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एक समय में एक रिक्सावाला
परशु प्रधान
आज भी मैंने वही रिक्सा ले लिया वैसे तो मुझे सदा एक ही रिक्सा लेना पसन्द नहीं है। परन्तु ऑफिस के लिए समय पर निकलते ही वही रिक्सा मिल जाता है। अर्थात् 123 नंबर का रिक्सा। वह नगरपालिका में रजिष्टर्ड है या गांव विकाश समिति में मैं देख नहीं पाई हूं। सच कहूं तो वैसी बातों क्या ध्यान मुझे कम ही रहता है, आदत जो नहीं है। घर में भी इसी बात पर खटपटी होती रहती है। अभीअभी खरीदी हुई गोभी के दाम वे पूछते हैं। पर मैं तुरन्त जवाब नहीं दे पाती हूं। कहीं कुछ तो अटक जाता है। वे फिर पूछते हैं - ‘यह गोभी तुमने ही खरीदी है न?’ मैं हां भी नहीं कह सकती नहीं भी नहीं।
ऑफिस पहुंचने के लिए पन्द्रह-बीस मिनट के लिए रिक्सा लेना ही पड़ता है। रास्ते में अचानक पूछती हूं - ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ वह पसीने से तर है। लम्बी सांसें ले रहा है फिर भी वह होंठों पे मुस्कराहट बिखेरकर कहता है - ‘जी हुजुर! राम भरोस। आपने मेरा नाम भूलकर पूछा है या यूंही पूछा है?’
‘देखो न मैं तुम्हारा नाम भूल जाती हूं। मेरी मुशकिल है कि.......... राम के बाद क्या है?’
‘राम भरोस। आसान नहीं है क्या?’ एक हवा का झोंका मुझे छूकर उड़ जाता है।
असल में राम के बाद का शब्द मुझे गड़बड़ कर देता है। रामप्रसाद है या रामविलास, रामकृष्ण है या रामहरि। राम भरोस मेरा ध्यान भंग करता है - ‘हुजुर दश बरस हुए न आपको खाने पानी में नौकरी करते?’
‘तुम्हें कैसे मालूम? एकदम ठीक कह दिया।’ मैं चौंक पड़ती हूं। ‘हुजुर की शादी से पहले से ही मैं पहचानता हूं हुजुर को। फिर मैंने हुजुर की सवारी चलाई है वर्षों से।’ उसने स्पष्ट किया।
मुझे लगा उसकी बातें सच हैं। शादी से पहले से ही मैं खाने पानी में नौकर थी। शादी भी इसी महल्ले में हो गई। यानि की घर और मायका एक ही जगह।
‘मेरा डेरा भी इसी एरिया में है।’ बातें खत्म हुईं और फिर मैं उसके रिक्से से उतर गई।
यह परिचय का क्रम आगे बढ़ा। इस क्रम को कभी मैंने आगे बढ़ाया कभी उसने। रामभरोस का रिक्सा मैंने ही ठेके पर लिया है, ऐसा ही लगता था। ऑफिस के टाइम में दूसरे लोग भी रिक्सा लेना चाहते पर ‘खाली नहीं’ कहके वह मेरा ही इन्तजार करने लगा। दूसरे रिक्से भी खाली मिलते मगर मैं उसका रिक्सा ही चुनना पसन्द करती। समय के क्रम में उसने मुझे भाड़े में भी छूट देना शुरू कर दिया। अर्थात् खाने पानी के कार्यालय तक के किराए में पन्द्रह रूपये लगते पर मैं सिर्फ दश का नोट फैंक देती। उसने कभी 'कम हुआ यह किराया' नहीं कहा, न ही मैंने कभी पूछा।
‘राम भरोस! तू अपन आदमी छे। मुझे धोका मत देना।’ कभी कभार मैं उसी के भाषा की टुटिफूटी लवज में कह देती तो वह पान से लाल पड़ गये भद्धे दांत दिखाते हुए हंस देता था। असल में एक रिक्सेवाले के साथ एक सवारी का संबन्ध हार्दिकता और दोस्ती मे बदल गया था। जिसे शहरों में बदनाम करने के लिए लोग प्रेम का नाम भी दे सकते थे।
