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उत्तरार्द्ध --परशु प्रधान
टेलिभिजन में दिखाए गए दृश्य मेरे लिए अब अर्थहीन होने लगे हैं । वहां के ज्यादा सेक्सी व कामुक प्रसगों को मैं नहीं समझता । शायद समझने की कोशिश भी नहीं करता । टी.वी. के परदे पर दिखाए जाने वाले उत्तेजक और जंगली नृत्य मुझे मानव इतिहास के प्रारम्भ में ला पटक देते हैं । जहां मैं मिलता हूं पहाडों और जंगलों के बीच आदिम नर-नारियों से । मैं उत्तेजित व कामुक बनने की कोशिश करता हूं पर सफल नहीं हो पाता । यह मेरी कमजोरी हो सकती है, शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक भी । शरीर के हर अंग क्रमशः कमजोर होने लगे हैं, मैं अनुभव करता हूं । लगता है शरीर के मेटाबालिजम में ही कहीं गड़बड़ है । थोड़ा सा मीठा खाने से ही पाचनक्रिया में गड़बड़ी शुरू हो जाती है । रात भर पेट फूल जाता है और अनजाने में ही कहीं दर्द होता है । और तब डाक्टर के सवाल- उमर कितनी है, बजाय इसके की तकलीफ क्या है- जवाब में स्वर मलीन बन जाता है- पचपन हो के छप्पन में हूं । मेरे छप्पन बोलते ही डाक्टर के होठों में मुस्कान फैल जाती है फिर मिट जाती है । वह लम्बा सा प्रेश्क्रिप्सन लिख देते हैं- यह सिर्फ उदर रोग नहीं है । और भी जटिलताएं हो सकती हैं । एक बार थरोल्ली परीक्षण करना पड़ेगा यानि कि पेशाब, खून, छाती, प्रोस्टेट बगैरह बगैरह । फिर दवाईयों कि उतनी ही लम्बी फेहरिस्त । इन सब परीक्षणो में और दवाईयों में भी डाक्टर साहब का अच्छा कमिशन बनता है । अच्छा तो परीक्षण के बाद मिलूंगा, मैं कह तो देता हूं पर मुझे अच्छी तरह मालूम है मैं उसके यहां नहीं जानेवाला । उसके यहां जाने के लिए मेरे पास जो तन्तुएं हैं वे सब टूट चुके हैं । भारी मन से घर पहुंचता हूं । "मैं डाक्टर के यहां हो कर आया हूं" कहने के साथ ही अनायास अनुभव करता हूं घर मे कहीं त्रास का वातावरण छा गया हैं । बीवी मुंह खोलती है- आप डाक्टर के यहां गए ही क्यों थे - संक्रान्ति के लिए अभी दश दिन बाकी हैं । बेटे का पगार नहीं मिला है । कहां से पैसे लेकर इतने काम करेंगे - रख दीजिए ये डाक्टरी कागज एक तरफ । "पेन्सन अभी तक लिया नहीं है । उसी से अच्छी तरह चेक अप कराएं तो कैसा रहेगा............. ।" मेरी बोली अधूरी रह जाती है । बेटी बड़ी आवाज में धमकाती है- इसबार का पेन्सन मुझे देने को कहा है न बाबा । कालेज मे फीस न जमा किए तीन महीने हो गए । अब तो सिर्फनाम कटवाना बाकी है । सड़क में चलना और चलते रहना कठिन है । चलते चलते पैर थक जाते हैं और फिर आगे बढ़ना नहीं चाहते । नसें जैसे जम जाती हैं । फिर यार दोस्त मिल जाते हैं । आप पहचाने से लगते हैं हम कहीं आफिस में मिले तो नहीं है- वे कहते हैं । मुझे गुस्सा आता है- 'भन्सार' और 'कर' के अलावा सभी आफिसों में हम मिले हैं । जवाब में वे मुस्कुराते हैं और अपने रास्ते चल देते हैं । सड़क के दूसरी ओर से आई आवाज मेरा ध्यान भंग करती है । - मास्टर साहब, कितनी जल्दी बूढ़े दिखने लगे । रिटायर हो गये लगता है । मैं कहता हूं आप जितने बड़े तो मेरे लड़के लड़कियां हैं । वह हंसता है और चल देता है । बहुत सी मोटरें चल रही हैं सड़कों पर । उनमें से झांकते चेहरे मुझे पहचाने से लगते हैं । उन्हें रोककर मैं पूछ नहीं सकता- कल तक तो सड़क नाप रहे थे, कब से कार चढ़ रहे हैं ? हर गाड़ी दुर्गन्धित है, किसी में सड़क की बू आती है, किसी में सिंचाई मितली कर रहा है, किसी में राजस्वका