इस भीड़ में कोई अन्दाजा नहीं लगा सकता हांथ-मुंह
जोड़ने
के लिए कोई गहने बेचने चला है । कोई अनुमान ही नहीं कर
पाएगा जीवन भर नौकरी करनेवाला आदमी हाथ-मुंह
जोड़ने
की समस्या से परेशान
है ।
‘गहने
गिरवी रखने है
?’
दूकानदार पूछता है ।
‘नहीं
बेचने हैं ।’
मैं कहता हूँ ।
‘ये
गहने तो बहुत अच्छे हैं ।’
वह फिर कहता है ।
‘जरूरत
होगी तो फिर
बनवा
लूँगा । मैँ जवाब देता हूँ ।
मैं रुपये लेता हूँ । मैं अब धनी बन गया हूँ । बहुत दिनों
से मैंने होटल में नहीं खाया है । मैं होटल
में
चला जाता हूँ और
नास्ता
करता हूँ । अखबार पढ़े
भी महिनों बीत गए,
पत्रिकाएँ खरीदता हूँ । सड़क में प्रतिगमन के विरुद्ध
जुलूस निकला हुआ है । टैक्सी मिलने की संभावना कम है । मैं
पैदल ही घर चला जाता हूँ । उस रात मुझे चैन की नींद आती है
।
दोपहर का समय होगा । मैं कमरे में ही पडा हूँ । घरवाली ने
चाय बनाकर दी है । कालबेल बजाता है कोई । बाहर निकलने पर
देखता हूँ अपरिचित अधेड़
है सामने ।
‘इस
मकान के मालिक आप ही हैं
?’
वह पूछता है ।
‘हाँ
मैं ही हूँ ।’
मैं जवाब देता हूँ
‘आपके
घर में कमरा किराए पर है
?’
वह फिर पूछता है ।
‘हाँ,
हैं ।’
मैं कहता हूँ ।
‘नीचे
या ऊपर
?’
वह पूछता है । लगता है विज्ञापन उसे यह बात स्पष्ट न कर
सका ।
वह कमरे देखता है । खिड़कियाँ
देखता है । उन्हें खोलता है,
बन्द करता है । बिजली के स्वीच टटोलता है । फिर वह दरवाजे
खोलता है और बन्द करता है ।
‘और
सब तो ठीक है । शौचालय व स्नानघर नीचे हैं ।
बरसात
में या रातको नीचे ऊपर
करना
तकलीफदेह है ।’
वह बोलता है ।
‘ऐसा
मैंने जानबूझकर बनवाया है।’
‘क्यों
?’
‘यहाँ
पानी की किल्लत तो आपको मालूम है । सफाई व स्वास्थ्य की
दृष्टि से कमरे से दूर बनाया है ।’
‘यह
तो कोई बात नहीं
हुई।
साफ करने से तो हो ही जाता । शायद और ही कारण हो
?’
आदमी तार्किक लगता है और स्पष्टवक्ता भी ।
‘असली
वजह जानना चाहते हैं
?’
‘कहिए
।’
‘पहले
कमरे देख लें ।’
हमलोग नीचे उतरते हैं । मैंने एक कमरे को बैठक बनाया है ।
उसी कमरे में हमलोग बैठ जाते हैं । पत्नी चाय ले आती है ।
यह स्थिति हमारे लिए बिलकुल अलग थी । पहले कभी हमने कमरा
देखने आए लोगों को चाय से स्वागत नहीं किया था । अब हम
उन्हें
सम्मान करने की अवस्था तक पहुँच गए हैं । यह एक तरफ से
अच्छा भी है,
क्योंकि इससे हमारे बीच
की दूरियाँ
मिट गई हैं ।
‘असली
वजह सुनेगें
?
जिसके घर में जाने के लिए गाड़ी
का रास्ता नहीं है वह कहता है वह कहता है प्रदूषण से बचने
के लिए मैंने घर दूर बनाया है । यह
शौचालय
और स्नानघर की बात भी बिलकुल वैसी ही है ।’
‘मैं
समझ गया । और व्याख्या की जरुरत नहीं है ।’
वह कहता है ।
हम चाय पी रहे हैं । वह आदमी कमरा लेगा या नहीं यह बात
स्पष्ट नहीं हो पाई है ।
‘कमरे
का किराया
?’
वह पूछता है । मैंने किराया पहले के मुकाबले कम बताया और
यह बात पत्नी से छिपाइ थी ।
और क्या-क्या
शर्तें
हैं
?’
उसने फिर पूछा । मुझे लगा मेरे कहे हुए किराए से वह आकर्षित
हुआ है ।
‘किराया
एडवान्स और बिजली पानीका अलग ।’
‘दूसरों
के मुकाबले आपकी
शर्तें
आकर्षक
हैं ।’
‘ऐसा
क्या
?’
‘सच
!
