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टेबल पर पड़ा वह तार -- परशु प्रधान टेबल पर रखे हुए तार को उसने फिर एकबार पढ़ा । अर्थात् उन हरफों में फिर उसकी आंखें पहुंच गईं । अभी उसके मन में खुशियों की लहरें उठ रही हैं - उसे मालूम है वह बहुत थका हुआ है देश का पूरा इतिहास मुंह जवानी सुनाकर और सैलानीयों के रंगबिरंगी प्रश्नों के जवाब देकर वह लौटा है । उसकी थकित इच्छाओं में फिर जान आ गई । वह मन ही मन मुस्कुराया जब की इस दुःखभरि बात से उसे रोना चाहिए था। पर उन सारी बातों ने उसे नहीं छुआ । मानों वे बातें उसकी जिन्दगी के माफिक अति सामान्य हैं । यानि कि सबेरे ही उठना, जल्दी जल्दी मुंह कुल्ला करना, कोट पॉइन्ट पहनना, टाइका नॉट कसना और फिर अपरिचित लोगों के साथ परिचित जैसे मुस्कुराना। फिर अपना संक्षिप्त परिचय देना और चेहरों पर ज्यादा से ज्यादा हंसी लाने की निरर्थक प्रयास करना। परसों एक दोस्त मिला था जो गांव के पसंदीदा दोस्तों में से था। वह भी शहर में आ गया है और छोटी-मोटी नौकरी में उलझा हुआ है। उसे उसके दुःखद घटना के बारे में मालूम पड़ गया था और फिर उसने सहानुभूति के दो शब्द कहे थे - ‘ मुझे बहुत दुःख हुआ है कृष्ण ! मेरी हार्दिक सहानुभूति तुम्हारे साथ है।’ पर उन शब्दों ने उसे नहीं छुआ, मानों वे उसके लिए न हो कर किसी और के लिए हों । औपचारिकता पूरी करने के लिए वह मुस्कुराया था और बोला था - धन्यवाद। सात दिनों से वह तार टेबल पर पड़ा हुआ है। वह इसी तरह हरदिन आधी रातको होटल से लौटता है। कभी नीली आंखों में खोकर, कभी पश्चिमी धुनों में रंगकर वह आधी रातको थका हुआ लौटता है । फिर उसकी आंखें उस तारको देखकर चमकती हैं । जैसे उसके लक्ष्य के लिए तार का आना लाजिमी था और उसे पाकर वह खुश था । बहुत खुश था । बचपन से ही टूटी फूटी अंग्रेजी में बोलना, अंग्रेजी में सपने देखना और अंग्रेजी को ही अपना सबकुछ समझना- इन बातों की याद से ही उसमें प्रशन्नताकी लहर दौड़ जाती है । किस तरह से कुमारी का चयन होता है और कैसे कुमारी पूजा होती है ? कैसे घोड़ेजात्रा निकलती है ? - इन सभी सांस्कृतिक पर्वों को वह अपनी तरह से प्रस्तुत करता है । और देखता है कैसे सारी गोरी आंखें उसकी तरफ़ टकटकी बांधे देख रही होती हैं? कैसे जुडिथ और जेन्नी प्रसन्न होते हैं? वह याद करता है। उसे अपना जीवन खुसहाल दिखता है। न्यूयार्क के गगनचुम्बी इमारतों को वह रोज सपने में देखता है। वहां की स्वतन्त्रता की देवी को देख वह हमेसा खुश हो लौटता है। अर्थात् समुद्री किनारों मे वह लेटा है और टेपरिकार्डर पर नेपाली लोक गीत बज रहे हैं। बीच-बीच में वह खयालों में बह जाता है, और अपने को सामान्य बनाने की कोशिश करता है। पर यह बात पक्की है कि एक दिन कृष्ण एक गोरी टुरिष्ट को लेकर ढेर सारा आकाश लांघते हुए बहुत दूर चला जाता है। वहां के बहुत से अपरिचित स्वर मानों उसे बुला रहे हैं। कह रहे हों - एकबार हमारे यहां भी आओ। यहां हम तुम्हारे लिए गाइड होंगे। हम तुम्हें स्वागत करेंगे। हम तुम्हें ढेर सारा प्यार करेंगे। पर फिर वही तार, जो न होता तो अच्छा था। तार उसे एक बरस पिछे के समय में ला पटकता है और जो बात सोचना उसे कतई पसन्द नहीं वही सोचने को मजबूर करता है। तार जिस से सम्बन्धित है उसके चेहरे ने कभी उसको नहीं छुआ। तार को कब महत्त्व दे कृष्ण ने नहीं जाना। वह शहर में ही रहा जैसे 10 बरस पहले रह रहा था, सपने के पौधों में पानी डालता रहा। अभी तो उसे तार पढ़कर रोना चाहिए था। पर वह नहीं रोया। उसे मातम करना चाहिए था, वह भी उसने नहीं किया। आशौच में रहना था, फिर अन्य आवश्यक कार्य करने थे। कुछ प्रतिक्रिया तो दिखानी थी। पर उसके भीतर का तार ही ऐसा है- जो किसी भी चीज से टस से मस नहीं होता, कभी किसी तरह का करंट नहीं दौड़ता। कोई शोक या दुःख उसके हृदय को छु ही नहीं पाती। उस तार को भुलकर वह सोने की कोशिश करने लगा। छोटी आवाज में रेडियो चलाया। बत्ती बुझाई पर नींद नहीं आई। दिन के सारे सैलानी आकर पुछने लगे - यह कला कितनी पुरानी है? इसकी महत्ता क्या है? यह काठ खोदकर कलाकृति बनाने का प्रचलन अब है कि नहीं? आदि आदि। इस बात को भूलकर वह अपने कमरे की बात सोचने लगा। किराया तो वह महंगा ही देता है पर सुविधाएं कुछ भी नहीं है। सुबह उसके जागते ही नल से पानी जा चुका होता है। बिजली ज्यादा चलाया - मकान मालिक हरदम आरोप ठोंक देता है। सामने के खुले मैदान में बहुत से मकान बन गए। उसके कमरे से खुला आकाश बहुत दूर है। अच्छा सा कोई कमरा देखकर यह मकान छोड़ने की ईच्छा हुई उसे। फिर उस कमरे में ट्राभल सर्भिस की पांडे को डिनर पर बुलाने की ईच्छा जाग्रित हुई। लेकिन किराए के कमरे की खस्ता हालत के कारण उसकी यह छोटी सी ईच्छा भी पतली हुई जा रही थी। फिर उसकी आंखो में दूर का पहाड़ि गांव छा गया। बहुत वर्ष बीत गए वहां गए हुए भी। मन तो हर दसहरे में वहां जाने को करता है। वहां के लोक नृत्यों में भाग लेकर शहर की रिक्तता को समाप्त किया जाए। कुछ दिन वहां के नए चेहरे से अपने को बदला जाए। या नहीं तो वहां के आवारा लड़कों को धाक जमाया जाए - काम न हो तो शहर आ जाओ यारों। मैं नौकरी दिलवा दूंगा। पर उस पहाड़ के साथ वही औरत आ गई जिसे वह स्वीकार करना नहीं चाहता, कोई अर्थ उसे देना नहीं चाहता। पर तार जो आया है, लिखा है - तेरी बीवी कल गुजर गई। बिलकुल स्पष्ट लिखा है - तेरी बीवी कल गुजर गई...... तेरी बीवी कल गुजर गई......। बस यह तार ही उसके नींद मे रोड़े डाल रहा है। उसने स्वीच दबाया और कमरा रोशनी से भर ऊठा। वह उठकर टेबल तक पहुंचा और वही तार उठाकर जोर से पढ़ने लगा - तेरी बीवी कल गुजर गई...। तेरी बीवी गुजर गई....। तेरी बीवी गुजर गई...। सात-सात दिनों से वह इस तार को बारबार देखता आया है और फिर सोता आया है। पर आज क्यों बेमेल सी बाते हैं, ईच्छित-अनिच्छित प्रसंग हैं, वह कल और आज के वाणी को अर्थ देके रो नहीं सकता। शहर में अकेले रहते रहते क्या वह पत्थर बन गया है? उसे अपने आप पर गुस्सा आने लगता है। उसने उस तार के टुकड़े टुकड़े कर दिए और दहाड़े मारकर रोने लगा। उसे मालूम न हुआ वह कब तक रोता रहा..... रोता रहा.......।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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