दुर्गन्ध फैला हुआ है तो कोई जंगल समाप्ति की घोषणा कर रहा होता है । मैं सड़क में था, आज भी सड़क में हूं और कल भी सड़कों में ही रहूंगा । रंगहीन और गंधहीन हो के सड़क लांघने में भी अपना ही मजा है । लेकिन न जाने क्यों नसें कमजोर पड़ रही हैं - मैं क्यों वहां तक पहुंच नहीं सकता ? घर को पुनरुद्धार नहीं किया जा सका है अभी तक । परदे दश वर्षपुराने हैं । फ्रिज भी रिटायरमेन्ट लेना चाहता है । डाइनिंग टेबल व कुर्सियां असाध्य रोगों से ग्रसित हैं । रंग व पुताई सब उड़ चुके हैं, घर खण्डहर जैसा दिखता है । लगता है घर में सब आदिम युग में जी रहे हैं । क्या मालूम कब ये घर हम सबका कब्र बन जाए, कह नहीं सकते । पुरानी बातें याद करने को जी करता है । आधे शतक आगे की घटनाएं झकझोरती हैं । कई दिन थे- जब सिर्फ नदी के बहाव पार करते थे । पहाड़ों की चढ़ाई करते थें । चढ़ाईयों में ही रमते । कई दिन थे - सपने के रंगीन घोड़े चढ़ते । आकाश से तारे तोड़ लाने के वादे करते, कभी खत्म न होने वाले वादे । क्षितिज के उस पार पहुंचने वाले वादे । लेकिन अब घरवाली की आवाजें "बूढ़े तो सब होते हैं । लेकिन आप जैसे कोई नहीं होते । आधी उमर बाकी है । कैसे गुजारेंगे आप ।"- मेरे भीतर समाहित हैं । जिसको अर्थ देके मैं टिका नहीं रहना चाहता । लगता है हमारे भीतर कहीं कुछ गड़बड़ है । शारीरिक मशीन कहीं बिगड़ा हुआ है । वह जिस चीज में इतनी विश्वस्त है उसे मैं तनिक भी विश्वास नहीं करता । मैं जो समझता हूं वह आजकल समझती नहीं है । वह जो कुछ भोग चुकी है इस लम्बे जीवन यात्रा में मुझे सब निरर्थक लगते हैं । क्योंकि उन सब को संवारने या सुधारने का वक्त हमारे पास नहीं है । हमें मालूम हो या न हो इसका कोई अर्थ नहीं है । कभी मैं गंभीर बन जाता हूं कभी वह । वह मन्दिरों और धार्मिक प्रवचनों में ज्यादा वक्त देती है जब कि मैं पत्रिकाएं व रेडियो में फंसा रहना चाहता हूं । वह मीठा नहीं लेती- डायबिटीज जो है । मै मीठा लेता हूं, नमक नहीं लेता- ब्लड प्रेसर का मरीज हूं । लगता है यात्रा खत्म हो गई है और फिर हम एक दोराहे पर खड़े हैं । मुझे पूरब जाना है और उसे पश्चिम । अब न कोई सपना है न किनारा । कभी कभी मैं उसे अतीत में ले जाकर कहना चाहता हूं- "मैं तुम्हें कालेज में नहीं मिलता तो कुछ और बन गया होता ।" इसे वह दूसरे नजरिए से देखती है व कहती है- मैं नहीं मिलती तो तुम साधु बन गये होते व बनारस की तरफ जाकर तपस्या कर रहे होते । पता नहीं गीता न मिलती तो क्या होता ? वह मिल गयी और यह सब हो गया । यह घर बना । यह नौकरी मिली । बेटे बेटियां ही नहीं बरन पोते पोतियां भी हो गए । पता नहीं गीता कहीं खोई सी लगती है । वह बिनबहाव की पहाड़ की नदी जैसी है । यानि कि तालाब की मछली की तरह । खून का मूल सूख जाने पर ऐसा होता है क्या ?..... मै खुद सोचता हूं । वह हर चीज को नकारात्मक नजरिए से ही देखती है । कभी कभी लगता है जीवन के सब उजाले मिट चुके हैं । सन्देह, व शक व अविश्वास की शाखाएं बढ़ने लगी हैं । मैं उन शाखाओं को काट भी नहीं सकता । पूरा घर शक और षड्यन्त्रका जाल सा दिखता है । बगैर आमदनी व बगैर काम के आदमी का दिमाग ऐसा ही होता है क्या ? अपमान व तिरस्कार ने मन को बर्फके माफिक जमा दिया है । बेटी की आखें कहती हैं- पिताजी तो कुछ करते धरते नहीं सिर्फ मैं क्या कर सकती हूं । बहू की आखें कह उठती है- पिताजी सबेरे तीन बजे ही उठकर सब की नींद खराब कर देते हैं । घरवाली के मन में एड्स का भय मिलता