Free Web Hosting by Netfirms
Web Hosting by Netfirms | Free Domain Names by Netfirms

प्रथम पृष्ठ ( Home )

एक लाश पर

परशु प्रधान

      शहर जागता है एक लाश से । इसको कोई वड़ा शहर तो नहीं कह सकते, लेकिन तीन चार सौ मकानें है, रास्ता चौड़ा है । कुछ वर्षों से पानी है नलों में । बिजली भी आनेवाली है, अभी काम पूरा नहीं हुआ है । बेहतर होगा इसे बाजार कहें, कोई पहाड़ी बाजार । यह बाजार शुरू होता है दूध के बर्तनों और लकड़ी के बोझों से । बरसात कम हो रही है हर वर्ष। बरसात का मौसम शर्दी का सा लगता है और शर्दी का बरसात सा । खेती प्रायः जीर्ण हो गयी है । जंगल कट रहा है । जंगल कटने से ही बाजार की शुरूवात लकड़ी के बोझ ढोये अधेड़ औरतों, युवतीयों व लड़कियों से होती है ।

      किसी कार्यालय में काम कर रहे एक असिस्टेन्ट को जुकाम हो गया है । हो सकता है थोड़ा बुखार भी हो । हैल्थ पोष्टका कंपाउंडर तुरन्त हाजिर होता है सिरिंज लेकर । हो सकता है वे अच्छे दोस्त भी हो । दोनों ही किसी बाहरी जिले से आए हैं । दोनों ही अकेले हैं और नीरस जिंदगी जी रहे हैं । यो कहें नौकरी कर रहे हैं । छोटीमोटी जुकाम तो एक आध टेबलेट से ही अच्छी हो जानी चाहिए । लेकिन कंपाउंडर जो है अपने आपमें अनुभवी है । वह रोगको जड़ से मिटा देना चाहता है । वह असिस्टेन्ट को एक इन्जेक्सन दे देता है । इन्जेक्सन देने के दो मिनट बाद ही असिस्टेन्ट की मौत हो जाती है ।

      दो मिनट पहले का जीता जागता असिस्टेन्ट अब नहीं है । उसके लाश के मुंह से ढेर सारा झाग निकल रहा है । कंपाउंडर नौ दो ग्यारह हो गया है । छोटे से बाजार के सब लोग, बच्चों से बुढे़ तक लाश के इर्द गिर्द जमा हुए हैं । भय व त्रासका वातावरण बाजार को ढांप चुका है । लगता है कोई बढ़ी सी भूकम्प आई है और एक वैसी ही दूसरी आनेवाली है । सारा बाजार पलटकर एक भीढ़ में बदल गई है यानि कि एक काले बिन्दु में तब्दील हो गई है ।

भीड में से एक चिल्लाता है- "भ्रष्ट प्रशासन" दुसरे जोर देते है "मुर्दावाद" वहां नारेबाजी की जरूरत तो थी नहीं । फिर वही नारेबाजी दोहराते हैं- "भ्रष्ट प्रशासन मुर्दावाद" । नारेवाजी करनवालो को यह भी पता नहीं की "भ्रष्ट प्रशासन मुर्दावाद" का अर्थ क्या है और क्यों वे उसे दोहराए जा रहे हैं । लेकिन फिर भी कुछदेर तक नारेबाजी जारी रहती है ।

लाश वहीं वैसी ही पड़ी है जिस के लिए रानेवाला कोई नहीं है । किसी ने सफेद कपडे़ से लाशको ढक दिया है । लोगो की भीड़ बड़ रही है । कुछ दिनों से शहर मे लाल टोपी वर्जित सी है। अचानक फिर नारेबाजी शुरू होती है- "यह व्यवस्था नही मानेगें", "यह शासन मुर्दावाद", "भ्रष्ट प्रशासन- कुर्सी छोड़ो" वगैरह वगैरह । पुलिस भीड़को हटाने के लिए लाठी चार्ज करती है । भीड़ छंटती है लेकिन सिर्फ कुछ देर के लिए । लोगों की बाढ़ उफन रही है । हजारों हाथ ऊपर उठे हैं । हजारों आवाजें थर्रा रही हैं । कल तक यह बाजार कुम्भकर्ण के नींद जैसे वर्षों-बरस सोया हुआ था । एक असिस्टेन्ट का मरना क्या था, इस बाजार में क्रान्ति की तुरही ही बज गयी । कहां से आ गए इतने लोग ?

