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लावारिस --परशु प्रधान
मुझे नहीं मालूम कब मेरे पैर काठमांडू एयरपोर्ट पर पड़े। जब से न्यूयार्क में हवाई जहाज में बैठी, मै होशोहवाश में नहीं थी। कहां हूं ? क्यों हूं ? और क्यों नेपाल जा रही हूं ? लेकिन सोच का यह सिलसिला बीच में ही टूट जाता और मां का अशक्त, असमर्थ चेहरा मुझसे पूछता- "कान्छी, क्या तू मेरा मुंह देख पाएगी ? मुझे यकीन नहीं।" मैं अपनेको ही समझाती - मां का मुंह देखूंगी, उनके अंतिम दर्शन करूंगी, क्योंकि मुझे मालूम था - वह चेहरा अपनी अंतिम किनारों में है, स्वरों में है। डूबता हुआ पिताजी का वह चेहरा अब भी सपने के किसी छोर में पूच रहा होता है - 'अपने अंतिम समय में सिर्फ़ तुमको याद किया, सिर्फ़ तुमको, अपनी छोटी बेटी सृजना को।' मैंने संकल्प किया - वह भूल, वह इतिहास न दोहराऊंगी, उसी पश्चाताप की आग में फिर न जलूंगी। मैंने तब झट टिकट लिया और जहाज मैं बैठ गई। मन में सिर्फ़ एक ही आवाज गूंज रही थी- ''मम्मी सीरियस हुनुहुन्छ - बेवारिश हुनुहुन्छ"( मम्मी सीरियस हैं - लावारिस हैं)। टेलिफोन के सिर्फ़ दो शब्द मेरे मन में थे - और ये शब्द थे 'सीरियस' अंग्रेजी और 'बेवारिस' नेपाली। हवाई जहाज के कई यात्रियों के बीच मैं अकेली थी जैसे जंगल में खोया हुआ कोई पखेरू। पहले जब काठमांडू में थी तब भी लगता - कुछ नहीं मिल रहा है - किसी चीच की कमी है। कुछ न होने का एहसास मेर हरदम पीछा करता रहा। न जाने क्यों अमरिका पहुंचकर भी वह एहसास मेरा पीछा नहीं छोड़ सका. लगता है मैं कहीं शून्यों के बीच में हूं, अभावों के बीच में हूं और नहीं होने के एहसासों के बीच में हूं। जब अस्पताल पहुंची तो वहांकी दुर्गंध से एक पल सांस फूल गयी, लगा - कौन से नर्क में आ पहुंची। नाक बंद कर भीतर घुसी और सीढ़ियां चढ़ने लगी। बाहर की दूषित गंध बाहर भी सराबोर थी। अचानाक कमरे में मां का चेहरा दिखाई दिया और मेर डर गयी - यह मात्र नर कंकाल का ढांचा जैसा था। "मां आंखें कोलो ! मैं आ गयी।" मैं अचानक चिल्ला उठी मेरी आवाज सुनकर उन्होंने आंखें खोली। वे शुष्क थीं, उनमें कोई पानी न था। "कैसी हो मां?" मैंने पूछा, उन्होंने फिर आंकें कोली और धूमिल स्वर में कहा- "सृजना, तू अमरीका से मेरा मुंद देखने चली आयी..... अब मेरा तो आखिर समय है।" "अब मेरा आखिर समय है....." मेरे गले में गांठ पड़ गयी। आंसू छलकने को हुए। लगा कहीं भयावह सुरंग में प्रवेश कर रही हूं। "मां, मैं आ गयी अब .... आपको अमरीका ले जाउंगी, वहीं दवा कराऊंगी......मां, मेरी मां ! अब फिक्र मत करो।" मैं आवेश में थी। मन कर रहा था बहुत जोर से रोऊं, इता रोऊं कि आकाश थर्रा जाए। लेकिन वह समय उसके लिए नहीं था। थोड़ी देर मे बड़े भैया आ पहुंचे और हड़बड़ाने लगे - "सृजना तू आ गयी। परसों ही तो तुझसे बात हुई थी। तेरी आने की बात नहीं थी। इतनी जल्दी कैसे अचानक........." "ये मेरी भी मां है बड़े भैया। मुझे और आपको जन्म देनेवाली मां। इधर मां की यह हालत .... मैं कैसे न आती ?" मैंने उन्हें दन्डवत किया। फिर क्यों मैं अपने ही भीतर रोने लगी..... "ब्रेन हेमरेज का डर था, लेकिन हुआ नहीं। एक साइड पैरालाइसिस है। डॉक्टर साहब कहते हैं घर ले जा कर दवा कर सकते है। लेकिन.............." इसी बीच डॉक्टर साहब आ पहुंचे और गरजे- "मैंने आप लोगों