है । अविश्वास और शक के घेरे को तोड़कर एक निर्णय लेता हूं और कामना करता हूं......... मुझे क्यान्सर हो जाए । एड्स हो जाए मुझे । छोटेमोटे रोग तो मुझे मृत्यु देने से रहे । मैं किसी बड़े रोग का शिकार बनना चाहता हूं । बीसियों बार घर में छोटामोटा भाषण दे चुका हूं मैं- मुझे जो भी हो, डरने की बात नहीं है । मैं और कितने साल जीऊंगा - ६,७ या ८ । रोग लग जाने पर दवादारु करने से या न करने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला' अवश्यम्भावी मौत के लिए क्यों इतनी परेशानी ? आखिर एक दिन तो मरना ही है । यही सत्य है । फिर इतने लम्बे कालखण्ड में मेरे ६ या८ वर्ष क्या मायने रखते हैं ? लेकिन वैसा कुछ नहीं होता । सबेरे जागकर बाहर देखने पर या टहलने को निकलने पर संसार बहुत अच्छा दिखता है, जिन्दगी सारगर्भित लगती है । सूरज की किरणों के साथ जीने में जिन्दगी की परिभाषा ही बदल जाती है । न टेलिफोन है, न कोई यार दोस्त, न शराब के प्याले में आस्था उमड़ती है, न ही चाय में विश्वास का सूरज उगता है । न 'नमस्कार' कहके झुकनेवालों की भीड़ है न चापलूसी करने वालों का समूह । न प्रमोशन की बातें है, न तबादले की । न विदेश के रंगीन महलें हैं न ही फैशन व डिजाईनों की बात । अकेले सोना, उठना व अकेले घूमते रहना । वर्तमान में चलना, अतीत को याद करना और कल को सिर्फशून्य सोचना, सिर्फ पूर्ण विराम व लक्ष्यहीन सोचना । बेटी व जमाई एक दुर्घटना में चल बसे । अब तो सिर्फ उनकी यादें बाकी हैं । पोते पोतियां हैं हमारे हवाले । उनको देखने भर से आंखों मे आंसू भर जाते हैं । जो गए वे भाग्यशाली थे । अपने सामने अपनों की मौत कितनी पीड़ादायक होती है - इससे दूसरी विसंगति क्या हो सकती है ? अब तो खुद ही जिन्दा लाश की तरह हैं । शादी ब्याह में जाना, शवयात्रा मे शामिल होना और लड़के लड़कियों की शादी करवा देना, दैनिकी में शामिल हो गया है । इन्हीं सामाजिक कार्यों लिए जीते रहना भी विडंबना नहीं तो और क्या है ? सब कहते हैं मैं बूढ़ा हो गया । लेकिन खुद कैसे मानें ? जब सारे अङ्ग पूर्ण रूप से शिथिल व नाकाम न हुए हों तो । चलने के लिए छड़ी का सहारा अभी जरूरी नहीं है, बाहर निकलने के लिए एक आदमी की जरूरत भी अभी महसूस नहीं हुई । लगता है कहीं भीतर जवानी की तरंगे मौजूद हैं। कहीं कुछ प्यास बाकी दिखता है । मन में कहीं जीवन के गीत हैं, जीवन की आवाजें हैं, प्यास बाकी है, लेकिन कोई इन सब को अहमीयत नहीं दे रहे हैं । कितनी आसानी से कह उठते हैं- हरिगोपाल अब बूढ़ा हो गया । बाल सफेद हो गये उसके, कमर भी झुकी हुई है । बाल की तरह यह मन भी सफेद हो जाता तो कितना अच्छा होता । मतलब-बेमतलब की बातों ने जिन्दगीको कद्दू के झोल की तरह बेस्वाद बना रखा है, लगता नहीं था सिर्फ अर्थहीन व उद्देश्यहीन बातें सोचकर वक्त गुजारना पड़ेगा । क्या करें - इस तरह भी एक आदमी जी सकता है । इसी तरह एक जिन्दगी का अन्त भी हो सकता है । इसी तरह मैं शहर के सड़कों पर चल सकता हूं । एक कुत्ते की तरह, एक बासी डबलरोटी की तरह जिन्दगी को घसीटके एक बेमतलब की यात्रा मे चल रहा हूं । यह यात्रा कब खत्म होगी- मुझे मालूम नहीं । कुछ भी मालूम नहीं । पशुपति और गुह्येश्वरी के जंगलों में जाता हूं । अकेला होना चाहता हूं । गीता की श्लोकों में अपने आपको खो देना चाहता हूं । भगवान् श्री कृष्ण के इन शब्दों में अपने आपको लीन करना चाहता हूं- "मैं ही सूर्य का रूप लेके आग बनता हूं और वर्षात् को बुलाता हूं व