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कोशिश ! कोशिश ! कोशिश ! --परशु प्रधान वह पुराना कोट वहीं लटक रहा है, जिसे मैं पुरी तरह अपना भी नहीं कह सकती, न ही वह कोट किसी दूसरे का है । वही कील में वह लगातार रहा है । उसका आसमानी रंग धीरे धीरे फीका हो रहा है, जो कि अपना पसंदीदा रंग है । उस कोट की जेब में एक चिट्ठी है जो करीब एक साल पहले किसी लडके ने भेजा था । छह महीने पहले मैंने चिट्ठी खोली थी तब ५-६ लाइनें पढ़कर बन्द कर दी थी इसलिए कि मुझे भय था, मैं एक अपरिचित जैसे लडके का, एक तरुण का प्रेम पत्र पढ़ रहि हूं।बाकी लाइने बिना पढे ही लिफाफे को पहले की तरह बन्द कर दी थी और फिर कभी उसे खोलकर देखनेका साहस नहीं जुटा पाई थी । मुझे मालूम था यह मेरी कमजोरी है, फिर भी मैं कुछ नहीं कर पाई थी । एक बार मेरी नींद आधीरात में ही खुल गई । अनायास मेरी आंखें कोट की तरफ मुड़ गयीं । वहां चिट्ठी लिखनेवाला नौजवान खड़ा था । यह कल्पना ही मानें, क्योंकिं उस आदमी का पुरा चेहरा देखने को नहीं मिला है । वह नौजवान मेरे बिछौने की तरफ बढने की कोशिश करने लगा । मैने हंसकर कह दिया - तुम्हारी चिट्ठी मैने पूरी पढ़ी नहीं है । एक वर्ष तक जवाब लिखने को भी जरूरी नहीं माना मैनै । फिर कयों यह अनर्थ कोशिश ? यह कोशिश नहीं है । मैं तुम्हारा ही कोट हूं । मेरा प्रेम नहोकर वह मेरा शरीर है । सब समय ठंड से ठिठुरने को कौन चाहता है ? मै आऊंगा आहिस्ता से......... क्यों ? रात मनमोहक व गहरी थी और मैं उसी मे डुबना चाह रही थी । यह बात सायद उस कोटको मालूम पड़ गई हो । रातभर वह मुझसे चिपककर सोया । वह नरम था । यों कहें वह मांसका मुलायम पिंड था । मैंने उसका स्पर्श किया । उसकी गरमाहट महसूस की और उसको चूमा । वह आहिस्ता से कहने लगा- कुछ देर पहले तो मना कर रही थी.... मैंने तो सिर्फ कोशिश की थी । फिर कुछेक रातों तक तो वह कोशिश मुझे भाती रही लेकिन एक खराबी यह थी की मुझे हर दिन नहाना पड़ता । नल बहुत दूर था पर मैं जाने को मजबूर थी । अब वह कोशिश ऐसे बदल गई । मुझे परिवर्तन पसंद नहीं । मुझे खुद को बदलना भी अच्छा नहीं लगता । लेकिन वह हो गया । एक सुबह नल में नहाते वक्त एक मर्द की अंगूठी मिल गयी । वह नहाने आया होगा । पहाड़ो में नहाने की जगह एक ही होती है ।मैं दिन भर अकेले वही अंगूठी से खेलती रही कमरे में । सब लोग उस अंगूठी को सोने की अंगूठी मानने लगे । मैं बारबार उस अंगूठी को सूंघती रही कमरे में अकेले बैठकर । वह गंध गुलाब के फूल में नहीं था, चमेली के फूल में भी नहीं था । वह मेरे लिए अनूठा किन्तु मीठा गंध था । उस अंगूठी को सन्दूक में बन्द कर देने पर भी दोपहर में किसी के देख लेने का भय था । रात को मैं वह अंगूठी तकिये के नीचे रखकर सोने लगी । उसकी मीठी गन्ध से रात में मेरी नींद कभी नहीं खुली । इतनी अच्छी नींद सोने लगी की कोई बलवान जवां मर्द दो-दो बाहों मे मुझे समेटे हुए हो । उसके लाल होंठ मुझे जकड़े हुए हों । अगले दिन सुबह उस आदमी से नल में मुलाकात हुई। वह थोड़ा मुस्कुराया और मुझसे बात करने की कोशिश करने लगा । मुझे उसका मुस्कुराना तनिक भी अच्छा नहीं लगा । मैंने डाँटने के अन्दाज में कहा - "मेरे नहाने के वक्त ही तुम्हे यहां आने को किसने कहा ?" "मुझे रात भर नींद नहीं आती । मेरी पत्नी को गुजरे छह महीने बीत गए । सुबह बिन नहाए मैं रह नहीं सकता...... ।" उसने जवाब दिया । "अच्छा ...... ऐसा है........ ?" थोडी देर बाद उसने अपनी अंगूठी गुम होने की बात कही । मैंने वह बात हंसकर टाल दी । उसके बाद वह आदमी मेरा पीछा करने लगा । जब देखो पीछा करता रहता। जब मैं बस में उठना चाहती हूं, वह पहले से ही मौजूद मिलता है । मै पहाड़ की चढाई करना चाहती हूं, वह पहले से ही पहुंच गया होता है । मैं पुल पार करना चाहती हूं, वह उस पार मिलता है । मैं नदियों के बहाव पार करना चाहती हूं, वह पार कर चूका होता है । उसकी आंखें मेरा पीछा करती रहतीं । मैं जब सोना चाहती वे मुझ पर चोंच बरसाते रहतीं । मैं जब उठना चाहती वे मेरा रास्ता रोकते रहते । मैंने उन आंखों को पसन्द नहीं किया, उनसे घृणा की, उन्हें अस्वीकार किया । एकबार मुझे आईना देखने की इच्छा हुई । बहुत दिन हुए थे- आईना देखे हुए । पर आईना देखने पर मुझे भ्रम सा हुआ कहीं मेरा चेहरा बदल तो नहीं गया है । किसी ने मेरे चेहरे पर कालिख पोत दी है । मुझे अन्दर से डाह होने लगा । भीतर कहीं कुछ जलने लगा । मैंने रोना चाहा पर रोने की शक्ति भी अब मुझमें नहीं थी । मैंने आकाश थर्राते हुए चिल्लाना चाहा, इसके लिए भी मुझमें कुछ नहीं बचा था । मैं कमजोर कुरूप और अर्थहीन बन गयी थी । आश्चर्य के बड़े से प्रश्नचिह्न के अलावा मेरे पास कुछ नहीं था । वह अंगूठी किसी ने चुरा ली थी और मेरे पास उस अंगूठी का गंध का भ्रम और लेश मात्र बचा था । मैंने उस मर्द के गंध को ढूढ़ा । मगर वह नहीं था । कमरे में नहीं था, सन्दूक में भी नहीं था । मै छटपटाई, पागल जैसी हो गई । लगा कोई कह रहा है- "इसकी शादी नहीं होने वाली ।" मै समझ गई वह आदमी क्या कह रहा है, मैंने हामी भर दी । क्यों कि मैंने कभी शादी करना नहीं चाहा । मैं शादी को बंधन मानती । हर मर्द मेरे लिए राक्षसी था, दानवी था । कभी सड़कों पर पेड़ की छाया में पिछलग्गू से मुलाकात हो जाती । वह जब देखो तब गंभीर था, उसे हंसते हुए मैंने देखा नहीं था । वह चिन्तित रहता था और उसकी आंखे अब चुभनेवाली नहीं रह गयी थीं । मैने सन्तोष की सांस ली- वह बूढ़ा हो चला था - छह बच्चों का बाप । वह कोट की चिठ्ठी मुझे हमेसा उम्र के लम्बे पगडंडियों में जबरन खींच के ले जाती है । खाईयों मे जबरन धकेल देती है । एक बार एक तालाब में नहाने की इच्छा हुई - विश्वास था ऐसा करने पर सब पाप धूल जाएंगे । वैसे खुद को यकीन तो नहीं था कि इतने पाप किए है जिन्हें धोना पड़े । पर जब इच्छा हुई तो गई पूरा करने । एक-डेढ़ घंटे तक पानी में डूबती रही खुद को धोया और बाहर निकल आई । अरे ! यह क्या ? छाती में मेरे स्तन गायब थे, जिन्हें मैंने सहलाकर, सम्हालकर रखे थे । जिन्हें किसी भी मर्द के कठोर हाथों ने नहीं छुआ था । मैं घबरा गई । मेरी छाती पर दो छोटे छोटे धब्बे थे, गोली लगने से बने घाव जैसे मैन पेशाब करना चाहा । यह क्या ? इधर भी 'योनि' कहां थी ? यह तो लम्बा और टेडा लिंग में बदल चुका था । वहां योनि की कोई भी चिन्ह शेष न बचा था, जिसे मैंने अबतक अपना सर्वस्व मानकर, कुमारीत्व मानकर सहेजकर रखा था । मुझे शर्म, ग्लानि व क्षोभ ने एक साथ घेरा । मै आकाश से गिर गई । तालाब से दौड़कर घर पहुंची । कमरे में घुसकर दरवाजा बन्द किया । सब से पहले उसी मर्द की चिट्ठी पढने की इच्छा हुई । चिट्ठी तो वही थी पर उसपर लिखे शब्द सब मिट चुके थे । वह चिट्ठी बहुत पुरानी हो चुकी थी । मैं रोने लगी, अन्दर ही अन्दर चिल्लाने लगी । मैं छटपटाई, मै लुट गई । दूसरे दिन मां दरवाजे के पास खड़े होकर खुसर फुसर कर रही थी - "बेटी ! मत कह कि तू बूढ़ी हो गई । कल ही हमने तेरी शादी तय की है । शायद तुझे लड़का पसन्द आ जाए । वह कहता है बहुत बरस पहले उसने तुझे पत्र लिखा था जिसका जवाब तुने नहीं दिया।" मैं मां से कैसे कहूं- "मैं पुरुष बन गयी । मेरा स्त्रीत्व गुम हो गया । मैं तालाब में डुबी और बदल गई । " मैं कैसे कहूं ? मेरे ऊपर उसकी सारी कोशिसें नाकाम हैं । मैं कैसे नंगी होऊं ? कैसे प्रदर्शित होऊ ? कैसे...... ?" "तुझे शादी करनी ही होगी" मां की आवाजें मेरे भितर ही चक्कर काट रही सी लगती हैं, घुम रही सी लगती हैं ।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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