को मां को घर ले जाने को नहीं कहा था क्या ? पांच दिन से डिस्चार्ज पेपर्स तैयार हैं। क्या सोच रहे हैं आप लोग ?" डॉक्टर साहब ने मां का ऊपरी परीक्षण किया और पहले की बात पर जोर देने लगे - "कल से मैे इन्हें नहीं देखनेवाला। घर में देने के लिए दवाएं लिख दी है। अच्छी तरह से देखभाल कीजिएगा।" मैंने फिर मां का चेहरा देखा और लगा जैसे डूबता हुआ सूरज हो। वे जिन्दगी के अंतिम और सच्चे पल में थीं, मैं थोड़ी देर के लिए विगत में चली गई - जहां पिताजी भी थे। कितना प्रिय और घनिष्ट संबंध था मां-पिताजी का, पड़ोसियों के लिए आदर्श जोड़ी थे और थे ईर्ष्या के पात्र। मां, पिताजी और सब की प्रिय पात्रा मैं थी, छोटी सृजना उर्फ सृजू। घर में कोई त्यौहार हो, मुझे नये कपड़े देनेकी बात छिड़ जाती। घर में कोई मेहमान आए, तो मेरी तारीफों के पुल बांध दिए जाते। मेरी सुन्दरता और अच्छे नसीब की बांते मैं खुद नहीं समझती थी - क्या मायने हैं इन सब के ? इतने में छोटे भैया आ पहुंचे। कमरे में प्रवेश करते ही चौंक गए, "अरे तू आ गई।" मैंने उन्हें प्रणाम किया। कमरे का वातावरण कुछ बोझिल सा हो गया। बड़े भैया ने छोटे भैया की तरफ देखा जैसे कुछ कहना चाह रहे हों, लेकिन कुछ बोले नहीं। उसी तरह छोटे भैया ने मेरी तरफ देखा और कहने लगे-"क्यों बिन बताय़े चली आय़ी, एक फोन तो कर सकती थी कम से कम।" "छोटे भैया समय न था। मुझे बस इताना लगा जैसे उड़कर यहां पहुंचू। मुझे डर था कहीं मां के अंतिम दर्शन न कर सकूं। परंतु मेरे भाग्य ने साथ दिया। कम से कम मां के दर्शन तो मैं कर सकी...।" मैं सहज होना चाह रही थी। फिर वहां बड़ी भाभी भी आ पहुंची। हम सब लोग अनायास सचेत हो गए। मुझे अचानक वहां देखकर बड़ी भाभी चौंक गयीं - "ननदरानी भी अमरीका से आ गयीं, क्यों इत्तला नहीं की ? हूं.... करीब एक सप्ताह हो गया डॉक्टर साहब ने मां को घर ले जाकर दवा कराने की बात कही हुई थी। लेकिन हम लोग कुछ तय न कर पाए।" मैं जवाब नहीं दे सकी। लगा भाभी सारा इतिहास सुनाने जा रही हैं, वह न रुकीं, "ननदरानी भी आ गय़ी , अब मुश्किलें हल हो सकती हैं। ननदरानी, मैं तो मां को घर ले जाकर दवा दारू कराने की स्थिति में नहीं हूं। ये और मैं सुबह आठ बजे एक साथ काम पर निकलते हैं और शाम सात बजे लौटते हैं। इस स्थिति में दिनभर मां की देखभाल कौन करेगा ? बच्चे स्कूल चले जाते हैं। घर मे तो ताला लगा रहता है।" भाभी ने अपनी लम्बी दास्तान सुनायी। समय फिर थम गया। भाभी के इन शब्दों ने मां की आंखें खोल दी। उन्होंने हम सबको गौर से देखा। कमरे के चारों तरफ आंखें दौड़ायीं और फिर पलकें बंद की। मैं एक बार उन्हीं में रुपान्तरित हो गयी और पहुंची भविष्य में - यही क्षण आगे मेरी जिंदगी में भी आएगा। समय, स्थान और वातावरण फर्क हो सकते हैं। मैंने मन में सबको धिक्कारा, इसके पहले कि मैं अपना मुंह खोलती छोटे भैया बोल पड़े- "भाभी बिलकुल ठीक कह रही है। मैं उन्हें गलत नहीं कह सकता। लेकिन मेरी भी मजबूरी है कि मैं भी मां को नहीं ले जा सकता। बहू को गर्भाशय का कैंसर हुए बरसों बीत गए। वह चारपाई पर पड़ी है। मुझे उसी की सेवा टहल से फुरसत नहीं है। एक बीमार के ऊपर दूसरी ले जाकर मैं क्या करूं ?" "तू कैसे यह कह सकता है ? जब मां का सब कुछ तू उयभोग कर रहा है।" बड़े भैया ने बीच में ही टोका। इस वक्त नर्स भीतर आ पहुंची - "आप लोग क्या मशवरा कर रहे हैं ? माझियों की सलाह कहीं नाव न डुबोये। आज भी मां को घर नहीं ले जा रहे हैं क्या....." नर्स कह बैठीय़ उसने थर्मामीटर लगाके ज्वर नापा और मां को एक कैप्सूल निगलने को कह कर चली गयी। "तो क्या मां को मैं अमरिका ले जाऊं ?" मैं कहने को मजबूर हो गई। मुझे मालूम था - मुझे यही कहना पड़ेगा। कुछ वर्षों में ही यहां के समाज की अधोगति के बारे में मैं अखबारों में पढ़ चुकी थी। जहां एक पति पत्नी को मुंबई ले जाकर बेच रहा है, एक भाई अपनी बहन को जबरन वेश्या बना रहा है, ऐसे समाज में मुझे लगा मैं ठीक प्रस्ताव पेस कर रही हूं। मैं सत्य के बहुत नज़दीक हूं। मेरे भाइयों ने एक दूसरे की तपफ़ देखा। मुझे लगा वे यही चाह रहे थे। मैं उस कमरे से बाहर निकली और परामर्श के लिए डॉक्टर के यहां पहुंची। और जैसे एक बाल अपना तैयार किया गया पाठ सुनाता है मैंने अनुरोध किया - "डॉक्टर साहब, मैं मां को अमरिका ले जाना चाहती हूं। आप क्या सलाह देते हैं ?" डॉक्टर साहब भीड़ में थे। उन्हें बहुत से रोगियों और अन्य लोगों ने घेर रखा था। फिर भी उन्होंने मेरी तरफ़ आंख उठाई- "आप अमरिका में रहती हैं ? ग्रीन कार्ड होल्डर हैं क्या ?" "मैं बहुत वर्षों से अमरिका में हूं। मैं सोच रही थी, वहां यहां से अच्छी दवा दारू हो सकती है। यति आप अनुमति दें तो....." मैंने कहा। इसके पहले कि वह मेरे प्रश्न का जवाब देते पलटकर मुझ से ही अनुरोध करने लगे, "मुझे इस अस्पताल में काम करने को जी नहीं करता, आप क्या उधर मेरे लिए कुछ सहायता कर सकती हैं ?" मुझे लगा - यहां सिर्फ डॉक्टर साहब ही अनुरोध नहीं कर रहे, बल्कि सारा राष्ट्र, सारी जनता अनुरोध कर रही है, सब मुझसे याचना कर रहे हैं। "मैं करूंगी डॉक्टर साहब, जो मुझसे बन सकेगा। क्या नहीं हो सकता अगर आप चाहें तो ? लेकिन मैं अभी मां के बारे में सीरियस हूं...... आप क्या सलाह देते हैं ?" मैंने फिर अपनी कहानी दुहराई। "ब्रेन हैमरेज से पीड़ित वृद्धा को आप कैसे अमरिका ले जा सकती हैं ? बिलकुल असंभव। उन्हें तुरंत यहां से ले जाइए और आराम करने दीजिए - यही है मेरी सलाह।" जब डॉक्टर साहब से सलाह लेकर बेड की तरफ लौटी तो भाई लोग बाहर निकलने की जल्दी में थे। "हम लोग जाते हैं - ऑफिस पहुंचना है," कहकर वे निकल गए। मैं घबरा गई - मुझे मालूम नहीं था ऐसे वक्त मुझे क्या कहना चाहिए। वास्तव में मैं नर्वस हो गई थी। क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है मुझे कुछ मालूम न था. "मां आप कैसी हैं ?" मैंने मां से पूछा। मां ने थकित आंखें खोली और मुझे घुरने लगी जैसे मैं कोई अनजान हूं। और उन्होंने अनुभव किया जैसे वह एकदम नयी जगह में हैं। "मुझे मरने दे..... मुझे और जीने की चाह नहीं है। मुझे कुथ नहीं चाहिए।" मैंने मां की आंखों मे ये पंक्तियां पढी़। वह जल्दी से सलाइन वाटर पाइप, ऑक्सिजन पाइप वगैरह निकाल फेंकने लगी। मैंने चाहा वह यथास्थिति में हों। अचानक उनकी आंखों में मृत्यु की क्रूरता प्रकट होने लगी। मैंने नर्स को बुलाया। लेकिन मां शायद अंतिम क्षणों में थी। उन्होंने सदा के लिए आंखें बंद कर लीं। मैं सिर्फ चिल्लाती रही - "मां .... मां....मेरी मां.... मेरी मां......."
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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