मेहमान नहीं आ सकते । घर का टेलिफोन इस्तेमाल नहीं कर सकते
। रात दस बजे के बाद घर में नहीं ढुकना । ऐसी
शर्तें
भी होती हैँ । मैं तो भुक्त भोगी हूँ ,
बहुत मकानों में किराए पर रह चुका हूँ ।’
‘इस
मामले में मेरा कोई सिद्धान्त नहीं है ।’
मैं उदार बनता हूँ । यह आदमी कमरा ले ले यही मेरी इच्छा है
। मैं इसे नहीं जाने दे सकता ।
‘आप
अपने मकान की क्या विशेषता देखते हैं
?’
‘इस
कमरे में रहनेवाले लोग अपना घर बनाकर ही यहाँ से गए हैं ।
यह अब तक का रिकार्ड है ।’
‘गजब
की बात है ।’
अब भी उस आदमी ने कमरा लेने की बात नहीं कही । आशंकाओं
के बादल मेरे भीतर उमड़
रहे हैं । मेरी हद की उदारता काम कर रही है या नहीं यह
देखना है । उसका परिचय लेने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि
वह निश्चय नहीं कर पा रहा है ।
जीवन में जब भी सार्थक काम तो होते नहीँ।
‘आप करते क्या हैं?’
‘मैं वकील
हूँ
।’
‘सरकारी वकील?’
‘नहीं, मैं व्यावसायिक वकील हूँ।’
‘तो आपका अपना लॉ फॉर्म है?’
‘नहीं, हमारा संयुक्त लॉ फॉर्म है।’
‘अकेले रहते हैं?’
‘मेरा परिवार है, उन्ही के साथ रहता हूँ।’
‘कौन-कौन है परिवार में?’
‘पत्नी और बच्चे हैं।’
‘बच्चे कितने हैं?’
‘पाँच लड़कियाँ।’
‘पाँच लड़कियाँ ?’
‘हाँ !’
‘अब भी बेटे की आशा सजाए हैं?’
‘यह तो नितान्त व्यक्तिगत प्रश्न पूछा आपने। मगर मैं
रूठूंगा नहीं। आपने ठीक ही कहा है।’ मैं पहले ही कह चूका
हूँ उसकी तार्किक क्षमता मुझे अच्छी लग रही है।
उसे मेरे यहाँ रहना होगा। छत्ता बढा है उसका। मेरे
बंजर जमीन पर खाद पानी देना ही होगा।
‘आदमी तो ठीक लगता है। पर बच्चे कितने ? बीवी फिर
पेट से है।’ मेरी पत्नी का चेहरा बुझा हुआ है।
‘फिक्र करने की जरूरत नहीं यह आदमी ज्यादा दिन नहीं
ठहरने वाला।’ मैंने हिम्मत बंधाई।
‘क्यों ?’ उसकी आँखें सवाल करती हैं। हमारे यहाँ
ठहरनेवाला आदमी कम से कम एक दशक तो ठहरा ही है। इसका भी
रिकार्ड है।
‘क्योंकि यह वकील है।’
‘वकील एक घर में लम्बे समय तक नहीं ठहरते क्या ?’
‘देखो ! मेरी जान, मुल्क में भ्रष्ट मन्त्री और
स्मगलर काफी हैं। उनमें से बहुतों के मुकदमे होंगे। दो चार
ऐसे मुकदमे हाथ लग गये तो यह आदमी मालामाल हो जाएगा। और
फिर अपना मकान बनवाएगा और चला जाएगा।’ पत्नी को विश्वास
करने की वजह मिल गई थी । उसे मालूम था हम जिस शहर में बसे
हैं उसका अस्तित्व ही इन्ही तीन किस्म के लोगों मे है।
वह एक बरस तक नहीं गया। मैंने सोचा, उसे आशातीत
मुकदमे नहीं मिले। फिर एक बच्ची बढ़ गई उसके परिवार में।
‘दूसरे साल तो चला ही जाएगा’ हमने सोचा। वह नहीं गया ।
तीसरे साल भी वह टीका रहा। हम उसकी वकालती पर शक करने लगे।
‘अब हम आपका घर छोड़ रहे हैं।’ चौथे साल उसने ऐलान
किया।
‘बधाई हो ! दूसरों को यह मकान छोड़कर अपना मकान
बनवाने में दश बरस लगे। लेकिन आपने तो तीन बरस में ही यह
कारनामा कर दिखाया।’
‘आपका अंदेशा गलत है। मैं अपना नया घर बनाकर नहीं जा
रहा। मैं तो अपने पुस्तैनी मकान में जा रहा हूँ।’
‘पहाड़ में?’
‘हाँ !’
‘आपने मेरे अंदेशे को गलत ठहराया। कोई भी आदमी इस
शहर में आने के बाद लौटकर नहीं गया है, बल्कि कई तो विदेश
गए हैं। अमरीका और जापान की तरफ गए हैं।’ मैंने उसे इस शहर
का तीन सौ बरस का इतिहास स्मरण कराया।
‘मैं अलग रास्ते पर चलना चाहता हूँ।’
‘बताइए, कौन सा अलग रास्ता?’
