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एकाकी

परशु प्रधान

          मैं नये बानेश्वर के बस-स्टाप पर खड़ी हूं। यह अब कहां पहले का बानेश्वर रहा। यह तो पहले का असन-भोटाहिटी लगता है। जिधर देखो लोगों की भीड़ गाड़ियों की धक्कामुक्की। सभी जल्दी में हैं - न जाने कहां जाते हैं और क्या करते हैं। बाह्रबिसे, धुलिखेल और बनेपा के लिए बस आते हैं, थोड़ी देर के लिए रूकते हैं व आगे बड़ जाते हैं। मुझे कहीं जाने की या कुछ करने की जल्दी नहीं है। फिल्म देखने की चाह भी नहीं है। कभी भी इस तरह का इंतजार नहीं किया था मैंने जो आज ट्राली बस के लिए कर रही हूं। बिजली से चल्नेवाली यह बस शायद बिजली नहीं होने से आ नहीं सकी।  एक घंटे से तो ज्यादा ही हो गए, दूसरे बस तो आ-जारहे हैं। लेकिन मुझे जो बस चाहिए या आवश्यक है वह नहीं आ रही। मैं हैरान हूं इतनी अधैर्य तो मैं नहीं थी। फिर खुद से परेशान हूं क्यों खुद ऐसे इंतजारवाले दिन को न्यौता दिया। कितनी विवश हूं मैं। ऐसे ही पड़ी रहती हूं। समय के साथ ऐसे सरकना, खुद को चलाना मुझे शोभा नहीं देता अभी। पर नजाने क्यों मैं विवश हूं - बाध्य हूं।

      नये बानेश्वर के बस-स्टाप पर वैसे खड़ी हूं जैसे एक पीपल का पेड़ नंगी पहाड़ के चोटी पर खड़ा हो। जैसे एक काले बादल का टुकड़ा प्रकाश की प्रतिक्षा में हो। हां उसका नाम प्रकाश ही है। मैं निश्चय करती हूं - मैं जिसे इंतजार कर रही हूं वह प्रकाश ही है या आकाश? नहीं प्रकाश है, प्रकाश ही है, मैं इसी निश्चय को बारबार दुहराती हूं।

      ‘नमस्ते भाभी कहां जा रही हैं?’ कोई हंसते हुए पूछ रहा है।

            ‘नहीं सुन रही हैं क्या? इस भरी दोपहरी में कहां जा रही हैं? वह दुबारा पूछता है। मैं तो उस आदमी से बोलना भी नहीं चाहती। कितना गन्दा है वह आदमी! मुझे तो खासा चालू लगता है यह अधेड़ । मेरे भीतर कहीं घृणा उपजती है उसके लिए, पर मैं उसे प्रकट नहीं होने देती और कहती हूं - ‘दोस्त का इंतजार कर रही हूं।’

      ‘कैसा दोस्त?’ वह बेशर्म होकर पूछता है। मैं जानती हूं वह क्या जानना चाहता है। इसलिए मैं ऐसे ही कह देती हूं  - ‘आप जैसा दोस्त। एक बजे का समय दिया था पर दो बज गए। मेरा तो सारा दिन खराब हो गया।’

      वह चाय के लिए बोलता है। मैं मना कर देती हूं। वह फिर फिल्म के लिए आग्रह करता है, ठंडा पिने के लिए कहता है, मैं फिर मना कर देती हूं। मेरे हठ को सहज बनाकर वह कहता है - ‘आज शायद आपने मुझसे महत्त्वपूर्ण दोस्त मिलने वाला है। नहीं तो आप ऐसी न थीं!’

      न ट्राली बस आती है न ही प्रकाश आता है! कितना बोरियत भरा होता इंतजार, लंबा इंतजार! लंबे इंतजार की निरर्थकता उसी को मालूम होती है जिसने यह भोगा है।

      इंतजार के साथ मैं 'कल' याद करती हूं। अचानक शहर की तरफ निकल गई थी। शहर, यानि की भोटाहिटी, असन, नये सड़क और रत्‍नपार्क पहुंच गई थी। लोगों की भीड़ में कहीं खो गई थी। काम कुछ खास नहीं था। खास खरिदारी भी कुछ नहीं थी। अकेले डेरे पर रहते हुए कभी थकावट सी महसूस होती है। मस्तिष्क थक जाता है और मन जाड़े की नदी कि तरह बन जाता है। फिर निकल गई थी शहर की तरफ, जहां अपने आपको खोया जा सकता है, बहुत सी अनजानी आंखों के बीच, निर्दोष और पवित्र आंखों के बीच। रानीपोखरी के आकाशिया पुल( फ्लाइओभर ब्रिज) मैं बैठकर मानवाकृतियों के समुद्र में बहुत देर तक डूबी रही। पैसे नहीं थे। थोड़े से मूंगफली के दानों से भूख को बदला। पर ‘आप यहां क्यों हैं?’ कहकर पूछनेवाला कोई नहीं था। न ही ‘क्यों अकेली बैठी हैं, चलिए चाय पीते हैं।’ कहनेवाला था। मुझे लगा - मेरे जैसे यंत्रणा और पीड़ा की आंखों को लेकर संत्रासपूर्ण जीवन जी रही औरतें जहां कहीं हैं। मेची महाकालीभर जहां कहीं हैं, पुरे देश भर हैं। देर रो रही थी फिर भी मैंने रत्नपार्क के भीतर की तरफ देखा। वहां न फूल थे, न झरने थे। वहां की सारी खुशियां मानो समाप्त हो गई थीँ। यह पार्क, बेकार बैठे युवकों और युवतियों के लिए वक्त गुजारने का स्थान बन गया था। पिछले कुछ वर्षों से बहुत से विषयों और घटनाओं से चर्चित होने के कारण मैं थोड़ा सचेत हो गई थी। क्यों ऐसी बातें मेरे अन्दर ढुक गईं, मुझे मालूम नहीं। सही मायने में मैं नेपाल के साधारण से गांव की सरल औरत थी सरला। पर कुछ वर्षों से खुद को और दूसरों को सोच समझ पाने कि काबिलियत मैंने पा ली है। आकाश के सुनेपन को आत्मसात् करके उसके कुछ अर्थ समझा सकती हूं। लेकिन ये मैं नहीं कर सकती - मजबूत दीवार से टक्कर मारना, वेगवान नदी की धारा में बह जाना और किसी बड़े पेड़ से चिपक जाना।

      अब तक ट्राली बस नहीं आई है। क्या पता आज दिनभर नहीं भी आ सकती है। कहीं से आवाज आती है - ‘ट्राली बस तो यहां बिनरूके चली गई। बहुत भीड़ थी बस में।’ उस आवाज को निश्चित करने के लिए मैं किसी से पूछती हूं ‘ट्राली बस बिनरूके चली गई क्या?’ वो आदमी हां या ना कुछ नहीं कहता। अपने पग जल्दी बढ़ाता हूआ वह आगे निकल जाता है। बस बिनरूके चली गई! अब क्या होगा। मैं घबरा सी जाती हूं।

      मुझ को चकमा देकर चलीजानेवाली इसी बस में हमारी मुलाकाल अचानक कल हुई थी। मेरे बगलवाले सिट में बैठे हुए उस आदमी ने ही बातों का सिलसिला शुरू किया - ‘कहां तक जा रही हैं?’

      ‘नए बानेश्वर तक’ मैंने सहज रूपमे जवाब दिया था।

      बात को आगे बढ़ाते हुए उसने कहा -‘लगता है कहीं हमारी मुलाकात हुई है! कहीं नौकर थीं आप?’

      ‘वर्षों पहले आयल निगम में थी। नौकरी से अलग हुए भी एक युग बीत गया।’ मैंने अपना इतिहास उसके सामने रख दिया फिर उसे गौर से देखने लगी - नीचे से ऊपर तक, पैर से शर तक। उसके शर में असली ढाका की टोपी थी। वह अच्छे कपड़ों में था( शॉर्ट पैंट पहने था) और लगता था संभ्रान्त व्यक्ति है। मैंने उसके चेहरे को देखकर उसके उम्र का अन्दाजा लगाया। शायद पचास से ऊपर हो। पर उम्र के बारे में मैं हमेशा ही कमजोर रही हूं। फिर उसने नम्र स्वर में कहा - ‘मैं भी बानेश्वर तक ही जा रहा हूं। सूरज डूबनेवाला है-घबराइएगा नहीं। हां आपने आयल निगम कहा मैं भी कभी आयल निगम में था। जमाना बीत गया।’

      उसने थोड़ी देर रूककर फिर कहा -‘हां अवश्य ही मैंने आपको वहीं देखा होगा। उस समय की बातें तो सपने जैसे लगते हैं।’

      ‘नया बानेश्वर.........नया बानेश्वर...’ बस के कंडक्टर ने आवाज लगाई तो मैं होशियार हो उठने के लिए तैयार होने लगी। वह गंभीर स्वर में कहने लगा - ‘आपसे थोड़ी देर और बातें करने को दिल कर रहा है। अभी यहां न उतर कर क्यों न थोड़ा आगे तक चले जाएं?’

      मैं तो उतरने के लिए उठ चुकी थी। बस में बहुत भीड़ थी। ‘आपको जल्दी में तो नहीं है न?’ वह फिर अनुरोध  कर चुका था और फिर मैं अपने ही सीट में धम्म से बैठ गई। नए बानेश्वर से बस आगे निकल चुकी थी। बस में चढ़नेवालों और उतरनेवालों की भीड़ बनी हुई थी और बहुत शोर था। पर हमारे भीतर की मनस्थिति व वातावरण बिलकुल अलग थे। वह पहले से गंभीर दिखता था और मुझ जैसी चुलबुली औरत भी गंभीर थी।

      बस आगे जा रही थी। हम दोनो ही गंभीर व चुप थे। मैं सोच रही थी नौकरी के वर्षों में प्रकाश कौन से विभाग में था और मुझे कैसे पहचानता था। शायद वह भी ऐसा ही कुछ सोच रहा होगा चूंकि वह सीरियस दिख रहा था। हम बहुत आगे बड़ चुके थे पर मालूम नहीं था कौन सा स्टाप है। बस करीब करीब खाली हो गई थी।

      ‘कहां उतर रहे हैं हम?...........मुझे देर हो रही है।' मैंने मौन तोड़ा।

      ‘आज डिनर मेरी तरफ से। कहो कौन से रेस्तरां में चलें ?’ यह सवाल मेरे लिए अप्रत्याशित था। मैं तो घबरा गई और सहज होने कि कोशिश करने लगी - ‘मैं खुद डेरे पर बनाकर खा लूंगी, आप क्यों तकलीफ करते हैं।’

      ‘इसका मतलब आप डेरे में अकेली रहती हैं और खुद खाना बनाकर खाती हैं?’ क्या जवाब दूं इस सवाल का मैं कुछ देर सोचती रही और फिर मैंने स्वीकृति में शर हिलाया।

      ‘मैं भी डेरे में अकेले ही रहता हूं....क्यों न मेरे यहां ही डिनर लिया जाए?’ उसने आसानी से कह दिया। इस सवाल का जबाव भी मैं दे नहीं पाई। मैंने सिर्फ ना में शर हिला दिया। उसने शायद मेरी स्थिति भांप ली। मैं उसको समझने की कोशिश कर रही थी और शायद वह मुझे।

      हम ट्राली बस के आखिरी स्टाप सूर्यविनायक में आ पहुंचे थे। बस का कंडक्टर ऊंची आवाज में हमें उतरने के लिए चेतावनी दे रहा था - ‘सूर्यविनायक आ गया। सबलोग उतर जाएं।’

      उसने भी कंडक्टर की आवाज सुनी होगी। पर वह जल्दी नहीं कर रहा था। उसने फिर गंभीर आवाज में कहा - ‘हम नहीं उतर रहे।’ बस फिर लौट चली उसी रास्ते। हम कुछ सहज हो चुके थे। उसने फिर कहा - ‘सरला! जिन्दगी कितनी अच्छी है! तुमसे मुलाकात के बाद मैं फिर पुराने समय में लौट गया हूं। उन रोमान्टिक पलों में बदल गया हूं।’

      प्रकाश भावुक हो चला था और आप से तुम पर चला आया था। फिर मुझे लगा उसमें ह्विस्कीका प्रभाव कुछ बाकी है। ह्विस्की के उस अजीब से गन्ध से मैं वर्षों से रूबरू हूं। अब बस खाली सी हो गई थी। कौन जाए इस जाड़े में शहर की तरफ? उस खाली बिराने में सिर्फ प्रकाश की आवाज आ रही थी - ‘हमें नए बानेश्वर में उतरना है, किसी अच्छी सी रेस्तरां में जाना है और आज नया साल का जस्न मनाना है - शताब्दी का ही नया साल - इस युग का नया साल।’

      मेरी आंखों के सामने अनगिनत चेहरे आते रहे और गुम होते रहे। उन चेहरों पर मैं अपनापन पाती - कहीं कुछ एक सा है, कुछ जुड़ा है और कुछ बढ़ गया है। मैं सोच नहीं पा रही थी - कौन सा चेहरा सच्चा है और कौन सा झूठा?  कौन सा यथार्थ है और कौन सा भ्रम !

      अब जब मैं बस स्टाप पर इंतजार कर रही हूं तो भी यकीन नहीं कर पा रही कौन सा यथार्थ है और कौन सा भ्रम । कभी लगता है - यह सब भ्रम है, मिथ्या है और कभी यह सब सच है, सत्य है और अविनाशी  है। एक बस आकर बिनरूके ही चली गई और दूसरी का नामोनिसान नहीं है। मैं उसी बेन्च में वैसे ही पड़ी हूं। गाड़ीयों की वही अफरातफरी और लोगों की भीड़! चलनेवालों में वही त्रास, वही असहजता, वही भय समाया हुआ दिखता है।

      मैं नए बानेश्वर में उतरकर उसी प्रकाश के पीछे हो ली थी मानो मैं उसकी बीवी हूं। फिर रेस्तरां में एक दो पैग चढ़ाने के बाद प्रकाश अपने आप में नहीं था। ‘मेरी घरवाली जर्मनी में है, वहां की बड़ी सी रेस्तरां में काम करती है, लड़का भी वहीं चला गया। वे दोनों मुझे मार्क भेजते हैं, डॉलर भेजते हैं और मैं कुछ काम नहीं करता। मैं क्यों काम करूं? मेरे लिए करने को क्या है?’

      ‘सरला! आज कितने वर्षोँ बाद तुम अचानक मिली हो। कितना भाग्यसाली हूं मैं- मेरी पहली प्रेमिका मिल गई। मेरे हृदय के किसी कोने में तुम थी सरला! तुम्हारे प्रेमका फूल अभीतक मुरझाया नहीं है। मैं तुम्हें लम्बा कीस देना चाहता हूं।’

      रात गहरी होती जा रही थी। मैं डेरे पर देर से पहुचुंगी - यही चिन्ता मुझे सता रही थी। उसने मुझे भी दोचार बोतल खाली करने को विवश कर दिया। प्रकाश अपनी गति पर था - ‘मेरा घर यहीं है नए बानेश्वर में। मैं तुम्हें वहीं रखूंगा। हुआ ही क्या है आखिर! मेरी सारी जायदाद तुम्हारे नाम कर दूंगा। अब फिर एक बार डिप कीस।’

      मुझे लगा वह रात ऐसे ही काटना चाहता है। रेस्तरां बन्द होने को था और वह चिल्लाए जा रहा था - ‘अपनी पसन्द की दिलरूबा मिलने पर भी देर होती है कहीं? रेस्तरां बन्द करते है। मैं बन्द कर दूंगा इस रेस्तरां को, खत्म कर दूंगा।’

      ‘मैं अब चलती हूं - डेरे में कोई नहीं है।’ मैंने धीरे से कहा।

      ‘फिर तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा। अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ चलूंगा। वाह! कितनी खुशनुमा रात होगी! कितने मीठे सपने होंगे! मीठी-मीठी बातें होंगी।’ प्रकाश फिर दूसरी कीस के लिए तैयार हो रहा था।

      ‘नहीं तो मेरे यहां चल। अपने घर चल। क्या नहीं है इस जिन्दगी में- जहांकहीं उजाला। कहां है अंधेरा? अकेले रहने पर अंधेरा होता है, अकेले सोने पर अंधेरा होता है।’ वह चिल्ला रहा था। वह होश में था और बहोश भी था। मैं वहां से बच निकली दूसरे दिन बस स्टाप पर मिलने की बात कहकर।

      डेरे में रातभर सोचती रही - इतने विशाल संसार में हम सभी अकेले हैं, एकाकी हैं। जैसे तैसे मौत की काली परछाई का इंतजार कर रहे हैं। रात को ही मैंने तय कर लिया - प्रकाश ने आयल निगम में कभी काम नहीं किया, उसकी बातें मनगढ़न्त हैं, भ्रमपूर्ण हैं, वह सिर्फ बहानेबाजी कर रहा है।

      प्रकाश नहीं आया। किसी बस में भी नहीं आया। कोई ट्राली बस भी उसे नए बानेश्वर तक ला नहीं सकी। वहां से मैं अपने डेरे की तरफ बढ़ गई फटाफट। पर न जाने क्यों दिल भारी हो गया। पत्थर जैसा ही हो गया। पहले कभी ऐसा हुआ हो, मालूम नहीं है। फिर लगा - हम सब दुनियां की भीड़ में अकेले हैं, अपनेपन और सम्बन्ध की खोखली भ्रम पाले हुए है। एक बस में यात्रा कर रहे यात्रियों जैसे हो गए हैं।

 

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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 


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