|
|
|
|
फिर आक्रमण --परशु प्रधान सदा की तरह वह दरख्त खड़ा है। भीमसेनपाती का बूढ़ा दरख्त। उसकी पतली सी गंध फैली है मेरे कमरे में। मुझे कहीं से छुकर बाहर चली जाता है। उसको देखते ही मुझे रूलाई फूट पड़ती है। बचपन और जवानी के सपने लौट आते हैं। कभी-कभी अरूण नदी में पानी का स्तर बाढ़ से बड़ जाती है। कभी उस पार के हिमाल को कुहरा ढक देता है। कभी पास की छोटी-छोटी नदियां रातभर सां ...सां आवाज करती है। यही बाढ़, वही कुहरा और नदियों की सां सां के संग रमते रमाते हुए मैं बहुत बूढ़ी दिख चुकी हूं। सबेरे का सूनापन, दोपहर का सूनापन और फिर शाम का सूनापन। केवल शून्य, अनंत शून्य। सुबह का अरूणोदय और घर पिछवाड़े का आम का पेड़। सदा एक चकोर आता है और एक चकोरी को लेकर दूर कहीं उड़ जाता है। उस वक्त की मीठी सी चूं-चूं। मुझ जैसा ही अकेला है वह दरख्त। भीमसेनपाती का बूढ़ा दरख्त। सबेरे जागकर पिताजी को तंबाकू तैयार करना होता है। तंबाकू पीते हुए पिताजी का सोचमग्न बूढ़ा चेहरा देखना बहुत अच्छा लगता है मुझे। इसलिए मैं चुपचाप सामने बैठ जाती हूं। पिताजी सोचते होंगे - अच्छा किया बेटी ने। कुछ दिनों के लिए तो खर्चापानी चल जाएगा। वैसे बेटी बदली नहीं है। सिर्फ थोड़ा चेहरा...........! पिताजी के होंठ हिलते हैं - ‘हां बेटी ! रह नहीं पाई तू ! भाग गई ?’ मैं स्वीकारोक्ति में शर हिलाती हूं, मानों लज्जा नाम कि कोई चीज मेरे पास नहीं बची है। पिताजी मुझे देखते रह जाते हैं देर तक। वहां से भाग जाती हूं और पहुंचती हूं कोठेबारी में। आम के फूल फूट चुके हैं। आज तो गुलाब भी पूरी तरह से फूट चुका है। साग की पत्तियां भी लहलहा रही है। दिल भारी हो उठता है। फिर हृदय में कुछ चुभाता है माने का पतला चेहरा। दो औरतें मर चुकी हैं उसकी। चेहरा देखते ही घिन आती है। वह भाग आई। अच्छा ही हुआ। रास्ते में कहीं कुछ कर बैठे? डर लगता है। कहीं आम का पेड़ पकड़ न ले, भीमसेनपाती का बूढ़ा दरख्त भी तो कम नहीं हो सकता, फिर गुलाब में तो पकड़ने के लिए कांटे भी हैं। चारों ओर सिर्फ पकड़नेवाले ही तो हैं। सब षड़यन्त्र रच रहे हैं - मुझे नंगी करने के लिए। मैं नहीं होती नंगी - नहीं होती। क्यों सब समय कुहरा छाया सा रहता है? फिर वही बात। एक शाम पिताजी मेरे कानों में कुछ कहते हैं और एक आदमी के पिछे भेज देते हैं। उसके घर पहुंचने पर पता लगता है - मुझे बीवी बनाने के लिए ले आया है। मैं रात भर शादी करके छोड़ देनेवाले शौहर को याद करती रहती हूं। कैसे बदलता हैं गंभीर चेहरा। गहरी आंखें। न चिट्ठी आती है, न जगह की निश्चितता है। कैसे कोई आदमी भूल सकता है। सिर्फ प्यार ही कुछ नहीं होता। पर प्यार नहीं था न ही है। उसे विश्वास करना ही होगा। कितना बीहड़ और कितना सूना। कहां है यहां आम का पेड़? कहां है बूढ़ा भीमसेनपाती का दरख्त? मुझे लगता है तुरंत घर लौट जाऊं। मेरा शौहर दिनभर मेले में रहता है। शाम को थकाहारा लौटता है। उसे थोड़ा ही सही गरम भात चाहिए। पर चावल कहां हैं? मैं तो दिनभर अरूण की लहरों को गिनते हुए बैठी रहती हूं। वह थककर कहता है - ‘भूख लग रही है।’ कुछ नहीं है। सच कुछ नहीं है। है तो सिर्फ अरूण का ठंडा पानी। रात को सोते वक्त मैं कहती हूं - ‘व्यर्थ में मुझे क्यों ले आए बैल बेचकर। बैल होते तो बहुत कुछ हो सकता था।’ वह लम्बी सांस लेता है - ‘बीवी भी तो................।’ ‘बीवी ला के क्या खिलाओगे? क्या है तुम्हारे पास? सभी औरतें अच्छा खाने के लिए और अच्छा पहनने के लिए ही तो शादी करती हैं। मैं मायके लौट जाती हूं। कैसे रहूं ऐसी जगह?’ वह मुझे बाहों में लेकर रोने लगता है। देर तक रोता रहता है। मर्द के आंसू। मेरा हृदय में चीरे पड़ जाते हैं। बाहों से ही जिया जा सकता है क्या? सबेरे ही वह कहता है - ‘तुम पोइल चली जाओ। औरत की इच्छा पूरी हो गई।’ वैसे और कितनी ही इच्छाएं है जो पूरी नहीं हो सकतीं। आंखें मूदकर मैं फिर अपने भागनेवाले शौहर को याद कर रही हूं। मैं भी तो भाग जाना चाहती हूं। पर सपना ! यह कैसा पतला सपना है? फिर तो मैं मायके लौट जाती हूं। पिताजी की बूढ़ी आंखें फटी रह जाती हैं। वे जानते हैं बेटी लौट आई है। मां पहले तो रूठ जाती हैं फिर कहती हैं - ‘आने के लिए तो आ गई बेटी, नजाने पड़ोसी क्या कहेंगे?’ मैं कहती हूं - ‘मां ! क्या फिर दूसरा मर्द नहीं मिलेगा?’ कह तो देती हूं पर अन्दर कहीं कुछ दुखता है। पिताजी हंस देते हैं। यह कैसा क्रम? लेक की फुसफुस वर्षा और घना कुहरा। बेसी की गर्मी और धूपी की हवा सब पहचानते हैं मुझे। पर मैं भागती हूं पहाड़ से। मैं मानों मांगने के लिए ही बनाई गई हूं। दिनभर कुछ नहीं होता मुझें। रात होते ही बदन थक सा जाता है, और सामने आते हैं वही मर्दों के दुर्गधिंत सांसें, उनकी चापलूसी भरी बातें और उनकी चिकोटी काटने का क्रम जो मेरी रात की नींद भगा देते हैं। दिनभर बादल छाए रहे और वर्षा की संभावना बनी रही। ऐसे वक्त में शौहर बहुत याद आते हैं। शादी का मंडप और उससे निकलता धुवां। अंगूठी और क्लिप बगैरह झिलमिलाते रहते है। कभी तो मैं कोसने लग जाती हूं। भागना ही था तो क्यों शादी की? किसी की लड़की की जिन्दगी। सब जिन्दगियां अच्छी तो नहीं होती। कितना अंधेरा है घर बगैर शौहर के। ओह मां.......... कैसे एक ही रात में पूरा भविष्य गुम हो जाता है। कैसी बेहोशी मेरी? कैसी नींद मेरी? दोष तो मेरा ही है - मैं मर जो नहीं सकी। गा नहीं सकी मौत के गीत। हर कानाफुसी मुझे बर्बाद कर जाती है। मालूम है पर मैं चुप हूं। क्यों चुप हूं? मां तुम मुझे बता दो। पिताजी आप इसका रहस्योद्धाटन कीजिए। गांव के बन्धुसखा क्यों मुझे बड़ी बड़ी आंखों से देखते है? हरे!! मैं कैसे छेड़ी जा रही हूं! वह चमेली मुझे कैसे घुरती है, बाटुली कैसे नहीं बोलती। मानों मैं डायन हूं। मैं पुरे गांव की डायन हूं। घर सुधर नहीं रहा है। सिर्फ व्यवहार चल रहा है। समझ नहीं पाती हूं यह कैसा व्यवहार है! वे ढेर सारे मर्दों की बलिष्ठ जांघें ! वे ढेर सारे सुखे पैर! मां मैं बेहोश हो जाती हूं। मुझे उन सब से घृणा होती है। मितली आती है। मैं थक चुकी हूं। मेरी विवशता! पिताजी आप मेरी मजबूरी नहीं समझते और एक के बाद एक मर्द मेरे पिछे लगा देते हैं। सदा घर घर कहने से मेरी यह हालत हो गई है। कितना सुनुं मैं - व्यवहार ऐसा ही होता है। सदा जाते वक्त कहते हैं - जल्दी भागकर आ जाना। मैं कितना भागूं! कितना भागूं!! कितना कठिन है जीना। याद भी नहीं करना चाहती उन मर्दों को। सब को मालूम हूआ है मेरा भागना, मेरा पोइल जाना। दो चार हुए अच्छा है। कानाफुसी नहीं है। सलाह नहीं है। रूपये की छन् छन् नहीं है। मैं खुश हूं। मुझमें गंध नहीं है। पर चोली फट गई है। धोती अच्छी नहीं है - बहुत दिन हुए। जो भी हो पशुओं की रौंद नहीं है। खुलकर सांस ले पाई हूं। बेधड़क करवट बदल पाई हूं। ऐसी रातें कितनी अच्छी लगती हैं। बहुत दिनों बाद वे रातें फिर लौट आई हैं । वे ठंडी हवाएं फिर लौट आई हैं। पर व्यवहार बन्द पड़ गया है। पिताजी ज्यादातर व्यवहार की बातें करते वक्त मुझसे रूठे रहते हैं। कैसे शरम को ढका जाए? मां भी खुश नहीं है। सुबह पिताजी के लिए तंबाकू तैयार करने को भी जी नहीं लगता अब। षड्यन्त्र और शक के सिवा पिताजी के चेहरे पर कुछ नहीं है। कितना पापी है वह चेहरा। अब हर रात पिताजी मुझे आक्रमण करते हैं। हां वह एक आक्रमण ही तो है। खेतों में धान पककर झुक गए हैं। आकाश उजाला है। मैं नींद से जाग जाती हूं। रात के सपने सब भुल जाती हूं। एक सीधा आक्रमण पिताजी का। मैं खुद चौंक पड़ती हूं। मेरा चौंकना बढ़ रहा है। पानी के नाले सुख रहे हैं। रास्ता साफ है। आक्रमण का प्रभाव मां पर भी पड़ा है। वे बहुत कम बोलती हैं। खाना भी कम खाती हैं। कभी कभी रात को अचानक मेरे कमरे में आ जाती हैं और लौट पड़ती हैं डायन की जैसी आंखों से चारों ओर देखकर। मैं सोने का नाटक करती हूं। गुस्से से भुनभुनाते हुए वे लौट पड़ती हैं। ठंड का मौसम आ रहा है। हवा ठंडी बहती है। उस पार का हिमाल बर्फ से ढका रहता है। सूरज ऊपर ही कहीं खो जाता है। सारे पेड़ सुख गए हैं। सुखे से फटे खेत देखने में अच्छे लग रहे हैं। पर मैं अपने आप सुख रही हूं। छटपटा रही हूं। पाप का गड्डा बढ़ रहा है। एक दिन पिताजी चल बसते हैं। मौत एक बृद्ध की। मां आगे बैठकर रो रही हैं। बाल फैलाकर मैं भी रोना चाहती हूं। पर स्वर गले में ही अटक जाते हैं। लगता है पिताजी की आंखे कह रही हों - मुझे तेरी मां ने मार दिया। जहर दिया मुझे तेरी मां ने। मैं बेचैन हो जाती हूं और याद करती हूं आक्रमण। फिर आक्रमण............। लड़ाई हो रही है उमर में और बन्धन में। हां केवल आक्रमण हो रहा है। केवल आक्रमण। भीमसेनपाती का वह दरख्त मुझे छेड़ रहा है। वह एक दरख्त है और बूढ़ा हो रहा है। मैं तो एक जीती जागती औरत हूं और उसकी शाखाएं काट रही हूं फिर भी वह चुप है। मैं उसकी शाखाओं के बीच से देखती हूं पिताजी की लाश जा रही है। शंख की निरन्तर ध्वनि से वातावरण विषम बन गया है। रात होते ही डर लगता है। पिताजी का चेहरा सपने में आकर पूछता रहता है - ‘अच्छी हो ? क्यों काटा भीमसेनपाती को?’ कितनी धूमिल है जिन्दगी? कितना कठिन है जीना? हां बहुत कठिन। वाटिका का गुलाब भी मुरझा गया है। अब कमरे में भीमसेनपाती का कोई गंध नहीं है। पता नहीं मां क्या सोच रही है। लड़ाई हो रही है छाती में और मांसपेशियों में। रात हो आई...... उफ ...... फिर आक्रमण।
भीमसेनपातीः एक पेड़ जिसकी पत्तियां औषधी के रूप में काम करती हैं। लेकः ज्यादा ऊंचाईवाले पहाड़ जहां ठंड बहुत होती है। बेसीः बहुत कम ऊंचाईवाले पहाड़, पहाड़ों के आधार जहां गर्मी बहुत होती है। पोइल जानाः लड़की या औरत का दूसरे मर्द के साथ भाग जाना।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
|