तराई में ज्यादातर गर्मी ही रहती है। सूरज की हजारों किरणें मानों एक ही बार शर में बरस रही हों। जैसे की सौ से ज्यादा हजार वाट के जलते बल्ब से घिरे हों। बरसात होती भी है तो पुरे संसार को डुबोती है। सारे रास्ते, पगडंडियां, झुग्गियां, झोपड़े, तालाब, दरिया सब जलमग्न। मानों प्रलय होने जा रहा हो। कल खिला हुआ डालिया के फूल का पेड़ आज फैलकर जंगल बना हुआ है। छोटेछोटे गुलमोहर के फूल महाकाय पेड़ में बदल जाते हैं। और तो और अपनी आठ साल की बेटी भी अंकों को लांघकर सोलह की दिखती है। इकलौता बेटा दिलीप भी पिताजी में रूपान्तरित दिखाई देता है। मैं यहीं हूं और समय का तापमान वेग से बढ़ता हुआ महसूस करती हूं। खुद को अपना तराई का बास सपने का लंबा सुरंग सा लगता है, जिसके अन्दर प्रवेश करने पर रहस्य और रोमांच की छड़ी से छुते ही अनंत काल तक नींद की अनुभूति होती है।
मैं उस नींद से जागकर देखती हूं की 123 नंबर का रिक्सा मेरे सामने से गुजर रहा है।
‘साहेबनी चलेंगी?’ वह रिक्से को रोककर पूछता है। मैं अनायास बैठ जाती हूं।
‘साहेबनी! फुर्सत होगी?’ वह हंसता है और उसके लाल दांत दिखाई पड़ते हैं।
‘क्यों रामभरोस? क्या करना है?’ उसे खुश करने के लिए उसीकी भाषा में कहती हूं।
‘लगता है साहेबनी को आज सारा बाजार घुमा दूं। नया पार्क बना है! चिड़ियाघर भी बनने जा रहा है। खुशी होती है न आपको........?’ उसने गंभीर लहजे में कहा।
‘पैसे तो मैं नहीं देनेवाली!’ हम रिक्से पर घुमने लगे। शाम का समय था, ठंडी हवा से हम रिफ्रेस हो गए। बहुत से नए घर बन गए थे और बन भी रहे थे। शहर....... शहर का रूप ले रहा था। करीब दो घंटे तक मुझे बाजार की सैर कराकर घर में लाकर छोड़ दिया उसने। फिर शर खुजलाते हुए कहने लगा - ‘एक निवेदन करूं हुजुर?’
‘कहो न क्या बात है? मुझे इतना खुश तो कर चुके हो!’ मैंने सहज रूप में ही लिया उसकी बात को।
उसका शर अपराधी की तरह झुक गया। फिर टूटी फूटी भाषा में कहने लगा - ‘बात यह है की मुझे नेपाली बनना है। नागरिकता लेने के लिए बहुत कोशिश की, रूपए भी बहुत खर्च हो गए। बदमाशों के जाल में फंस गया, रूपये भी हजम कर दिया।’
रामभरोस की बातें मैं कुछ समझी, कुछ नहीं। लगता था वह कहीं सपने में कहीं उड़ रहा है। मैंने उसे ढाड़स बंधाया - ‘अच्छी तरह से कहो न, खास बात ( समस्या ) क्या है?’
‘एक पक्का आदमी मिला है। नकली नहीं, असली नागरिकता दिलवा दूंगा कहता है। साहेबनी को क्या झूठ कहूं! पूरा दश हजार मांगता है। उतना ज्यादा रूपया मैं गरीब कहां से जुटा लांऊ? मालकिन को सदा रिक्सा ठीक रखता हूं, आप रूपये का जुगाड़ कर दें।’ फिर उसकी आंखें नम हो गईं। उसके दोनो हाथ तो पहले से ही जुड़े हुए थे।
‘मैं तुम्हारी बात समझ गई रामभरोस। देखूं तुम्हारे लिए क्या कर सकती हूं...........आज मैं थक गइ हूं। तुम जाओ।’ मैंने ब्रेक लिया।
लेकिन, रातभर रामभरोस के चेहरे ने मेरी नींद हराम कर दी। मैंने उन्हें भी सुनाया। ऐसी बातों पर ध्यान न दो कहकर वे सो गए। मैं नशे से मुक्त हुए शराबी की तरह हो गई। कहीं छोटी सी पगडंडी दिखाई देती है, फिर गुम हो जाती है। ‘छोटे भाई को पूछूंगी’ आशा की किरण दिखाई देती है। खुद से सवाल करती हूं - ‘एक रिक्सेवाले के नागरिकता के लिए इतना सिरियस होना जरूरी है? जरूरी नहीं, जरूरी है !’
दूसरे दिन सबेरे साढ़े नौ बजते ही रामभरोस का रिक्सा तैयार मिलता है। मैं सहजता से उसमें बैठ जाती हूं। लेकिन कलवाला रामभरोस आज कुछ सिरियस है। फिर उसके शर में सफेद बैंडेज भी बंधा हुआ है।
‘किसके साथ झगड़े रामभरोस? कल दारू ज्यादा हो गई क्या?’ मैं दिल्लगी के मूड में हूं।
पर वह गंभीर है - ‘कल आपके यहां से लौटते वक्त पुलिस के हत्थे चढ़ गया।’
‘कैसे?’