‘वह मैं अभी नहीं बताऊँगा। बताने का कोई अर्थ नहीं
है। मैं अपने गाँव लौट रहा हूँ।’
‘नहीं माड़साहब ! मुझे तो आपकी योजना बिलकुल पसन्द
नहीं आई। आपलोगों के लिए यह शहर स्वर्ग है। एक स्मगलर नहीं
तो एक भ्रष्ट मन्त्री का मुकदमा आपको मिल जाए तो, जीवन भर
के लिए काफी है। ऐसी जगह छोड़ के माड़साहब भी.........।’
‘रूपये कमाने, मकान बनवाने और मौजमस्ती करने के
अलावा और भी बहुत काम हैं इस संसार में । तरस आता है मुझे
आपकी बुद्धि पर।’ उसने मेरी बोलती बन्द कर दी।
वह अपने इरादे में खरा उतरा। अपने बीवी बच्चों के
साथ एक दिन सबेरे ही मेरा कमरा खाली कर दिया। उसकी बीवी के
आँखों में आँसू थे। बच्चियों के भी आँखें नम थीं। मेरी
पत्नी भी अपने को संभाल नहीं पाई। सब भावनाओं मे बहे जा
रहे थे।
‘आप मेरे घर आएँ। मेरी योजना क्या है अपनी आँखों से
देखें।’ उसने कहा।
यह निमन्त्रण मात्र औपचारिकता नहीं थी। वह ही नहीं
बल्कि उसके परिवार के अन्य सदस्य भी हमारे यहाँ बारबार फोन
करते। उसने पूछना नहीं छोड़ा - आप कब आएंगे?’
तीन बरस बीत गए। उसके बारबार के आग्रह के सामने खड़ा
हूँ मैं।
जीवन बिना काम के ही बीत रहा है। पर्यटक बनने का
साहस नहीं है। शहर छोड़ के कहीं गया हूँ कभी। इस बार आने
की तारिख का ही ऐलान कर दिया मैंने। उसने मुझे पता दिया
था। उसके बाल-बच्चे और बीवी के लिए उपहार खरीदे। प्लेन से
जाने से व़क्त तो कम लगता पर मैं थोड़ा बचत करना चाह रहा
था। प्रकृतिका सौन्दर्य पान करने के लिए अच्छा मौका था।
थानकोट पार करने के तुरन्त बाद ही मुझे स्वच्छ हवा का
आनन्द मिला।
मेरे लिए उसने एक अलग कमरे की व्यवस्था की। उसीके
रसोई में मैं भी खाना खा लेता। सुबह तड़के ही वह मुझे
जगाने आ जाता। दो घण्टे तक साथ टहलते। उसके बाद वह अपने
काम में लग जाता, जो पुराना ही काम था। यहाँ उसने थोड़ा सा
परिवर्तन किया था। गरीबों के मुकदमे वह मुफ्त में देखता
था। इसीलिए उसके ऑफिस में भीड़ लगी रहती थी। हर दिन हाथ
जोड़कर रोते हुए लोग मिल जाते। पैसेवालों से वह अच्छी फीस
लेता था। जिले में वह काफी लोकप्रिय हो गया था।
‘इनमें से पच्चीस फीसदी को भी न्याय दिला सका तो यह
मेरी सफलता होगी।’ उसने कहा।
जिला मुख्यालय में भी उसने मकान नहीं बनवाया था।
उसका पुस्तैनी मकान वहाँ से बहुत दूर था।
‘मेरी सम्पत्ति तो यही लोग हैं।’ गरीबों की भीड़ को
दिखाते हुए उसने कहा।
‘मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस् मैं इन लोगों को न्याय
दिलवा सकूँ।’ वह कहता था। मैंने उसकी सपने की दुनियाँ
देखी। उसके नये सिद्धान्त के मायने देखे। उसके आदर्श का
रूप देखा। उसका यह रूप मेरे मकान में रहते व़क्त कभी दिखाई
नहीं दिया था। मैं करीब एक महीना बिता चुका हूँ।
सबेरे ही मैं उसके साथ सैर के लिए निकला हूँ। घर से
कुछ ही दूरी तय कर पाए हैँ। एक आदमी सामने से आता हुआ
दिखता है। वह पास आकर उसे गोली मारता है। कई राउण्ड
फायरिंग करता है। वह गिर जाता है। मैं चिल्ला उठता हूँ और
उसे पकड़ने लगता हूँ। कई लोग जमा होते हैँ। वह मर चुका
होता है।
लाश उठवाने और उसकी बीवी को आशौच मे रखने की
तैयारियाँ हो रही हैँ। सब रो रहे हैँ। मेरी भी आँखें भीगी
हुई थीं। गरीब लोग एक दूसरे की तरफ देख रहे थे और आँसू की
नदियाँ वहा रहे थे।
दूसरे दिन ही मैंने वह घर छोड़ दिया। वह अलग किस्म
की जीवन शैली अपनाने की लालसा लिए गाँव लौटा था। उसका अन्त
भी अलग किस्म से हो गया। मेरे घरका रिकार्ड भी टूट गया। अब
मैं कुछ नहीं बोलनेवाला। क्या मैं नपुंसक ही हूँ?
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |