|
|
|
|
गांव में -परशु प्रधान अब गांव शुरू हो रहा था । पर यहां शहर ही कब था - फिर भी यह गांव अन्य गावों से बहुत अलग था । नाम मात्र की पगडंडी जिस पर एक एक पग कठिनाई से आगे बढ़ता । पगडंडी के दोनों तरफ बिच्छू के पेड़ की झाड़ियां थी । थोडा़ इधर उधर किया कि उनके डंक से जल जाने का भय । फिर पगडंडी गन्दगी से भरी पडी़ थी और चलने योग्य नहीं थी । गांव में काफी घासफूस की झाड़िया होंगी, मेरी इस कल्पना को इस वक्त धोखा हुआ था । पेड़ की शाखाओं में छोटे छोटे गुच्छों के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया । जो जंगल और पेड़ थे वे शायद वर्षों पहले समाप्त हो गये थे और अब गांव मरुस्थल बन रहा था । शायद इसलिए वहां तपती गर्मी थी । रास्ते के दोनों तरफ पत्थर के छतों वाले छोटे छोटे झोपड़े दिखाई देते । पर उनके दरवाजे और खिड़कियां देखते ही मन कड़वा हो जाता । कैसे अन्दर घूसा जा सकता है इतने छोटे दरवाजे और खिड़कियों से ? रास्ते में कुछ वृद्ध-वृद्धाएं मिले जो मौत के कगार पर थे । उनके कपड़े देखते ही विरक्ती पैदा हो जाती । दश जगहों पर पैबन्द लगे वे कपड़े पन्ध्रह बीस साल पुराने तो थे ही, शायद उन्हे धुले हुए भी वरसों हो गये थे । उनकी आंखों में विषाद की छाया से अलग कुछ न था । उन्हीं में से एक बृद्ध को मैंने पूछा आपकी उम्र क्या है ? वह मुस्कराने की चेष्टा करने लगा । लेकिन नजाने क्यों असफल रहा । उसने वहां की स्थानीय भाषा में धीमी आवाज मे कुछ बातें कही । जो मैं समझ न सका । बस, मैं इतना समझ पाया की उसे अपनी उम्र याद नहीं । मै फिर आगे बढ़ गया- रास्ता प्रायः चढा़ई वाला था । कहीं समतल रास्ता मिल जाता तो शरीर हलका महसूस होता । नहीं तो पूरा शरीर थकावट से चूर था । चढा़ई में कुछ अधेड़ मिले । उनके डोको भी कुछ फर्क किस्म के थे । 'क्या ढो रहे हैं -' मैने पुछा । 'चावल !!' जवाब आया । 'कितने दिनों से ढो रहे हैं ?' 'हो गये पांच-सात दिन ।' 'इस गांव में धान उगता नहीं क्या ?' 'धान के लिए खेत नहीं हैं । सिर्फ थोडी़ गेहूं की फसल होती है । हमलोग वही खाते हैं । यह चावल भी दशहरे के लिए जुगाड़ है ।' वहां की स्थानीय भाषा में उसने कहा । मैं बस थोडा़ ही समझ सका । आहिस्ता आहिस्ता मैं गांव में घुस गया था । गांव क्या था- दो चार पत्थर के झोपडे़, मैले-कुचैले लड़के लड़किया । पुराने और पैबन्द लगे उनके कपडे़ । फिर उनके हाथ-पैर ऐसे मानो कुष्ठरोग ने उन्हें जकड़ लिया हो । लगा जैसे वे हाथ-पैर गलने को हैं और वे मौत की तैयारी में हैं । मैंने एक वृद्ध को पूछा 'क्या हुआ है इन बच्चों के पैरों में ?' 'इन्हें पिस्सूओं ने काटा है हुजुर । यह कुष्ठ नहीं है ।' 