कुछ देर बाद नारेबाजी का स्वरूप वदल गया । भीड़ में से कुछ प्रतिनिधि निलक पडे़ । उनकी मागें थीं- "लाश को पोष्टमार्टम करना पडेगा । किसी भी हालत मे करना होगा ।" पर अफसोस् ! पोष्टमार्टम के लिए तो डॉक्टर चाहिए । लेकिन वहां न हस्पताल था नहीं कोई डॉक्टर । नजदीकी जिलों में डॉक्टर तो थे पर वहां तक का रास्ता ही तीन दिनों का पैदल रास्ता था ।

पहाड़ि रास्ते उबड़-खाबड, चढाई-ढलानों व नदी-नालों से भरे पडे़ थे । बहुतों की सलाह थी- "लाश को ढो कर दूसरे जिले के हस्पताल ले जाना होगा ।" एक आदमी बोला "अगर ऐसा किया तो यह लाश भी सती की लाश वन जाएगी जिसे शिव ने ढोया था और जिसके अंग-अंग गिर गये थे । इसको पूरा का पूरा वहां नहीं पहुंचाया जा सकता । लाश सड़कर कहीं पेट गिर जाएगा, कहीं पैर तो कहीं आखें ।"

लाश ढोकर ले जानेवालों की बोली लगने लगी । कोई पांच सात-हजार रूपयें में तैयार हुए तो कोई सात-आठ हजारों में । कोई तो दश-बारह हजार रूपयें को माग करने लगे लाश को सरकारी जिम्में में देखकर । अब तो छोटे बाजार का मुद्दा वही अभागे असिस्टेन्ट का लाश वन गया था । चौराहों, बाजारों, चाय की दुकानों, पनघटों में जहीं भी उसी बात की चर्चा थी- असिस्टेन्ट की अचानक मौत और सड़ती लाश । हर कोई दूसरे से पूछता- लाश का क्या हुआ ? जवाब मिलता- आज सुबह ही दूसरे जिले ले गए हैं ।

"ऐंसा क्या ? लाश सड़ नही गयी क्या ?" पहला सशंकित था ।

"सड़ भी जाए तो पोष्टमार्टम तो करना ही था न ?"

"बेचारा मर के भी चैन नहीं पाया उसने ! किसी किसी की मौत तो कितनी..... , .... वगैरह वगैरह ।

बहुत आवाजें और स्वर आ रहे थे । लेकिन लाश को क्या किया जाए इसका निर्णय नहीं हो सका था । असिस्टेन्ट के सम्बन्धियों को खबर की जा चुकी थी । लेकिन उन लोगों को आ पहुंचने को भी उस पहाड़ि रास्ते मे सात आठ दिन तो लग ही जाते । लाशका मुद्दा और जोर पकड़ता जा रहा था ।

उस छोटे से बाजार में वो लाश और समस्याएं खडी कर रहा था। उसके दुर्गंध से आसपास के लोगों को हुत तकलीफ हो रही थी। आसपास के लोग अपने घरों में रह नहीं पा रहे थे । बाजार के लोग दुर्गंध से मास खाना भी छोड गए थे । बाजार में कसाईयों की दुकानें बन्द पड़ी थीं । वे भैंस, बकरा व सूअर काटना छोड़ गए थे । इतना ही नही- लाश ने बाजार को इतना त्रसित किया कि वे शाम होते ही घर से निकलना छोड़ गए थे । स्थानीय शब्दों मे लाश जग चुकी थी व पहले वाले इन्सानों की तरह ही रास्तों पर चल रही थी । चाय दूकानवाला भी शिकायत कर रहा था- "असिस्टेन्ट साहब तो सुबह सबेरे चाय के लिए आ जाते हैं । होटलवाले भी वैसी ही शिकायत करते- "हर रात असिस्टेन्ट साहब दारु व सूअरका मांस मांगते है ।" बाजार की तरुणीयां भी बाज न आईं शिकायत करने से- "रातभर असिस्टेन्ट साहब हमें अनेक हाव भाव से परेशान करते रहते हैं ।"

पर लाश अब भी उसी कमरे में उसी तरह पड़ा हुआ थाः- सड़ने व गलने के क्रम मे । लाश को दूसरे जिले पर ले जाने की बात अब बेतुकी हो चली थी क्योंकि लाश के हर अंग सड़ व गल रहे थे । बाजार मे छोटी मोटी नारेबाजी अब सामान्य हो चली थी । एक समूह आता और नारा देता "जैसे भी हो पोष्टमार्टम करवाना होगा । एक असिस्टेन्ट को कुत्ते-विल्ली जैसे मरता नहीं देख सकते हम । पोष्टमार्टम से पता लगाके अपराधी को दण्ड देना ही होगा ।"

दूसरा समूह उसी तरह चिल्लाता "असिस्टेन्ट की लाश ने बाजार में दम कर रखा है । लोगों को खाने व सोने के लिए मुसीबत है । रीति-रिवाज के मुताबिक लाश की सद्‌गति कर दो ।"

बाजार मे एक किस्म की गहमा-गहमी थी । क्योंकि ज्यादातर बेकार लोगों को काम मिल गया था । अब सभी को लाश के सम्बन्ध में किसी न किसी तरह का जुमला बोलने के लिए मौका मिल गया था । अब न किसी को ताश खेलकर वक्त काटना पड़ता न लोकल ठर्रे में अपनेआपको बिजी रखना पड़ता ।  सभी के लिए एक ही समस्या थी व एक ही विषय था- असिस्टेन्ट की लाश । उधर लाश और सड़ रही थी ।

भगवान ने बचाया । असिस्टेन्ट की सम्बन्धि आ पहुंचे । एक समूह के लोग लाश को न स्वीकारने की सलाह दे रहे थे क्योंकि वह मौत सामान्य नहीं थी । दूसरा समूह लाश जल्दी उठवाने कि सलाह दे रहे थे क्योंकि लाश के सड़ जाने से बाजार मे सांस लेने को भी मुश्किल हो रही थी।

लाश उठवाने से पहले मुआब्जे का भी फैसला होना था । बाजार का हर आद्मी वकिल की तरह जिरह करता । हर समूह के व्यक्तियों को समझाना टेड़ी खीर थी । मृतक के रिवाज के अनुसार लाश उठवाने व मृतक के सम्बन्धियो के आने जाने के खर्चे के लिए कुछ रुपयों कि व्यवस्था की गई । बहुत मुशकिल से लाश को सम्वन्धियों को सौंपा गया । अन्तिम वक्त तक लाश उठवाने वाले सम्वन्धि मूड मे नहीं थे । वे तय नहीं कर पा रहे थे की लाश को उठवाना है कि नहीं । अन्तमें प्रचलित कानून के अनुसार लाश को सौंपा गया । एक जटिल समस्याका हल हो गया था । मृतक के आत्मा के चिर शान्तिके लिए प्रार्थना भी की गई । बाजारके प्रायः सभी लोगों ने उसमें हिस्सा लिया । बाजार ने शान्ति का एक निश्वास फेंका ।

अब लाश का कफन हटाया गया । वहां असिटेन्ट की लाश पर बडे बडे किड़े सलवला रहे थे और हडि्डयोंका घिनौना ढांचा बाकी था ।

 

***

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 


प्रथम पृष्ठ ( Home )