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मेरे कमरे की आंख से

--परशु प्रधान

      मैंने देखा है उसे टकटकी बांधे आकाश की तरफ देखते हुए। उस बरामदे के सतह से वह क्या देखना चाहती है ? मैं कह नहीं सकता। पर उसके काली काली आंखों की बरौनी, मौन और झुका हुआ सर, छिपा हुआ सौन्दर्य, दिल के भीतर छुपाकर रखे हुए बहुत सी चीजों से मुझे उसका जीवन रहस्यमय लगता था। कभी कभी लगता है की उसकी आंखें मुझे ही देख रहीं हैं पर मुझे उन आंखों में खाली सपने और खोखली भावनाओं के सिवा कुछ नजर नहीं आता। क्या मुझे देखते वक्त उसकी आंखों में कुछ कल्पनाएं आती हैं? क्या सोचती है वह ? मैंने भी कभी जानने की कोशिश नहीं की । आधी रात को कभी सुरीली आवाज में गीत भी सुनता हूं । लगता है अंधेरी रात में वेदना सुरीली कंठ से कोई  कोयल गा रही है । एक अजीव सा दर्द, दिल की हृदयविदारक पुकार से भरे हुए गीत से उस चौराहे का वातावरण कुछ अलग सा बन गया है । मेरी नींद के पंख आधी रात को ही कट जाते हैं और मेरे हृदय पर बसे उसकी आंखों में मैं उसकी जीवन इतिहास ढूंढने लग जाता हूं, उसकी जीवन कथा पढ़ना चाहता हूं, उसका जीवन दर्शन उधेड़ना चाहता हूं। पर मेरी कोशिशें, मेरी इच्छाएं अपने आप ही सिमट रहे हैं। उस वक्त मैं खुदको रात भर पिये हुए पियक्कड़ को सुबह होनेवाली कमजोरी जैसी कमजोरी, शक्तिहीनता और दुर्बलता से भरा हुआ पाता हूं और मैं मेरी कल्पनाओं को पूरा न जी पाते ही फिर मुर्दा बन गया पाता हूं।

      उसकी जीवन कथा जानने की कुतूहलता से मेरे दिल में बारबार टीस उठ रहे हैं। नए नए डेरे पर अचानक आप कौन कहते हुए जाने की भी हिम्मत नहीं है, इसलिए मेरी कुतूहलता भीतर ही भीतर  जमी जा रही है। शादी तो हुई ही होगी? पर क्यों उसकी जवानी मरुस्थल बन गई? वो पति के घर क्यों नहीं जा सकी? वह क्यों ऐसी हो गई?

...

      ‘कहां हो के आ रहे हैं?’ मृदुला ने हरि के अन्दर आते ही कहा।

      ‘नये सड़क की तरफ सैर कर के।’

      ‘शायद फिल्म देख आए हैं?’

      ‘क्या देखना?’

      ‘मेरे दिए हुए पैसे दिखाएं जरा’ हरि बोल नहीं पाया। शरम से उसका सर झुक गया।

      यह बात मुझे कल ही मालूम हुई की उसके पति भी हैं। आज से करीब तीन साल पहले उसकी शादी हुई थी। उसके पति अच्छे और खुले विचारोंवाले है । वैसे तो कम ही नाटक होंगे जिसमें हरि ने भाग न लिया हो। हरि आधुनिक विचार रखनवाले प्रगतिशील युवक हैं। सभी कहते हैं - हरि और मृदुला की अच्छी पटती है, अच्छा प्रेम है दोनो में।

      हरि कुर्सी पर बैठ पत्रिका पढ़ने लग गए और मृदुला चाय बनाने लग गई पर फिर हरि को पत्रिका पढ़ने का दिल नहीं किया। वह अनायास आईने के सामने पहुंच गए और अपने ही चेहरे को गहरी नजरों से देखने लगे। उनके सामने वीणा की तसबीर उतर आई। वीणा भी कम सुन्दर नहीं है। उसने और मैंने बचपन से नाटकों में भाग लिया है, साथ साथ खेले हैं, साथ साथ पले बड़े हैं। यहां की धूल भी हमें पहचानती है। उसने मेरे मन को पहचाना है, और मैंने भी। फिर वीणा पढ़ी लिखी भी तो है।

      ‘चाय लीजिए।’ मृदुला का स्वर हरि की कानों में पहुंच गया। हरि चाय पिने लग गए। चाय की घूंट अन्दर जाती थी और विचारों के सिलसिले हरि के कान, होंठ और दिल रोके जा रहे थे। मेरी तो बीवी है, मैं कैसे वीणाको प्यार कर सकता हूं? किसी एक की इकलौती आत्मा दूसरे की कैसे हो सकती है? क्या हो गया है मुझे? मृदुला जैसी अच्छी बीवी को छोड़कर मैं कैसा स्वर्ग ढूंढूं? हरि को लगा वे पागल हो रहे हैं। मृदुला ! बेचारी मृदुला - मुझे क्या कहती होगी, क्या कहेगी? ‘मृदुला से पहले आप पर मेरा हक है क्योंकि मैं ही उससे पहले आपके दिल  के कोने में पहुंच गई थी। मैं आपके सिवा किसी दूसरे की हो ही नहीं सकती।’ यह कैसी जीद है वीणा की। हरि क्या जबाव देते, वीणा जीद पर अड़ी थी ‘अब आप ही जबाव दें, हरि! ऐसे कैसे झूला जा सकता है? इससे तो जीवन में सिर्फ ऊपरी रंग आएगा, चमक तो गायब रहेगी।’ पर्दे में ढ़ेर सारे दृश्य बदल रहे थे। ‘फिर मैं कैसे मृदुला के प्रेम को तोड़ सकूंगी, हरि? उसकी श्रद्धा, उसकी भक्ति, कैसे?..... कैसे......?’ कहते हुए दूर के पहाड़ नजदीक आ रहे थे।

      हरि ने विचारों की शृंखला को पत्रिका के पन्नों की तरफ मोड़ना चाहा। जल्दी से एक समाचार पढ़ डाला। आज शामको एक सोलह वर्षीया युवती ने अपने ही घर में खुदकुशी की। पुलिस जांच-पड़ताल कर रही है। उस युवती का साया हरि के आंखों में बना रहा। एक अज्ञात भय और शक ने घेरा उन्हें। कहीं वीणा तो नहीं?............. नहीं, उन्होंने अपने आपको समझाया।

      हरि ऐसे दोराहे पर खड़े थे जहां एक ओर मृदुला का स्वच्छ व पवित्र प्रेम उलझा हुआ था तो दूसरी ओर वीणा के हृदय की पुकार और अभीअभी जागा हुआ उनका पुराना प्रेम। पहले रास्ते को सामाजिक मान्यता मिल चुकी थी तो दूसरे में दो चार कांटे तो थे ही। इन्हीं विचारों में खोए हुए हरि ने अचानक कहा- ‘मृदु ! दोचार दिन मायके हो आओ न।’ हरि ने यह आग्रह दबे स्वर में कांपते दिल से किया था। लगा उनके प्यार की यही अन्तिम बोली है।

      ‘मेरे यहां रहने से आपको बाधा होगी तो मैं खुशी से चली जाउंगी। कब जाऊं? आज ही?’ मृदुला के कंठ में प्रेम का जादू था।

      हरि बोल नहीं सके। कोई बात ही जुबान पर नहीं आई। केवल विचारहीन सर जाकर वीणा की गोद में अपना भविष्य देखने लगा। हरि पत्थर बन गए थे, पर हर पल के श्वास में तीव्रता आ रही थी।

      मृदुला की आंखें बरस पड़ी-‘आजकल क्यों आप उदास और खोए से रहते हैं? अवश्य ही आपके मन में बहुत सी बातें खेल रहीं होंगी?’ हरि बच्चों की तरह रोने लगे घिघियाते हुए।

      ‘आप मुझे क्यों कुछ कहते नहीं?  आपका ऐसा क्या है जो मुझसे छिपाना है? मैं क्या इतनी दूर हो गई? कहें आपकी सुखद जिन्दगी के लिए मैं क्या कर सकती हूं?’ मृदुला कहती गई-‘मुझे मालूम है तीन महीने से आपकी मानसिक प्रवृत्ति ठीक नहीं है। मेरा कहने का मतलब यह नहीं की आप मुझे बिलकुल प्यार नहीं करते, पर आप मुझे प्यार करते हुए भी कहीं खोए से लगते हैं। कहिए, क्यों सुख रहे हैं ऐसे?’

     ‘भले ही मैं सुख जाऊं मृदु, तुम सदा खिलती रहो, इसी में मैं सन्तोष कर लूंगा। मैं बंजर बनकर भी तुम्हें खिलता हूआ फूल देखना चाहता हूं। क्योंकि तुम्हारा इतना गहरा प्यार समझने के लिए मेरे पास हृदय ही नहीं है।’ हरि को लगा- वे कभी मृदुला के प्यार को छोड़ नहीं सकते। वीणा उनकी जीवन साथी बने, असम्भव है। वे विवेकशील इंसान हैं। ऐसा अपराध उन्हें शोभा नहीं देता। फिर, फिर वीणा ‘मैं आपको नहीं छोड़नेवाली चाहे जान चली जाए’ कैसे कह सकती है? वीणा के ऐसा कहने पर भी हरि का चुप रहना, उनकी कमजोरी नहीं तो और क्या है? उन्होंने खुद को नहीं पहचाना। लेकिन जहां एक ओर वीणा के गालों में, आंखों में जितनी वासना है, यौवन है दूसरी ओर मृदुला तो ठूंठ दिखती है। वीणा जितनी पढी लिखी है उसकी तुलना में मृदुला तो गंवार दिखती है- हरि को ऐसा ही कुछ लगता रहा।

      उसी दिन मृदुला मायके चली आई। उसके साथ एक निशानी रह गई। अब उसे घर लौटना ही नहीं पड़ा। मायके के घर के बरामदे से चारों तरफ के पहाड़ों के सिलसिले, फैलावट व उनकी निर्माण शैली ही उसके लिए देखने की चीजें थीं। उसके मायके आने के पांच दिन बाद ही हरि कहीं गुम हो गए थे, सायद वीणा भी। मृदुला पति से अपनी जुदाई से ज्यादा दुखी हरि के गुम हो जाने से हुई और बहुत रोई। ‘हरि मुझे प्यार करते हैं’ इस वाक्य का सिर्फ ठंडापन ही मृदुला के साथ रहा।

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      रात बहुत गुजर चुकी थी। शायद वो ही गा रही होगी, ‘आंऊगी, मिलने आंऊगी’, रात के सूने आकाश में किसी मूरत की राह देख रही होगी। मृदुला का वह गोल, आकर्षक व गम्भीर चेहरा मेरे आगे नाचने लगा। मैं खुद को खो कर उसके सपने पकड़ने की चाल में लग गया। मेरे कमरे की आंखों से वह सिर्फ पच्चीस हाथ की दूरी पर थी। मुझे लगा - अब वह क्या चाहती होगी? मेरे कमरे की आंखें उस की कहानी से हटकर किताब के पन्नों में गुम होने लगे। न जाने क्यों पन्नों पर दो चार बूंद टपक पड़े थे।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 

 


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