पानी बरसाता हूं, अर्जुन ! मैं ही अमृत हूं और मृत्यु हूं । सत् और असत् मैं ही हूं ।" मैं भी भगवान् श्री कृष्णको ढूंढ रहा हूं, परमात्मा में लीन होने के लिए कर्म ढूंढ रहा हूं । लेकिन जहां कहीं कंस, रावण और शकुनि भरे पड़े हैं । भगवान् कृष्ण ने कहा है कि मेरे भक्त कभी नहीं मरते । निष्काम कर्म को जोर दिया है उन्होंने । लेकिन मैं तो भक्तों का विनाश देख रहा हूं । भोग रहा हूं अच्छे लोगों कि समाप्ति । मैं किसे विश्वास और किसे अविश्वास करूं ? क्यों सबकुछ बदला हुआ सा लगता है - शहर- अपना शहर जैसा नहीं लगता । घर- अपना घर जैसा नहीं लगता । कोई भी रास्ता मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचाएगा- ऐसा नहीं लगता । मैं खुद से ही पूछता हूं- तेरी मंजिल क्या है ? कह तो दिया मैं भ्रम में हूं, बहाव में हूं, निराशा में हूं । घर में कभी कभी सभी से पूछ बैठता हूं- मैं कहां से आया ? कब तक यहां बैठूंगा और अब कहां जाऊंगा ? मैं कौन सी रोशनी में हूं औंर किस अंधेरे में गुम होने जा रहा हूं ? सबलोग हंस देते हैं- बाबूजी आप तो पागल हो गये - क्यों न कोई साइकियाट्रिस्ट से सलाह ली जाए ? अब तक तो मैं ठीक था । सारा जीवन नौकरी में बीता । हमेशा एक इमान्दार कर्मचारी बना रहा । घर बनाया । बेटे बेटियों को बढ़ाया, पढ़ाया- लिखाया, योग्य बनाया । अब मैं पागल हो गया और घर के लोग डाक्टर ढूंढने लग गये । संसार में भगवान से महान बड़ा डाक्टर कौन है ? श्री कृष्ण से महान कौन है ? कोई नहीं..... । निश्चय ही कोई नहीं । जितने भी हैं सभी इस लम्बी यात्रा के सहयात्री हैं । कहीं किसी मोड़ में सब छुट जाते हैं । मैं उसी सत्य को ढूंढ रहा हूं । मैं उसी मोड़ में प्रवेश करना चाहता हूं । जीवन के सत्य की नयी आकाश को छूना चाहता हूं - क्या मैं जीवन के शाश्वत सत्य- मृत्यु में लीन होना चाहता हूं -.......क्या मैं आत्महत्या को इसका माध्यम बनाना चाहता हूं - क्या आत्महत्या ही इसका एकमात्र समाधान है - पता नहीं । अचानक यूं ही मार्निंग वाक से घर नहीं लौटता, लौटने को मन ही नहीं करता । जान चली जाए घर लौटने को दिल नहीं करता, सामने नदियां हैं, किनारे हैं, पहाड़ हैं, आकाश हैं, यह सुबह है, यह उगता हुआ सूरज है । सदाबहार क्षितिज है, मैं खुद से खुद को मुक्त करना चाहता हूं । खुद से उपर उठना चाहता हूं । सत्य के दूसरे मोहड़े पर चलना चाहता हूं । यही मेरा परम सत्य है । यही मेरा परमेश्वर है । यही मेरा परमात्मा के साथ साक्षात्कार है । अभी मैं उस सड़क मे हूं जहां कोई शायद ही चला हो । उस नदी के पास हूं जिसके पार कोई जा नहीं पाया हो । मैं अछूता कौमार्य भंग करने जा रहा हूं । अजेय अविनाशी व समृद्ध भगवान सूर्य को हाथ जोड़कर नमन करते हुए घर में लिखकर छोड़े हुए पंक्तियों को याद कर रहा हूं....... मैं कहां जा रहा हूं मालूम नहीं । कहां तक पहुंचूंगा वह भी मालूम नहीं । मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को मुझे ढूंढने की धृष्टता करने की जरूरत नहीं है, इसके लिए किसी ने किसी माध्यम का सहारा लिया तो मेरी आत्मा बहुत रोएगी । और मुझे सब लोग सदा के लिए भूल जाएं, जैसे मैं सभी को सदा के लिए भूल जाने के लिए विवश हूं । मै स्वयं दोषी हूं । इतने साल सभी के संग रहते हुए जो भूलें मुझसे हुई हैं उसके लिए मैं क्षमा चाहता हूं । अन्त में मेरा एक अनुरोध है- मै कभी नहीं था, नहीं हूं, न ही हूंगा ।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |