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टोकियो में छोटा बुद्ध

-- परशु प्रधान

       टोकियो में फिर हिमपात होने लगा । पिछले साल की तुलना में इस बार सर्दी जल्दी आ गई । जल्दी ही पत्ते झड़ने लगे । ठंडी हवाका झोंका दिल को भेदने लगा । वहां से यहां बहुत ठंड और ठंडी बर्फ। वहां से यहां जीना बहुत कठीन । टि.बी. देखते देखते पाल्देन को लगा जैसे सगरमाथा चढ़ते लोग उसे बुरी तरह से चिढ़ाने लगे । उसने टि.बी. बन्द कर दिया ।

वहां- वह जगह 'सोलु' जहां पाल्देन जन्मा था और यहां- संसारका सबसे महंगा शहर टोकियो । टोकियो के मेट्रो रेल से जुड़ा हुआ एक छोटा सा महल्ला । उस महल्ले का एक घर और इस घर के एक कमरे में कैद रहना पाल्देन को अच्छा नहीं लगा । वह बाहर निकल पड़ा और सड़क तक आ गया । सडकों पर बर्फ भरा पड़ा है व कुहरा भी छाया हुआ  है । कुहरे के साथ साथ हल्की बरसात भी हो रही है । दिन के दो बजे ही शाम की निरर्थकता छा गई है । इसी निरर्थकता में पाल्देन खुद से पूछता है- तू क्यों और किसलिए टोकियो आया है पाल्देन ?

इस प्रश्न के सैकडों जवाब पाल्देन खुद तैयार करता है । पाल्देन ने जापानी लड़की के साथ शादी की है और अब मजे से टोकियो में है । पाल्देन टोकियो में नौकरी कर रहा है । मालूम है कितना ज्यादा रुपया भेजा है घर में ? वह अब जापानी नागरिक बन जाएगा । अब वह नेपाली नहीं रहा । काश ! पाल्देन जैसा जीवन हम भी पा सकते । अपनी तो किस्मत ही खोटी है । इन सभी जवाबों को एक जगह रखकर पाल्देन सोचता है- अपने ही जाल में फंस गया न पाल्देन । अब ले बड़ा भाग !

पाल्देन ने बड़ा भाग कभी नहीं चाहा था, न ही कोई बड़ी सी नौकरी ढूंढ़ी थी । अन्य दोस्तों की तरह ट्रेकिंग एजेंसी में गाईड का काम करता था । वह हिमाल के तल में जन्मा था व सारा हिमाल उसी के जिम्मे था । सारे बर्फ व ओले और उनका ठंडापन पाल्देन के थे । हर वर्ष चाहे अनचाहे सैलानीयों को ट्रेकिंग पर ले जाने की नौकरी थी पाल्देन की । उसको पक्का यकीन था जैसे सारे हिमाल नेपाल के उत्तर में हैं उसी तरह सारे नेपाली भी सैलानीयों को गाईड के रूप में घुमा कर अपना पेट पाल रहे हैं । स्साला ! इसी तरह से तो मुलाकात हुई पाल्देन की जापानी लड़की सिल्बिया से । नाम था सिल्बिया और ऊपर से ज्यू (जी) कहकर पुकारती तो पाल्देन के शान के क्या कहने। वाह ! क्या लज़ीज लड़की थी सिल्बिया । और जापानी तो नाटे होते हैं लेकिन वह थी अमरिकन जैसी ऊंची । औरों के नाक तो चपटे होते पर उसका नाक तो ऊंचा, ब्राम्हाण स्त्रियों का जैसा । गाल पर गुरांस के फूल की लाली, और दांत बरफ़ जैसे चमकिले व सफेद । प्लेन से उतरकर, ट्रेकिंग ऑफिस पहुंचते ही पाल्देन सिल्बिया का गाइड बन चुका था । उस रात पाल्देन सो नहीं सका था । बहुत सारे तोङ्बा के डबके  खाली कर दिए उसने । सब पैसे सिल्बिया ने चुका दिए थे और मस्ती में पाल्देन चिल्ला उठा था- क्या लकी नम्बर है पाल्देन का । क्या लकी टुरिष्ट है पाल्देन की ।

पाल्देन तिब्बती घोड़े जैसा फूर्तिला व तेज बन गया था । ऊपर से सिल्बिया जब जापान में सिखे हुए कुछ नेपाली लफ़्जों में से, "पाल्देनज्यू" कहकर रक्तिम चेहरे से पुकारती तो, पाल्देन अपने आपको दूसरी दुनिया में पाता । सारी खुशियां, सारे त्यौहार और पर्व एक ही दिन मे वही लज़ीज जापानी लड़की लेकर आई है- ऐसा लगता था पाल्देन को ।

वह बात तब की थी और अब पाल्देन सड़कों में है । यह सड़क अभीअभी सरसों के तेल से मालिश किया हुआ जैसा चिकना दिखाई पड़ता है । पाल्देन सड़क में तो आ गया मगर जाएगा कहां ? जब से टोकियो में आया है दो परेशानियां हैं उसकी - कहां जाए और क्या करे ? कहीं बार व पब में जाकर जी भरकर पिने का मजा ही कुछ और है पर जेब जो खाली है । किसी डिपार्टपेन्ट स्टोर में जाकर कोई सामान खरीद ले पर किसके लिए - मां, बाप तो गुजर गए । बहनें भी लड़कों के साथ भाग चुकीं । भाई लोग भी अपने-अपने हिस्से की जायदाद हजम कर चुके । यार-दोस्त भी वैसे ही है । फिर येन की गड्डी भी तो चाहिए ।

घरमें अकेले गुमसुम बैठा रहूं ? कबतक ? कितने दिनों या रातों तक ? या फिर कितने वर्ष ? कमरे मैं बैठूं तो सिल्बिया द्वारा बनवाकर रखे हुए मुर्गी के मांस और शराब दो घन्टे के लिए भी काफी नहीं होते । फिर यार दोस्त के यहां जाऊं तो सब पेड़ों पर लटके हुए नोटों को बटोरने में व्यस्त हैं । क्यों अनाहक बाधा दी जाए । याद न करने की लाख कोशिशों के बावजूद पाल्देन के सर में सोलु का सल्लेरी बाजार घुस ही जाता है । फिक्र न करने पर भी ठमेल की गलियां याद आ ही जाती हैं । अब, कब नेपाल जाया जा सकेगा ? वह लम्बी सांस खिंचकर नजदीकी पार्क में पहुंचता है । वही पहचाना हुआ पार्क है, बहुतबार आ चुका है इधर । कोई बहादुर जापानी की प्रतिमा  गर्व के साथ स्थापित की गई है । फूलों से भरे क्यारियां और अनेकन् फाउन्टेन है । मौसम ठंड है पर पार्क में आने वाले युवक-युवतियों को कोई परवाह नही है शीत की, ठंड की वे सब अपने प्रेमको जीवन्तता दे रहे हैं । वे ऐसे आखें चार कर रहे हैं ऐसे चूम रहे हैं एक दूसरेको जैसे बर्षो के बाद मिले हों । पाल्देन यही दृश्य तो निशुल्क देख पाता है टोकियो में । नहीं तो जहां कहीं रुपये पैसे की बात आ ही जाती है ।

समय फिर पिछे सरक जाता है और पाल्देन अपने विगत में पहुंच जाता है । बरफ़ से ढके पहाड़ों के नीचे डरावनी ढलानों में पहुंच जाता है । जंगलों में खिले हुए लालीगुरांस के पेडों से अपने आपको बदलता है, जो देखने में तो सही सलामत और अच्छे हैं पर छु लेने मात्र से टुटने वाले नाजुक डालियां हैं । पाल्देन महसूस करता है - उसका दिल भी इन्हीं डालियों के समान नाजुक है जो छोटीछोटी यादों से ही टूट पड़ते हैं । पाल्देन की इसी कमजोरी को सिल्बिया ने किसी मोड़ पे भुनाया- कितने सुन्दर लड़के हो तुम पाल्देन । कितने परिश्रमी और कर्मयोगी । तुम जैसे युवक को काश जापान ले जा सकती ।

तब अचानक पाल्देन को लगा- काश वह जापान जा पाए वह जापान जा सका तो बहुत आमदनी करेगा । काठमांडु और सोलु में बहुत बिल्डिगें बनाएगा । ऊपर से खुद ट्रेकिंग एजेन्सी का मालिक बनकर और कितने ही पाल्देनों को नौकरी दे सकेगा । दूसरे का कोल्हु का बैल बनकर जिन्दगी तो न गुजारनी पड़ती ।

