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न्यूरोशिश

--परशु प्रधान

मन करता है कमरे से बाहन निकलूं। खुले और विरान मैदान में सारा दिन बिताकर लौटूं। कोई साथी हो, कोई गीत हो। छोटा मोटा खाना-बजाना हो, मनोरंजन हो। वातावरण में ही घुलमिल जाऊं, कुछ सोच सकूं। जिंदगी ऐसे ही कुछ खुशनुमा हो, मजेदार हो। किन्तु पिकनिक के खुशनुमा लम्हों के बीच फिर वही प्रसंग आ जाता है। मुझे लगता है मैं कभी भी मर सकती हूं। फिर छाती भारी होकर फुल जाती है। आंखें चुनचुना जाती हैं, चक्कर सा लगता है।

कोई पूछ सकता है- आपकी शादी नहीं हुई है क्या ? मेरे पास इस का स्पष्ट जवाब है- मेरी शादी को बारह बरस हो गए। बारह बरस का समय क्या कम होता है? पर एक भी कड़वाहटवाला दिन नहीं आया जससे हमारा संबन्ध खराब हो। वो मुझे बहुत प्यार करते हैं। मैं भी उन्हें बहुत पसंद करती हूं। हमारा दांपत्य जीवन सुखमय है। वो प्रेम में अभिभूत हो बुदबुदाते हैं- तुम न मिलती तो मैं जोगी बन गया होता।

"मैं मिली तो क्या बन गए ?" मैं पूछती हूं। "तुम मिली तब तो बच गया। मुझे जिंदगी मिल गई। इतने लम्बे सफर में निर्भरयोग्य जीवनसाथी मिली। मैं खुश हूं सुशीला, मुझे किसी बात का गम नहीं है।" वो हंस देते हैं। मैं चाय बनाने चल देली हूं। चाय लाकर टेबलपर रख देती हूं। उसी क्षण मुझे आभास होता है- यह चाय लानेवाली सुशीला किसी दिन मर जाएगी, अवश्य मर जाएगी। उसकी मौत से यह गर सूना हो जाएगा। सुशीला बहुत दूर पहुंच चुकी होगी- पहाड़ों के उस पार, क्षितिज के उस तरफ।

वो चाय लेने को बोलते हैं। मुझे लगता है मैं मौत के करीब पहुंच गई हूं। लगता है सामने मौत की नदी बह रही है और मैं किनार में खड़ी हूं। नदी बड़ी और गहरी है।

क्यों टकटकी बांधे देख रही हो...........? सवाल आता है।

लगता है मुझे कुछ होनेवाला है। मुझे चाय की थोड़ी भी तलब नहीं है। मुझे अंदर से कठिनाई सी हो रही है.....लगता है मैं संत्रासों के बीच में खड़ी हूं.....। अच्छी तरह से कह भी नहीं सकी थी कि मैं कुछ थोड़ी देर के लिए बेहोश हो जाया करती हूं, मेरे सामने जो भी चीजें है वे सब निरर्थक लगते हैं, निस्संग लगते हैं।

होश में आने पर दवाइयों के गंध से कमरा भरा मिलता है। वे शर में हाथ फेर रहे हैं। बच्चे मुंह लटकाकर आसपास बैठे हैं। मैं झेंप जाती हूं और कहती हूं- " आपलोग यहां क्यों बैठे हैं ? मुझे खास कुछ हुआ नहीं है।"

हर दिन घर में गोरखापत्र(अखबार) आता है। मैं सबसे पहले श्रद्धाञ्जलीवालीवाला पृष्ठ देखती हूं। आज कौन कौन लोग मरे हैं ? किस किस के बाप मरे हैं ? किसकी माताएं मरी हैं ? किसकिस ने श्रद्धाञ्जली दी है ? कोई नामवाला आदमी तो नहीं मरा है? ऐसा ही कुछ सोचती रहती हूं। फिर अचानक लगता है- मैं मर गई तो ? मैं मर गई तो...... नहीं मैं मरूंगी, जरूर मरूंगी और फिर गोरखापत्र में मेरेलिए श्रद्धाञ्जली छपवाई जाएगी। मेरा फोटो आएगा। पता नहीं कौन सी फोटो देंगे ? मेरी छोटी सी ही सही जीवनी छपेगी। जन्म और मौत का वक्त छोटा होता है।पता नहीं कौन कौन देंगे मेरे लिए संवेदनाएं ? वो और बच्चे तो अवश्य ही देंगे। मेरे होटल के सहकर्मी भी देंगे शायद। कॉलेज के दोस्त भी क्यों पिछे रहेंगे भला ? दूसरे न भी दें तो गीता और अनीता तो अवश्य ही देंगी। क्योंकि वे दोनों मुझे बहुत पसंद करते हैं। मेरे मरने के बाद उनकी संवेदनाएं और हार्दिकताएं।

"क्यों सारे फोटो निकाल कर रख रही हो ?" वो ऑफिस से थकेहारे लौटकर पूछते हैं।

"मेरे लिए श्रद्धाञ्जली छापने के लिए कौन सा फोटो जंचेगा, वही मालूम करने के लिए। यह पासपोर्ट साइज का फोटो ही ठीक होगा न ?"...... मैं कहती हूं।

मेरी मौत के बाद मैं गोरखापत्र के तस्वीर में सीमित हो जाऊंगी, वह भी सिर्फ दो-चार दिन के लिए। उसके बाद सब शून्य........... चारों तरफ अंधेरा.....।

"तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है क्या ?" वे नीले पड़ जाते हैं।

मुझे होश आने पर फिर वही पुराना वातावरण आगे छा जाता है। मैं हस्पताल के बेड में हूं और मेरे आगे पिछे डॉक्टरों की भीड़ जमा है। वे वैसे ही शर दबाकर बैठे हुए हैं। आसपास विटामिन और ताकत की गोलियों की भरमार है।

"कमजोरी से हुआ है....."

"क्या तुम कमजोर महसूस कर रही हो ?" वे पूछते हैं।

"वैसे मुझे खास कमजोरी तो महसूस नहीं  हो रही है। मुझे सिर्फ यही लगता है की मैं मर जाऊंगी। यह खयाल जाता ही नहीं..........।" मैं जवाब देती हूं।

रात सोते वक्त ही नहीं दिन में भी सपने आतै हैं और मुझपर धावा बोल देते हैं। जैसे मैं सपनों की कैदी हूं। कभी पहाड़ से गिरते सपने, कभी नदियों में बहते सपने। कभी सपने में सांड खदेड़ रहे होते हैं तो कभी राक्षस। यह सब इतना थका देनेवाला  और डरावना होता है की हर रोज त्रास से कुचली हुई आफिस पहुंचती हूं। काम में भी दिल नहीं लगता। कुछ देर पहले आए हुए सपने फिर परेशान करने लग जाते हैं। फिर अप्रत्याशित बेहोशी का डर.......... कहीं फिर बेहोश न हो जाऊं ? शंकाओं से घिरी रहती हूं। भय और त्रास से बंधी रहती हूं। कभी कभी टेलिफोन की घंटियां जगा देते हैं। बदन जकड़ा सा महसूस होता है। दूसरे दिन कटनेवाला बकरा याद आता है। चारों तरफ मौत दिखती है अपने आसपास मौत मड़राती सी लगती है। ऐसा डर मुझे कितने दिन जीने देगा.... मैं कितने दिन जी सकूंगी ? पता नहीं............।

कभी कभी खुदकुशी करने को जी करता है। फांसी लगाकर मरना, या पोखर में डुबकर, आर डि सोनाल के बहुत सारे टेबलेट निगलकर या और कोई आसान तरीका ? मरनेवाले किस साहस से मरते हैं ? मुझे सिर्फ यही लगता है कि मैं नहीं रहूंगी, मैं खत्म हो जाऊंगी। मैं मर जाऊंगी..... सब समय यही लगता रहता है।

बेटा आकर अपनी पढ़ाई की बात करता है। अपने टीचरों की प्रसंसा करता है। सिखे हुए नए अंग्रेजी शब्द सुनाता है। स्कूल में खेले हुए नए नए खेलों के बारे मे बतलाता है। पर मैं सब समय शून्य सी पड़ी रहती हूं। उसे देखकर मुझे अपनी मौत से और भी डर लगता है। मैं मर जाऊंगी तो यह छोटा बच्चा क्या करेगा ? यही भय सताता रहता है। फिर मैं कुछ नहीं कर सकती। मेरे हाथ पैर कमजोर पड़ जाते हैं। खुद से विश्वास उठ जाता है और खुद से डर जाती हूं। पलकें झुकी हुई लगती हैं। छोटी छोटी बातें भी सपने जैसे लगते हैं। और फिर मैं बेहोश हो जाती हूं।

घर के सामने एक पेड़ है जिसका किस्म मैं बता नहीं सकती। उसकी शाखाएं फैली हुई हैं। कभी कभी उसी पेड़ से खुद को तुलना करने लग जाती हूं। पर उस पेड़ की जैसी गहरी और मजबूत जड़ें तो मेरे पास नहीं हैं, मैं जड़ विहीन हूं। मेरी शाखाएं भी उतने फैले हुए नहीं है। वसंत ऋतु में हरे पत्तों से पेड़े ढक जाता है। मेरे पास तो हरे पत्ते न कभी थे न होंगे। शाम ढलने को है और फिर रात भी आ जाएगी। रात के अंधेरे में मुझे उसी पेड़ से डर लगता है। मेरी छाती फुल जाती है। मैं क्यों डर जाती हूं, मुझे खुद मालूम नहीं। पर एक बात तय लगती है - किसी दिन मैं उसी पेड़ में लटक रही हूंगी....किसी दिन...।

कभी रातभर नींद नहीं आती। प्रसंग बे प्रसंग की बातें सताती रहती हैं। लगता है नींद में हूं पर आंखें कच्ची ही रह जाती हैं। फिर सोचती रहती हूं - मैं मर जाऊंगी एक दिन, अवश्य ही मर जाऊंगी। किसी दिन मैं इस संसार में नहीं रहूंगी। एक दिन तो तय है.... मैं मर जाऊंगी...मर जाऊंगी। इसी बात का डर मुझे खाए जा रहा है।

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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 


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