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कविता के जन्मदिन पर --मुकुल दाहाल
आँगन में अँधेरा साँढ़ बनता रहा
चेहरे पे काली रात आके सोती रही
स्वादका अर्थ जिह्वा में न लिखा गया
बदन सर्वांग न छिप सका आजीवन वस्त्र में
सफाई कौन सी सुविधा है कौन सा चमत्कार है मालूम न पड़ा
ऐसे परिवार में जन्म लिया एक दिन मेरी कविता ने
वह नहीं रोई आदमी जैसे जन्म लेने पर
वह जन्मी परिपक्व, पूर्ण
अर्थ लिए आवाज लिए स्वर लिए
मेरे घाव मेरे दर्द
मेरे सब वंशज गुण लेके वह मर्यादित जीती गई
मैं प्रत्येक जन्मदिन के ढलान पर लुढ़कता रहा,
टकराता रहा और नीला पड़ता गया
हर जन्मदिन के सोपान पर वह चढ़ती रही आकाश की तरफ
और वयस्क बनती रही
मैं हर जन्मदिन में लोगों की भीड़ लादता रहा
बिखरते हुए जीवनपिण्ड से भागने के लिए।
वह एकदम तन्हा बेखौफ़ है जैसे ‘आज’
क्योंकि आज उसका जन्मदिन है
मैं उसकी दीप्त जीवन की आभा महसूस कर रहा हूं।
वह मुझे चोंच मारके मेरे ही ठण्डी आंखों से मुझे देख रही है।
मुझे ज्ञात हो रहा है मेरा रिसता हुआ जीवन का रस उसके लम्बे आयु के अर्थवत्ता से छोटा है संकीर्ण है।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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