और ये सब भावनाएं एक ही बार अप्रत्यक्ष रुपसे बढ़ गई थीं वृक्ष की घनी शाखाओं की तरह । सिल्बिया कभी नेपाली में, कभी अंग्रेजी में, न सकी तो जापानी में ही अपनी कोमलताएं प्रकट करती । रास्ता कठिन होने पर सिल्बिया हाथ देती ओंर पाल्देन गर्व से मुस्कराता । शामको रंगीन बनाने के लिए सिल्बिया अपने हाथ से दो चार गिलास ज्यादा बीयर पिलाती पाल्देन को और उसके होंठ विजयी मुस्कान बिखेरते । कब कैसा पहाड़ सामने था, कैसे चढ़ाई हो गई और कैसे नीचे आ गए कब नदी आई और कब पार किया, कब चढ़ाई व ढलान खत्म किया पाल्देन और सिल्बिया को पता नहीं चला । दोस्तों के आने के पहले ही वे अपनी टेन्टों में जाकर नास्ता कर चुके होते, नहीं तो कम से कम चाय पी चुके होते । पाल्देन को इसी ट्रेकिंग में मालूम पड़ा  - संसार इतना विशाल है- इतने सारी भाषाएं और उपभाषाएं होने पर भी सबलोग दिल की भाषा इस्तेमाल करते हैं । उसने जाना लोग अपने अंग-प्रत्यंग से भाषिक सञ्चार करते हैं । पाल्देन भी आंखों से, अंगुलियों से, दातों से, होठों से, जीभ से बोला था । पाल्देन कभी आदिम पुरुष बन वैठा तो कभी माडर्न । जितने दिन और रातें जुड़ने लगे पाल्देन को लगने लगा सिल्बिया सिर्फ उसी के लिए जन्मी है या जिन्दगी के बाकी दिन पाल्देन सिल्बिया के बिना नहीं गुजार सकेगा ।

पाल्देन के कुछ सपने थे जो उसने सिल्बिया के छत्र छाया में सच करने चाहे । अपने सारे अतीत को उसने धोखा दिया था । उसे अपनों ने बिच्छुओं की भांति डंसा था । खाने व पिने के सामान्य जिन्दगी से पाल्देन ऊपर उठना चाह रहा था । इसलिए जब ट्रेकिंग से जब वे लोटे तो एक बनकर, कभी जुदा न होने की कसम खाकर । स्वयंभू के पहाड़ से डूबते हुए सूरज को देखकर अपने प्रेमके सूर्यको कभी न डूबने देने के लिए प्रतिज्ञा की थी उन्होने । ठमेल की गलियों मे वे साथ थे । झोंछे के फ्रिक स्ट्रीट में चिलम पिते वक्त साथ थे । और फिर सिल्बिया ने कहा था- चलो पाल्देन बौद्ध परम्परा अनुसार शादी करें और जापान जले जाएं ।

ये शब्द पाल्देन के लिए खुशी के शब्द थे । बुद्ध की शान्त आंखों से आशीर्वाद की मौन आवाजें बहते हुए निकल रहे है, ऐसा आभास हुआ था पाल्देन को । बुद्ध, उसके संस्कृति व परम्परा मात्र न होकर उसके जीवन-दर्शन थे ।

"तुम बुद्धिष्ट हो क्या ?" किसी दिन पाल्देन ने पूछा था ।

"मैं बुद्ध के प्रति श्रद्धावान हूं पाल्देन । मेरे मन में छोटी उमर से ही बुद्ध के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास है । तुम ठहरे बुद्ध के देश के आदमी, मैं तो खुद तुम्हें छोटा बुद्ध देखती हूं पाल्देन ।" कहकर सिल्बिया ने उसे देर तक बाहों मे भर कर रखा था ।

पार्क के बेन्च से उठते वक्त तक पाल्देन के कानों मे वे शब्द झनझना उठे - यों कहें खनखना उठे - एक छोटा बुद्ध, ए लिटिल बुद्ध, एक छोटा बुद्ध । सिल्बिया रोज की तरह आज भी आधी रातको आएगी । आधी रात में घर आने पर उसे नींद नहीं आती । नींद से जागकर उसे सिल्बयाको वही आदिम सेवा देनी होगी - जो वह बर्षों से देता आया है । इस बात को याद करते ही पाल्देन की आत्मा मर जाती है ख़ुदकुशी करके यहीं कहीं टोकियो में चिर विश्राम लें- ऐसा लगता है । सड़क बत्तियां जल चुकी हैं । पाल्देन जल्दी से लौट पड़ता है । ऐसे लौटता है जैसे उसके पास न कोई पुरानी यादें बाकी है न ही कुछ नई योजनाएं हैं । इच्छाएं व आवेग भी लापता हैं । पाल्देन शून्य दिल लेकर आकांक्षाहीन और सपनाहीन लौट पड़ता है उसी घर में । मानों कुछ हुआ ही न हो न ही होने वाला हो- यह संसार ऐसे ही चल रहा है और चलता रहेगा । जैसे बहुत से पाल्देन जन्म लेंगे, फिर मर जाएंगे । फिर जन्म लेंगे फिर मर जाएंगे ।

न जाने क्यों पाल्देन का दिल बहुत भारी है लगता है कहीं दिल में बड़ा सा पत्थर बैठ गया है। और वह बडा़ सा पत्थर उस समय उसके दिल में बैठा था जब वह और सिल्बिया बौद्ध जाकर एक लामा के सामने शादी के लिए बैठे थे । बाहर से हसने पर या खुश होने पर भी, पाल्देन दिल से न जाने क्यों पुरी तरह नहीं खुल सका था । कहीं किसी कोनेपर भारीपन था, उदाशी छाई हुई थी, जिसको पाल्देन "यही है" कहकर व्यक्त नहीं कर सकता था ।

टोकियो आनेपर उसने सिल्बिया से अनुरोध किया था- "मैं भी कहीं नौकरी करूं तो कैसा रहेगा ?"

नौकरी की बात को पूरी तरह से नकार दिया था सिल्बिया ने । पाल्देनका पासपोर्ट छिनकर बोली थी- "पाल्देन । अब तुम सिल्बिया सान के पति भी हो । जापान आकर तुम्हें जुठे बर्तन साफ करने नहीं पड़ेंगे । न ही तुम्हें किसी के बच्चों की देखभाल करनी पड़ेगी । तुम शान से घर में बैठो, टी.भी. देखो और मजे करो ।"

बात बिलकुल सही व आदर्श थी । पर पाल्देन हर रात बलात्कार का शिकार होता था और इसी की पीड़ा से वह छटपटाता था । वह खुद को स्वचालित यन्त्र में तब्दील पाता और हर वक्त सिल्बिया के आदेश से दबा हुआ महसूस करता । पाल्देन की अपनी इच्छाएं मरुस्थल के रेत जैसे बन गई थीं । आज्ञाकारी बालक को जैसे आदेश दिए जाते हैं, वैसे ही आदेश सिल्बिया पाल्देन को देती और पाल्देन स्वीकार करता था, अनचाहे व मुश्किल से ही सही । अब सोलु और सल्लेरी के जंगलों में पाल्देन सिर्फ सपने में ही बिचरता था । हिमाल की उचाइयां सिर्फ टेलिभिजन में देखता । फिर नेपाल लौट के वही ट्रेकिंग एजेन्सी में नौकरी करने की झीनी सी आशा लेकर पाल्देन जी रहा था ।

फिर एक दिन पाल्देन भाग जाने की सोचने लगा । पर भाग कर भी वह कोई दोस्त के यहां दो चार दिन छिप सकता था, नेपाल तो पहुंच नहीं सकता था । न उसके पास पैसे थे न पासपोर्ट, कुछ नहीं था । ऐसे में एक दिन रेल से कुचलकर मर जाने की बात सोचने लगा पाल्देन । फिर अचानक उसे लगा आत्महतया तो जघन्य अपराध है, उसने इस विचार को भी त्याग दिया ।

पाल्देन जब घर पहुंचा तो सिल्बिया न जाने क्यों पहले ही आ चुकी थी । सिल्बिया पुछताछ करने लगी पाल्देन से - इतनी देरी क्यो ? इतनी रात तक कहां थे ? मुहं सुंघने लगी शराब पिया है की नहीं मालूम करने के लिए । पाल्देन ने सिल्बिया का चेहरा देखा गौर से- कुछ वर्षों में ही वह चेहरा बदल गया था । लम्बा सा नाक चपटा हो गया था और आंखे भी धंस चुकी थी । चेहरे पर दाग व धब्बे उभर आए थे ।"

"पाल्देन तुम कैसे हो ?........" गम्भीर बन गयी सिल्बिया ।

"मैं ठीक हूं..............." बोल तो दिया पाल्देन पर उसे मालूम था यह सरासर झूठ है ।

"तुम्हारे लिए एक अच्छा सा उपहार लायी हूं मैं । ये माला है जिससे बुद्धिष्ट जाप करते है । तुम भी फुरसत मे बुद्ध को यादकर जाप किया करो, तुम्हारे सारे पाप कट जाएंगे ।" सिल्बिया ने वह माला पाल्देन को देनी चाही । पर पाल्देन निर्णय न कर सका - वह माला लेके, जाप करके वह कौन से पापका प्रायश्चित करेगा ? कौन से अपराधका ? उसे मालूम नहीं पड़ा।

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


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