‘रात को डेरे पर लौट रहा था। रिक्से पर बत्ती नहीं लगी थी। रास्ते में पुलिसवाला पचास रूपये मांगने लगा। मैं गरीब कहां से लाता पचास रूपये? फिर पचास रूपये के डंडे मेरे शर पर बरसाए। शुक्र है शर फुटने से बच गया।’ अब वह नहीं हंसा और उसके घिनौने दांत भी नहीं दिखाई दिए। मैं कुछ नहीं बोली। रामभरोस का भीतर का घाव और दर्द करने लगा - ‘कहते हैं प्रजातन्त्र है, पर है पुलिसराज हुजुर। जहां कहीं गोलमाल है। इतना ज्यादा गोलमाल तो पहले कभी नहीं था हुजुर!’ मैं हां या ना कुछ नहीं कह सकी। देश के सारे यन्त्र बिगड़ गए हैं, जंग लग गया है उन्हें, बेकम्मे हो गए हैं। सब के लिए पैसा सबसे बड़ा साथी बन गया है । ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे पैसे से नखरीदा जा सकता हो। ऐसा ही कुछ सोचते हुए हम ऑफिस पहुंच गए। मैंने उसे सदा की तरह दस रूपये थमा दिए। शायद उसे लगा 'मैंने जो भी बातें की वो साहेबनी को पसंद न आई हों।' लौटते वक्त बात की धार बदल डाला रामभरोस ने - ‘अब छठ आनेवाला है हुजुर, यह तो पहाड़ियों और मधेसियों का त्यौहार है ना हुजुर!’
मैंने हां कह दिया और पहुंच गई ऑफिस। दस्तखत करके अपने कमरे में आ गई और वही पुराने टाइपराईटर के साथ बैठ गई। वह भी मेरे माफिक धूप-गर्मी से पुराना पड़ गया था। मेरा ओहदा बदलकर कम्प्युटर ऑपरेटर होने जा रहा था। मुझे लगा टाइपराईटर मुझे व्यंग कर रहा है - पुरानी चीजें छोड़ती जाओ नई चीजें लेती जाओ। फिर एक दिन पुराना कुछ नहीं रहने वाला - अपने कोई नहीं रहने वाले। ऑफिस में काम कुछ खास नहीं था। सिर्फ इधर उधर की बातें। बॉस के कमरे में जाकर नमस्ते बजा आई। सदा हंसनेवाले बॉस का मूड आज ऑफ था - ‘नमस्ते ललिता जी! देखिए काली पट्टी बांधनेवालों से बच के रहिएगा।
‘मुझे कुछ नहीं मालूम सर!’ कहते हुए मैं अपने कमरे में आ गई। वही रंगहीन बन्द कमरा। वही टाइपराईटर के टुटेफुटे अक्षर। वही ऑफिस के लेटर पैड और कार्बन पेपर। दूसरे कमरे से सिगरेट का गंध मेरे कमरे तक आ गया और मैं खांसने लगी। इसी खांसी के बीच रामभरोस का चेहरा आ गया। उस की नागरिकता आ गई, फूटा हुआ शर आया और छठ का त्यौहार आ गया। इन्ही यादों के बीच मैं होश में आ गई, पहले अर्धबेहोश जैसी हो गई थी। पता नहीं कब किसने मेरी बांह पर काली पट्टी बांध दी। मैं घबराकर बाथरूम की तरफ चली गई।
कुछ दिनों के लिए नेपाल बंद हो गया। ये बंद क्यों और किसलिए होते हैं, मुझे मालूम नहीं न ही जानने की कोशिश ही करती हूं। नेपाल बंद के साथ साथ रामभरोस का रिक्सा भी बंद हो गया। इन दिनों में मैं पैदल ऑफिस गई और पैदल ही वापस आई। रास्ते में कभी कभार चोरी छिपे चलते हुए रिक्सों देखती तो लगता की रामभरोस का ही रिक्सा होगा । पर वैसा नहीं होता। फिर नेपाल बंद समाप्त होने पर भी रामभरोस दिखाई नहीं दिया। मन में कहीं घाव से लगे, कांटे चुभे। रामभरोस जैसे बहुत से रिक्सेवाले हैं पर क्यों रामभरोस ही दिल को हिलाकर रख देता है! क्यों मैं उसके बारे में इतना ज्यादा सोचती हूं ? और बेचैन होती हूं ?
मुझे खुद पर विश्वास नहीं हुआ। एक दिन मजदूर खोजने के बहाने मैं झोपड़पट्टी की तरफ चल दी। धान बोने के वक्त भी मजदूर न पा कर मैं परेशान थी। उनको ऑफिस के काम से ही फुर्सत नहीं है। सुबह ऑफिस, दोपहर ऑफिस और शाम ऑफिस। कैसा ऑफिस है वह मैं समझ नहीं पाई हूं। रास्ते में एक झोपड़ी दिखाई दी। फूस की बनी छोटी झोपड़ी रंगो से पुती हुई थी। अनेक तसविरें बनी हुई थीं। अवश्य ही वे तसविरें मैथिली कला की होंगी- मैं सोच रही थी। लाउडस्पीकर पर जोर से हिन्दी गाना बज रहा था - अभि न जाओ छोड़कर कि दिल अभी भरा नहीं.............। फिर आंगन के खटिया पर दारू से मस्त रामभरोस चित पड़ा आकाश ताक रहा था।
‘कौन सा त्यौहार है रे रामभरोस?’ मैंने उसको पहचानते ही पूछ लिया।
वह नशे में था। शायद कहीं ऊपर उड़ रहा था। जिन्दगी के किसी स्वतन्त्र क्षितिज पर था। बहुत सी संभावनाओं की आंधी में फंसा था। फिर भी उसने मुझे पहचान लिया और कहा - ‘ओ मालकिन मेरी घरवाली आ रही है, गौना है, शादी को आठ-दश बरस हो गए। मैं उसके स्वागत की तैयारी में लगा हूं।’
‘तो इसलिए यह धूमधाम है?’ मैं आगे बढ़ गई। जो होश में ही नहीं था उससे क्या बातें करना। मैं समझ गई अपनी बीवी के स्वागत में लगा है रामभरोस। वह अचानक चिल्लाया - ‘ओ मालकिन! मैं दोचार दिन रिक्सा नहीं लाउंगा। मालिक ने मुझसे रिक्सा छिन लिया है। मैं दूसरा रिक्सा ढूंढ रहा हूं।’
रिक्सा छिन जाना और घरवाली का आना एक ही बार हो गया रामभरोस के लिए। पांच- सात मजदूर ढूंढकर लौटते वक्त अंधेरा हो चला था। वे पहुंच चुके थे। खाना भी तैयार था। पर क्यों मुझे भूख नहीं हुई। रामभरोसका रिक्सा मालिक ने छिन लिया, यही बात मुझे परेशान करती रही।
‘क्यों न हम एक रिक्सा रख लें!’ अचानक मैंने उन्हें कहा।
‘कैसे यह बात आई? रिक्सा रखकर क्या रिक्सेवाले को अमीर बनाना है? वह तो पैसे नहीं देनेवाला, वह मालिक और हम नौकर की तरह होने की बात न ही करो तो अच्छा है।’ उन्होंने अध्याय समाप्त कर दिया।
मैंने उसके रिक्से की बात को याद किया। और याद किया उसके नागरिकता की बातको, फिर उसके पैसे हजम कर देनेवाले कर्मचारियों को। कहीं ढेर सारे कांटे चुभे। अव्यक्त जगहों पर पीड़ा हुई। फिर पहले की रातों की तरह नींद नहीं आई। सपने में रामभरोस आ गया। किसी राजकुमार के रूप में नहीं सिर्फ एक रिक्सेवाले के रूपमें। मैंने उससे जुड़े सारे प्रसंगो को भुलना चाहा, पर मैं असफल रही।
दूसरे दिन ऑफिस के लिए निकली और दूसरे रिक्से पर बैठ गई। लगा यह भी तो दूसरा रामभरोस है, रामविलास है। रास्ते में वही कह उठा - ‘वह रामभरोस था न हुजुर! आपकी सवारी चलाया करता था?’
‘हां पहचानती हूं, कहो!’
‘वह तो कल सबेरे ही चला गया हुजुर!’
‘कहां इंडिया चला गया?’ मैंने सहजता से पूछा।
‘कहां हुजुर! वह ऊपर चला गया। भगवान के घर। कल रात घरवाली न आने के गम में उसने जहर खा लिया............क्या कहें हुजुर।’ उसने निराशा भरे स्वर में कहा।
‘ए रिक्सेवाले घर लौट चलो। मैं आज ऑफिस नहीं जाउंगी। शर भारी हो रहा है।’ वह समझ गया था।
मैं घर लौटकर बिछौने पर पसर गई। सोचने लगी - रामभरोस को अब कुछ भी नहीं चाहिए। न उसे नागरिकता चाहिए न ही नया रिक्सा। न बीवी न घरबार । उसे सिर्फ मौत चाहिए थी - कड़ी और ठंडी - जो उसे मिल गई। फिर मैंने याद किया एक समय में एक रिक्सावाला था - रामभरोस - एक समय का रिक्सावाला।
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मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी