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ऑनलाइन पर सुमन व साधना --परशु प्रधान
अभी हाल ही में एक कम्पुटर खरीदा वह भी सेकेन्ड हैन्ड। मुझे जब भी कुछ खरीदना होता है मेरे भाग्य में सेकेन्ड हैन्ड ही लिखा होता है। नया खरीदने के लिए कभी पैसे पुरे नहीं पड़े। जब सि. जी. मोटर साइकिल खरीदना चाहा तब भी यही हाल हुआ था। लाख कोशिश करने पर भी पुरे चालिस हजार की कमी रह गई। फिर दोस्तों ने पुरानी मोटर साइकिल मेरे शर में मड़ दिया। ऐसी बहुत सी बातों पर अपने भाग्य को कोशता आ रहा हूं। इसी अर्थ में पुराना कम्प्युटर भी जुड़ गया। ज्यादा नहीं हुआ है मैं कम्प्युटर सिख रहा हूं। टाइपराइटर में कभी भी अगुलियां नहीं सधी थीं। पर अब मैं बाध्य था। दुनिया को एक ही गांव में बदलनेवाले इन्टरनेट में मैं भी पहुंच गया। एक दूसरे से बोलकर नहीं तो लिखकर भी बात की जा सकती है। मैं एम. एस. एन. यानि की मैसेन्जर सर्विस में प्रवेश करना भी सिख गया। सिखने और जानने के क्रम में सेभ में पहुंच गया। वहां चैटिंग हुई थी दो जनों के बीच। सुना था चैटिंग रोमान्टिक व उत्तेजक होती है। सेभ की गई चैटिंग ओपन करके पढ़ने लगा। यह फाईल बहुत लंबी थी। कम से कम छ महीने हर दिन बातें हुई ही होंगी! वो सब तो मैं यहां नहीं कह सकता, न ही संभव है, फिर भी मैं मुख्य अंशो को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। इस में मैने कोई गड़बड़ी नहीं की है। सेभ की गई फाइल में जो थी उसी से मैंने चुनकर प्रिंट करके बातें यहां रखी हैं। चाहे जो अर्थ लगाएं मुझे कुछ नहीं कहना।
सुमन - साधना तुम कौन हो? मैं नहीं पहचानता। साधना - पर मैं तुम्हें जानती हूं। तुम महाराजगंज में रहते हो न? सुमन - ठीक कहा। कैसे मालूम किया? कुछ अपने बारे में कहो न। साधना - मेरा परिचय क्यों चाहिए तुम्हें? क्यों न ऐसे ही बातें करें? सुमन - लो बिन जान पहचान के भी बातें होती हैं क्या? मुझे तो अपने बारे में बताना ही नहीं पड़ा तुम्हें पहले से ही मालूम जो था। कृपया अपने बारे में कहो। साधना - मैं साधना हूं एक युवती। यही है मेरी पहचान। अभी एम. बी. ए. कर रही हूं। सुमन - दूसरी बातें भी कहो न। उमर कितनी है? सिंगल हो या डबल? घर कहां है? साधना - इतनी ज्यादा जानकारी क्यों चाहिए तुम्हें? चलो अच्छी अच्छी बातें करें, चैटिंग का मजा तो उसी में है। सुमन - फिर भी....। मुझे लगा तुम मुझे पसन्द करती हो। साधना - हां! नहीं तो कैसे मैं तुम्हारा पूरा बायोडेटा याद कर सकती हूं? तुम्हारे पिताजी नहीं हैं, है न? सुमन - हां, बचपन में ही पिताजी गुजर गए थे। साधना - तुम्हारी एक बहन है और नाम है सुजाता! सुमन - वो मारा ! तो तुम मेरी बहन के साथ हो? साधना - मैं नई दिल्ली में हूं, कहां से तुम्हारी बहन की दोस्त हुई। पर इतना जरूर है की मैं तुम्हें और तुम्हारे परिवार के बारे में जानती हूं। तुम्हें नौकरी भी अभी अभी ही मिली है। कम्प्युटर भी सिख रहे हो तुम। सुमन - अच्छा बाबा! मालूम हुआ मुझे। तुम मेरी इनसाइक्लोपिडिया ही हो। हां कहो तो मैं किससे प्यार करता हूं? साधना - मुझे मालूम है पर जाओ मैं नहीं कहती। सुमन - क्यों ? जलती हो क्या? साधना - जो भी हो! मुझे क्लास अटैंड करना है चलती हूं , कल मिलेंगे..... बॉय बॉय। सुमन - ठहरो न क्या जल्दी है? जा रही हो.....? अच्छा बॉय..बॉय...।
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साधना - तुम क्यों देर से आए? मैं तो बहुत देर से ऑनलाइन हूं। सुमन - अभी आ रहा हूं। पहले तो बिजली चली गई थी... फिर कैसे कम्प्युटर ऑन करता... हां मेरे कल के सवाल का जबाव दो? बताओ मैं किस लड़की से प्यार करता हूं? साधना - जो भी हो वो तुम्हारी प्रेमिका है। मेरी नहीं। पर उसका नाम जो है ‘स’ से शुरू होता है। सुमन - तब तो साधना ही है. साधना - हां साधना ही मान लो। कुछ नया है क्या? कैसी है तुम्हारी नौकरी? सुमन - तब तो तुम मुझे चाहती हो न? यह तो वन साइडेड हो गया लगता है। मैं तुम्हें चाहूं या ना चाहूं? ........... तुम अपने बारे में कुछ नहीं कहती। साधना - जब जरूरत पड़े कह दूंगी। मैं सिर्फ साधना हूं। उसके आगे या पिछे कुछ नहीं है। यानि कि मै सुश्री भी नहीं हूं, न ही श्रीमती। सुमन - तो क्या श्री हो? साधना - हां यदि चाहते हो तो श्री भी रख लो। कहो ना नौकरी कैसी है? सुमन - अच्छी है। अभी तो शुरू किया है। नोट बगैरह लिखने को कहते हैं। मुझे कुछ मालूम भी नहीं है। साधना - तुम्हें सिखना होगा। हां तो तुम्हारी हॉबी क्या है? सुमन - सिखने की कोशिश कर रहा हूं। मेरी हॉबी है सिर्फ प्यार करना। हां तो तुम्हारी हॉबी क्या है? साधना - प्यार करना भी कोई हॉबी है? वह तो प्राकृतिक प्रक्रिया हो गई। नारी पुरुष का सम्बन्ध भी कहीं हॉबी हो सकती है? वैसे मेरी हॉबी कुछ नहीं है। सुमन - चलो मान लिया, मेरी भी कोई दूसरी हॉबी नहीं है। अभी तो तुम से प्यार की बातें करनी है। कहो प्यार क्या है? साधना - मुझे क्या मालूम! तुम ही जानो! तुम मेरे साथ बातें करना चाहते हो........यही प्यार नहीं है क्या? सुमन - लो मुझे मालूम गया। तुम्हारे बारे में जाने बिना ही तुमसे प्यार हो गया। कितना आसान है ना प्यार करना। साधना - हां तो! मैं भी शायद तुम्हें प्रेम करती हूं। इसलिए तुम्हें ढूंढकर चैटिंग कर रही हूं। सुमन - थोड़ी सी ही सही अपने बारे में तो कहो। फिर मुझे आइडिया ढूंढने में आसानी होगी। साधना - क्या आइडिया ढूंढोगे। मैंने कहा प्यार करती हूं, काफी नहीं है.........? सुमन - लो मैं भी तो प्यार करता हूं। इतना लिखने से नहीं होगा? काठमांडू कब आ रही हो? साधना - दीवाली में आउंगी। हमारा घर वहां भी है। सुमन - यहां कहां? साधना - नए बानेश्वर में। कान्तिपुर के पहलेवाले ऑफिस के पास। मिलते हैं वहीं आकर।
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सुमन - कब आई? साधना - दो-चार दिन हो गये। सुमन - तब फोन क्यों नहीं किया? साधना - किया था, तुम घर पर नहीं थे। तुम्हारी मम्मी ने फोन उठाया था। सुमन - फिर.............? साधना - फिर क्या? कहां से, सुमन क्यों चाहिए, सुमन को कैसे पहचाना? पूछकर परेशान। सुमन - फिर तुमने क्या कहा? साधना - मैंने कहा ‘मैं सुमन की दोस्त हूं, साथ ही पढ़े हैं।’ सुमन - 'प्यार करती हूं सुमन से' यह भी कहा क्या? साधना - छी ! कैसी बातें करते हो? मम्मी से वैसी बातें करते हैं क्या। लगता है तुमने तो सब को बता दिया! सुमन - लगभग सबको मालूम पड़ गया है। क्या अफवाह क्या हकीकत। अब माघ या फागुन में शादी हो रही है भी कहा है। लड़की का नाम साधना है भी कह दिया मैंने तो। साधना - लो हो गया न फ़साद! तुमसे क्या झूठ बोलना, गौशाला में रहनेवाला एक लड़का मुझपर जान छिड़कता है। सुमन - कौन है वह लड़का? क्या मैं उसका सफाया कर दूं? मैंने तो तुमसे शादी करने की ख्वाहिस रखनेवाले बहुतों को मना कर दिया है। साधना - कितने हैं वैसे पिछलग्गू ? सुमन - हैं क़रीब आधा दर्जन। तुम्हारे यहां तो दर्जन ही होंगे! साधना - छोड़ो ये सब बातें। मुझसे मिलकर बातें किए बगैर तुम कैसे शादी का फैसला कर सकते हो? कैसे आदमी हो तुम? सुमन - कैसा आदमी? अपनी तो नीति ही है - प्यार करो बहुतों से, पर शादी करो सिर्फ एक से। साधना - मैं गूंगी, या बहरी हुई तो? काली कलौटी या कुरूप हुई तो। कैसे आदमी हैं आप। शर्म की बात है। सुमन - जो हो! मैंने फैसला कर लिया। मैं कहां औरों जैसा हूं? यह तो मेरी हिम्मत है.....आगे तुम्हारी मर्जी। अच्छा, कल एक बजे गोदावरी में मिलते हैं।
*** सुमन - गोदावरी में क्यों नहीं आई? ऐसा धोखा? साधना - क्या धोखा! खुद तो 104 डिग्री बुखार में तप रही थी। अभी भी बुखार नहीं उतरा है। बदन जल रहा है। सुमन - कैसा बुखार ....! प्यार का बुखार हो शायद। साधना - अच्छा हम लड़कियां तुम लड़कों जैसे थोड़े हैं, जब भी देखो प्यार का बुखार। सुमन - कौन सी दवा ले रही हो। सिटामोल लिया क्या? साधना - सिटामोल क्या करेगी। कड़ी एन्टिबायोटिक दवाएं दी है। अपना तो बदन भी थरथर कांप रहा है। टाइप भी मुश्किल से कर रही हूं। सुमन - लो जल्दी ठीक हो जाओ.... फिर बातें करेंगे। मैं तुम्हारे घर आ जाऊँ? साधना - क्यों आओगे? सुमन - तुमसे मिलने। तुम बीमार जो हो। साधना - ऐसी बीमारी में क्या देखोगे? अब आठ दश दिन बन्द!
*** सुमन - ठीक ही है। तुम कैसी हो! तुमने तो मुझे पागल ही कर दिया। मैं यहां तड़प रहा हूं की कब तुम निष्ठुर से मिलने का वक्त आएगा। साधना - कौन निष्ठुर? शर्म नहीं आती? अपने को कितनी वर्षों की तपस्या के बाद शिवजी मिले हैं और तब जाकर बातें हो रही हैं। सुमन - तो तुम पार्वती हो। मैं कब तुम्हारा हाथ मांगने आ जाऊं? साधना - फिर दक्ष प्रजापति के यहां जैसा न हो। मेरे पिताजी बहुत कड़े मिजाज के हैं। थोड़ा उन्हें मालूम पड़ गया की हमारी जानें ......! पिताजी तो पुलिस में। एक झटके में काट डालेंगे। सुमन - छोड़ो वो सब बातें। आजकल के पुलिस को तो मैं ही काट दूंगा। तो तुम दिल्ली कब लौट रही हो? साधना - मैं पुरी तरह से अच्छी नहीं हुई हूं। फिर दिसम्बर में फाइनल परीक्षा है। सुमन - तब हमारी शादी कब होगी? कल नगरकोट आ जाओ न! साधना - मैं ठीक ठीक नहीं कह सकती। बुखार नहीं उतरा है अभी तक। दिल्ली में थी, शायद मलेरिया हो। सुमन - तो अब मुझे मलेरिया भी मिलेगा तुम्हारी तरफ से। साधना - हां! मलेरिया दे सकती हूं। पर एड्स नहीं। सुमन - क्या पता! दिल्ली तो एड्स का अड्डा है, ऐसा सुना है मैंने। साधना - क्या पता!! मैंने तो सुना है काठमांडू में एड्स के रोगी ज्यादा हैं। कहीं तुम भी शिकार तो नहीं हो गए? सुमन - शिकारी तो मैं अवश्य हूं पर शिकार अभी तक हुआ नहीं। सच्ची मैं तो तुम बिन जी नहीं सकता। कितने दिन बित गए.................। साधना - मैं भी नहीं जिऊंगी। सुमन - मैं तो फांसी लगाकर मर जाऊंगा। साधना - मैं जहर ले लूंगी।
**** साधना - मैं इम्तिहान के लिए दिल्ली गई थी। उसी में व्यस्त हो गई। फिर पेपर भी अच्छा नहीं हुआ। सुमन - पर क्यों? पढ़ने का समय नहीं मिला क्या? गान्धी डिवीजन तो पक्का है न! साधना - वही तो! कैसे मुंह दिखाउंगी मां-बाप और दोस्तों को? जिन्दगी तो बर्बाद हो गई। कैसे जिन्दगी चलेगी? सुमन - अरे मैं हूं ना! तुम क्यों फिक्र करती हो? मैंने तो मुहूर्त भी निकलवा लिया। फाल्गुण 7 बहुत अच्छा दिन है। फिर प्रजातन्त्र दिवस भी है। साधना - क्या वह मुहूर्त अच्छा है? कहीं हमारी शादी भी प्रजातन्त्र की तरह धराशायी नहीं हो जाए। डाइवोर्स में तब्दिल हो कर?
**** साधना - कहो कहां मिलें। क्यों न शनिवार पशुपतिनाथ में मिलें? सुमन - बहुत अच्छा! मुझे कैसे पहचानोगी? साधना - नाक में बड़ा सा तिल जो है उसी से पहचानूंगी। पर मुझे कैसे पहचानोगे? सुमन - अच्छा तो कहो न! साधना - मैं काले पंजाबी ड्रेस में हूंगी। तुमसे थोड़ी ऊंची और गोरी हूं। सुमन - क्यों काले ड्रेस में। मैं काला हूं इसलिए? साधना - नहीं। अमरिका के न्यूयार्क के ट्रेड सेन्टर में कितने ही लोग मर गए, उन्ही के शोक में। सुमन - क्या मजाक है। मैं कितना सीरियस हूं। तुम तो मुझे ऐसे नचा रही हो जैसे बिल्ली चुहे को नचा रही है? साधना - तब तो तुम बिल्ली मैं चूही। सुमन - नहीं मैं चुहा तुम बिल्ली। साधना - लो दोनों बिल्ली और चुहे।
**** प्रदीप - हां देखो न बहुत बिजी रहा। इस बार गार्मेंट तो डूब गया। तुम्हारी शादी की बात चल रही है क्या? सुमन - हां! कैसे मालूम किया तुमने? ज्योतिषी हो क्या? प्रदीप - कब का मुहूर्त है? फाल्गुण 7 का, नहीं? क्या साधना से शादी कर रहे हो? सुमन - लड़की तो सुन्दर है, गोरी ऊंची है, है न? प्रदीप - कहां देखा? सुमन - पशुपतिनाथ में। बहुत ठंड थी। कूहरा भी छाया हुआ था। कितनी अच्छी दिख रही थी चांद जैसी। प्रदीप - विश्व सुन्दरी है क्या? तुम तो भाग्यवान् निकले यार। गुडलक। बातें हुईं क्या? सुमन - उस भीड़ में कैसी बातें? फिर एक बूढ़ी के संग आई थी। शायद मां हो। उसने मुझे पहचाना और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई भी। प्रदीप - हां तो तुम्हारी शादी तो तय ही हो गई। मेरी बधाई स्वीकार कर लो। सुमन - तुम्हारी शादी क्या की क्या तैयारियां है? प्रदीप - मुझे तो अब तक किसी चिड़या ने भी चारा नहीं डाला। तुम्हारा जैसा नहीं न है - ऑनलाइन में ही शादी खत्म। सुमन - फिर भी कहीं सुना था की तुम्हारी शादी हो गई। प्रदीप - शादी तो मार्गशीर्ष में ही हो गई। तुम्हें न्योता नहीं दे सका। सुमन - तो भइ! शादी कहां की? प्रदीप - नई दिल्ली में। सुमन - किसके साथ? प्रदीप - उसका नाम साधना है। सुमन - साधना? मेरी भी शादी साधना से ही हो रही है। फिर वह भी दिल्ली में ही पढ़ती है। प्रदीप - ओहो एक साधना तो मेरी हो चुकी..........दूसरी कौन होगी? सुमन - क्या पता! मुझे तो ऑनलाइन में मिली थी। प्रदीप - तब तो वह ऑनलाइन में ही वापस चली गई सुमन! चैटिंग जो है.... उसी में आई.... उसी में चली गई। सुमन - क्यों बेकार की बातें करते हो? क्या तुम साधना को जानते हो? प्रदीप - मैं एक साधना का पासवर्ड जानाता हूं। उसका पासवर्ड है ‘फूल’ है। तुम्हारी साधना का पासवर्ड क्या है? सुमन - मेरी साधना का पासवर्ड भी ‘फूल’ ही है यार! दोनो के एक ही पासवर्ड! मुझे तो चक्कर आ रहे हैं - यह सब क्या हो रहा है? प्रदीप - कुछ नहीं हुआ सुमन जी। तुम्हारी ‘फूल’ पासवर्डवाली साधना मैं ही हूं - और कोई नहीं है। मैं छह महीने से तुम से मजाक कर रहा था, माफ करो भी सुमन यार। सुमन - मेरा तो शर चकराया। मैं तो बहुत दूर जा चूका हूं, कैसे लौटूं पता नहीं। मैं तो पहाड़ की चोटी में था। तुमने तो मुझे पहाड़ से गिरा दिया यार।
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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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