'पिस्सूओं को मार नहीं सकते क्या?' मैंने फिर पूछा । इस प्रश्न का जवाब उसके पास नहीं था । लेकिन उन लड़के लड़कियों की हाथ-पैर इतने गन्दे थे की मुझे उबकाई सी होने लगी । उन सबके पैर सूज गये थे, उन में मवाद भरा हुआ मालूम पड़ता था और वे चल भी नहीं सकते थे । स्कूल वहां से बहुत दूर था और वे स्कूल जाने की स्थिति में नहीं थे । अब कुछ खाना जरूरी हो गया था । मैं बहुत भुखा अनुभव कर रहा था । लेकिन मुझ अकेले को खिलाने के लिए वहां बडी़ समस्या थी । गेहुं के सुखे चपाती और नमक-मिर्च के अलावा वहां कुछ नहीं था । चावल ढुंढ़ने के लिए भागदौड़ शुरू हो गयी । कुछेक घन्टों में खाना तो तैयार हो गया लेकिन मुश्किल से दाल-भात और नमक मिर्च । सब्जी भी खाने में आवश्यक है- इस बात की न वहां जानकारी थी न ही परम्परा । दूसरे घर में एक औरत बहुत मुश्किल से रोटी बना रही थी । मुझे लगा कि वह बहुत बीमार है । रोटी खाने के लिए वह जीवन से संघर्ष कर रही थी । कुछ दूरी में एक छोटा बच्चा रो रहा था । वह चार हाथ पैर पर खडे़ होकर जोर लगा रही थी जैसे एक और बच्चा जनने वाली हो । लेकिन वैसा कुछ न था । उसने आज ही बच्चा जना था और किसी और से खाना न बनवाने की वहां की प्रचलन की शिकार हुइ थी । वह खुद ही खाना बनाने को बाध्य थी और कल से ही उसे गेहुं की फसल काटने के लिए जाना था । मुझे लगा आज ही वह बच्चा मर जाएगा, उसे भवसागर से मुक्ति मिल जाएगी । जब वह अर्समर्थ होती दहाडे़ मार कर रोती, बिलखती और चिल्लाती । मैंने माथे पर हाथ रखकर परमेश्वर को याद किया । गांव में तरुण तरुणी कोई दिखाई नहीं दिए । शायद कोई जात्रा व पर्व में दिखाई पडें । औरतों के वक्षस्थल मुरझा गए थे । उनके शरीर में यौवन की कोई निशानी नहीं थी । २५-३० की औरतें ५०-६० की और बेहद गन्दी लगतीं । उन्हे अपने शरीर के बारे में कुछ ज्ञान नहीं था । वे बच्चे जनने के लिए जन्मीं थीं । उन्हें जीने की चाह नहीं थी । उनकी आखों में मात्र सन्त्रास की परछाइयां खेलती दिखाई देतीं जिन में आकांक्षाए, भावनाएं और सपनों के पौधे नहीं होते । क्या वे औरतें ही हैं - मैं वैसा ही कुछ सोचता रहा, बहुत देर तक । मुझे और भी दूर जाना था । रास्ते में अनेक ऐसे गांव आते और पिछे छुट जाते । मुझे लगता वे गांव नहीं हैं, सिर्फ मूर्दों की बस्तियां है । वहां कोई जीवन नहीं था, उत्साह व उमंग का वातावरण मीलों परे था । लगता था गांव में अभी-अभी लड़ाई छिडकर थमी है । सिर्फ ऊंचे ऊंचे नंगे पहाड थे वहां । कोई हरा पौधा मिलना बहुत मुश्किल था, न कोई झरना, न जल प्रवाह । शाम होने को आई थी और मैं जल्दी में था । लेकिन मेरे पैर नाकाम हो रहे थे । मैं अपने को बहुत थका हुआ महसूस कर रहा था । मैं चाह रहा था- कहीं जाके आराम करूं और शान्ति से रात काटूं । मेरा मन बहुत उदास और हताश था । रास्ते में कुछ बदलाव नहीं हुआ । वही तंग पगडंडी, बिच्छू के पेड़ के झूरभूट और गंदगी । जहाकहीं दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध । फिर रास्ते में कडे़ व नुकीले पत्थर थे जिनपर पैर रखने पर ऐसा लगता मानो अंगारों पे चल रहे हों । मैं वहां से दूर खडी़ सेती हिमाल देखने की चाह में था- लेकिन वह हिमाल वहां नजदीक तो था नहीं । और मुझे बहुत जल्दी थी क्योंकि रात होने को आई थी । रात में अच्छी जगह कहीं मिलेगी सोने की- यही सोचकर मैं आगे बढता रहा । रास्ते में दो चार लोग नीचे उतर रहे थे, वे सब पिये हुये थे और उनके पैर डगमगा रहे थे । उन लोगों के बीच में कोई झगडा़ भी चल रहा था, शायद ताश के कारण हो । वे स्थानीय भाषा में चिल्ला रहे थे जो मैं नहीं समझता था । वे मुझे रोकने की कोशिस करने लगे । लेकिन मैं उनको छलकर दूसरे रास्ते की तरफ हो लिया । मुझे मालूम था वे दिनभर रक्सी (देशी शराब) पीकर और ताश(जुवा) खेलकर लौटे हैं । अब उनका काम घर पहुंचकर अपनी औरत को मारना था । दूसरा रास्ता और भी कठीन था । मैं सशंकित हो रहा था कहीं मैं सही जगह पर पहुंचुंगा भी या नहीं । लेकिन मुझे जैसे भी हो पहुंचना ही था । इस रास्ते में बिच्छू की झाडियां कुछ अधिक ही थीं । एक बिच्छू के झाड़ में एक औरत दिखाई पडी़ । वह एक चिमटा लेकर जल्दी जल्दी बिच्छू की कलियां चुन रही थी । अब रात होने को आई थी । मैं उसके नज़दीक पहुचा और बिन पूछे न रह सका 'बहन, क्या कर रही हैं ?' 'बिच्छू की कलिया चुन रही हूं ।' वह जल्दी में थी । 'क्यों चुन रही हैं ?' 'हमारे लिए खाने को सिर्फ यही है । और कुछ नहीं है ।' उसने अपनी विवशता प्रकट की । 'क्यों, गेहूं नहीं होता क्या ?' 'ना...........' वह शरमा रही थी, लेकिन शरमाने जैसी बात कोई नहीं थी । मुझे मालूम था वे सिर्फ बिच्छू के पेड की कलियां ही खाते हैं । वह थोडी समझदार लगी मुझे । मैने फिर पूछा 'इस गांव में आपलोगों को क्या-क्या चाहिए ?' '.....................' वह नहीं समझी । 'आप नहीं समझी - आपको पानी, रास्ता, स्कूल में से किस चीज की ज्यादा जरूरत है -' मैंने उसे फिर स्पष्ट करते हुए पूछा । 'हमें कुछ नहीं चाहिए ।' उसका छोटा जवाफ था । मुझे उससे बातें करना अच्छा लग रहा था । लगा वह कहीं बाहर होकर आई है । क्योंकि उसकी भाषा में थोडी़ ही सही स्पष्टता थी । 'फिर भी...........' मैंने जोर लगाया । 'हमलोगों को बिच्छू के पेड की कलियां तक भगवान ने नहीं बक्सा । एक किस्म का कीडा़ इसे नष्ट कर रहा है । सारे पेड़ में कीडे़ पड़ जाते हैं, पत्ते तक नहीं रहते । हमें सिर्फ काटें मिलती हैं खाने को..........।' वह रुआंसी हो गयी । 'फिर ..............।' 'आप हमें वह दवा दीजिए जो इन कीड़ों को मार सके.........हमारी जरूरत बस इतनी है ।' वह जाने की जल्दी में थी । 'और कुछ नहीं चाहिए..............?' 'कुछ नहीं........................।' जब मैंने आखें खोली तो वह वहां से निकल चुकी थी । मैं बहुत देर तक सोचता रहा, सोचता रहा और फिर आहिस्ता आहिस्ता चढा़ई चढ़ने लगा ।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |