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देहत्याग --परशु प्रधान फिर रंजना की आंखें खुली हुई थीं। फिर सूरज की पहली किरणों ने उसे चौंका दिया था। उसने पूछा था - ‘मैं कहां हूं?’ ‘अभी आप हस्पताल में हैं.........’ ‘मैं कौन हूं?’ इस सवाल का जवाब कहीं से नहीं आया। रंजना ने हृदय के कोने में सोचा - इस बार भी इस नश्वर देह को नहीं त्याग सकी...........सोचते सोचते ही वह फिर बेहोश हो गई। चारों ओर मौनता दिखाइ दे रही थी। पुलिसवाले ने बयानवाला कागज अपनी ही बैग में रख लिया। रंजना के जो पड़ोसी वहां उपस्थित थे उनकी आंखों मे अविश्वास की परछाई दिखने लगी थी। वह चाहते थे इस बार पार लग जाए। एक अधेड़ औरत ने बात उधेड़ी - यह तो पांचवीं बार है शायद। संतान के नाम पर कान्छी बेटी है। बड़ी बेटी दूसरे के घर चली गई। ‘शौहर नहीं है?............’ किसी ने पूछा। ‘शौहर को मरे हुए भी पांच बरस हो गए। यह पांच साल की लड़की भी अनाथ है क्योंकि इसके गर्भ में रहते ही शौहर चल बसे थे।’ उसी अधैड़ औरत ने कानाफूसी की। फिर उसी औरत ने एक चाकलेट उस लड़की को दिया और फिर अपनी बातें ( गुनासो) कहने लगी -‘इसी लड़की का मुह देखकर भी उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था।’ दरवाजा खुल गया। नर्स, डॉक्टर और पुलिसवाला एक साथ भीतर जाने लगे। डॉक्टर ने नर्स से पूछा -‘इसकी हालत कैसी है अभी? सिस्टर?’ ‘कुछ देर पहले होश आया था। अभी फिर बेहोश है। आप अच्छी तरह से देख लेते एक बार..........’ नर्स ने अनुरोध किया। डॉक्टर रोगी के छाती और अन्य भागों की जांच करने लगे। फिर थोड़ी देर बाद निर्णय सुनाया - ‘फिर होश में आ सकती है। फिफ्टी-फिफ्टी की स्थिति है। कलवाली दवा ही जारी रखो। बाकी ऊपरवाले की कृपा। डॉक्टर ने उसी औरत को पूछा - ‘आप इसकी कौन लगती हैं?’ ‘मैं इसकी मामी हूं..........फिर पड़ोसी भी। हर साल यह औरत कुकर्म करती है और मैं तकलीफ उठाती हूं। इसका शौहर मोटरसाइकिल एक्सिडेंट में चल बसा। यह छोटी लड़की है - अंजू। डॉंक्टर साहब को नमस्कार करो बेटी।’ उसकी बात अभी खत्म भी नहीं हुई थी की डॉक्टर साहब बाहर चले गए। अंजू के मुसकिल से जुड़े हाथ बीच में ही थम गए। अंजू आगे बड़कर बेड के पास पहुंचकर चिल्लाने लगी - ‘मम्मी ! मेरी मम्मी ! अब आप उठें, अपने घर चलें।’ बरसात के बावजूद बाहर गर्मी थी। मामी खिड़की खोलकर बाहर देखने लगी। सारा शहर धुएं और धूल से भरा हुआ था। दूर कहीं काले बादलों को उमड़ते देख वह सोचने लगी - लगता है फिर बारिस हो जाएगी। छाता भी नहीं ला पाई, अब क्या होगा? रात को किसे भेजें? क्या मुसीबत है! दूर के खाली व नंगे पहाड़ों को देखकर उसने स्वीकारा कि दन्त्य कथाओं का राक्षस सारे जबड़े निकालकर शहर को निगलने की तैयारी करने लगा है। पर यह सब तो भ्रम था। उसने खिड़की बन्द कर लम्बी जमुहाई ली। ‘नींद सताने लगी है। रात भर सो नहीं पाई..........।’ उसने सोचा। सच उसके सामने था - भांजी का मौत से अनवरत संघर्ष। उसने बहुत बार बहुत किस्म से मरना चाहा था। शौहर जिस साल चल बसा था उस साल वह नवजात बेटी को छाती में बांधकर महल्ले के कुवें में कूद गई थी। सबेरे ही पानी भरनेवालों की हायतौबा से सारा महल्ला जाग गया था और लोगों ने मां-बेटी को जिन्दा बाहर निकाला था। फिर अनेक झमेलों से उसे रूबरू होना पड़ा था। वह कल के दिन थे। महल्ले में रंजना के खुदकुशी के कोशिश की खबर आग की तरह फैल गई। उसे स्कूल में नौकरी में नहीं रखना है नहीं तो बच्चों को बिगाड़ देगी - ऐसी अफवाह भी हवा की तरह फैल गई। फिर रंजना का शर कभी भी ऊंचा नहीं दिखा। वह हमेशा खोई-खोई सी दिखने लगी। उसकी शोख़ी व चंचलता कहीं गुम हो गए थे। उसे हंसते हुए किसी ने नहीं देखा - हमेशा गंभीर और शून्यवत्। ‘रंजना! जो होना था सो हो गया। तुम्हारे ज्यादा आंसू बहाने से सुरेन्द्र लौटकर नहीं आने वाला। अभी तुम्हारी उमर बाकी है। सपने हैं आकांक्षाएं हैं। क्यों न दूसरा सुरेन्द्र ढूंढा जाए?’ मामी की ऐसी बातें सुनकर वह दहाड़े मारकर रोने लगी थी, मानो सुरेन्द्र अभी अभी गुजरा हो। मामी बहुत मुसकिल से उसे शान्त कर पाई थी । ‘आप भी मुझे वैसी समझती हैं, मामी!’ कहकर बहुत देर तक रोती रही थी वह। फिर अब ऐसा दिन देखना पड़ रहा है। कमरे में सिलिंग में लटककर रंजना ने खुदकुशी की कोशिश की थी। छोटी बच्ची सो चुकी थी। अपने ही कमरबंध से फांसी लगाकर उसने इस संसार को छोड़ना चाहा। पर उसके जीवन के दिन बाकी थे। लड़की जागकर रोने लगी थी। कमरबंध टूट गया था और वह जमीन में आ गिरी थी। फिर सारे दरवाजे खिड़कियां बन्द कर बहुत देर तक रोती रही थी। लगा रंजना आंखें खोल रही है। मामी दौड़कर बेड के पास पहुंच गई। उसके अतीत की यादों की लहरों पर खलल पड़ गया। दरवाजा खुला और नर्स भीतर आ गई। उसने रंजना को देखा, सलाइन चढ़ाया और बोली - ‘लगता है होश में आएगी। प्रेसर पहले से काफी बढ़ा हुआ है।’ अंजू ने बात को दूसरी तरफ मोड़ दिया। कहने लगी - ‘नानी ! मुझे भुख लग रही है।’ मामी ने बैग से एक पैकेट बिस्किट निकालकर उसे दे दिया और कहा - ‘नानु अभी यह खाओ! तुम्हारी मम्मी अच्छी हो रही है।’ ‘इस बार इसको बचा सके तो फिर.........इसे कहां छोड़ुंगी......... कभी इसे अकेली रहने नहीं दूंगी। पहले मेरी बुद्धि मारी गई थी।’ मामी ने ऐसा कुछ सोचा और फिर बाहर देखने लगी, शाम होने को आई थी। फिर उसी शाम के साथ विगत की यादें भी आ गईं। फांसी लगाकर मरने के असफल प्रयास के बाद रंजना पागल सी हो गई थी। जिसे देखो उसे ही बड़ी बड़ी आंखें तरेरकर कहती - ‘तुम्हीं ने मारा है मेरे शौहर को। क्यों बेशरम हो कर मेरे सामने आते हो?’ फिर महल्ले के सारे युवाओं को डांटती - ‘तुम लोग मुझसे आंख लड़ाने आए हो, मेरे शौहर की मौत की खबर जानकर।’ कभी तो रंजना खुकुरी लेकर सड़क में निकल पड़ती और चिल्ला उठती - ‘मुझे षड़यन्त्र में फंसाकर मारना चाहनेवालों को मैं मूली की तरह काटकर दिखा दूंगी।’ भांजी रंजना अब मामी के लिए ही नहीं, महल्ले में ही मुसिबत बन गई थी। उसके लिए कितने ही विधुरों से हाथ जोड़ा गया। बहुत बूढ़े कुमारों से भी कहा गया कि रंजना को अपना ले। पर रंजना के मानसिक असंतुलन के कारण कोई भी बात आगे बढ़ नहीं पाई। हर प्रस्ताव में वह दहाड़े मारकर रोने लग जाती। वह हां या ना कुछ नहीं कहती थी। महल्ले के लोग और अपने रिश्ते के लोग उसे कुरेदने लगते तो वह सहज रूप से टाल जाती - ‘आप लोग मुझे क्या समझते हैं? मैं इतनी पतिता हो गई?’ फिर समस्याएं बढ़ जातीं। कभी तो रंजना तीस-चालीस स्लिपिंग टैबलेट निगलकर तीन दिन तक बेहोश पड़ी रहती और सब परेशान रहते। कभी चुहे के विष में अपना भविष्य ढूंढती। ऐसे ही सहन किया था मामी ने - रंजना के देहत्याग की यह निरीह यात्रा। दूसरे दिन सूरज निकलने के पहले ही मामी हस्पताल पहुंच गई। उसकी आंखें खुली थी यानि की उसे होश आ गया था। ‘मामी आ पहुंची.............’ मरियल आवाज में रंजना ने मामी का स्वागत किया। ‘कैसा लग रहा है, भान्जी तुम्हें! मैं तो डर गई थी कहीं कुछ हो जाएगा। तुम्हारे साथ दोहरी बातचित की आश तो मर चुकी थी। धन्य भगवान की कृपा !...........’ उन्होंने कहा। रंजना की आंखें हरे रंग से पुति हुई दिख रही थीं। असल में वह सचमुच बेचारी हो गई थी। मामी ने आहिस्ता से समझाने की कोशिश की - ‘ऐसा सात जन्मों तक नरक में डालनेवाला काम क्यों करती हो रंजू?’ कहो तुम्हें क्या चाहिए? हम मामा-मामी मिलकर तुम्हारी इच्छाएं पूरी कर देंगे। तुम्हारे मां-बाप हमें सौंप गए थे। हमें तो अपना कर्त्तव्य पुरा करना है, नहीं तो भगवान को क्या मुंह दिखाएंगे?’ अचानक मामी की रूलाई फूट पड़ी। आंसू के बहाव को वे रोक नहीं सकीं । आंसूओं के साथ उन्होने दो हाथ जोड़े- ‘विनती है रंजू ! तुम अपने को ऐसे मत मारो। इस अनित्य संसार में कौन हमेशा जीता है! अमर तो कोई नहीं है! एक दिन तो सभी को जाना है। फिर इस अंजू के लिए भी तुम्हें पाप का रास्ता नहीं लेना है।’ मामीको लगा रंजना ध्यान से उनकी बातें सुन रही है। रंजना की आंखों में आंसू आ गए। असल में वह रो रही थी। मामी को लगा संसार की सारी रंजनाएं इसी तरह रो रही हैं। उन्होंने दोनों आंखों को ढांप लिया। फिर वे रंजना को समझाने लगी - ‘रंजू आखिर तुम चाहती क्या हो? अपने दिल की बातें बिन झूठ, बिन छिपाए कहो। डरने या घबराने की कोई बात नहीं, भांजी। हम तुम्हें खुशहाल देखना चाहते हैं। मालूम है तुम्हारे-हमारे दुश्मन कितना हंस रहे हैं?’ 'मामी भूल हो गई - माफी चाहती हूं। इस बार जैसे भी हो मुझे बचाओ...... जैसे भी हो..... चाहे जितना खर्चा लगे। फिर से ऐसी गलती कभी नहीं करूंगी। मामी मेरा विश्वास करो। मैं अंजू को अनाथ नहीं बनाना चाहती।' न जाने क्यों रंजना के स्वर कांप उठे। फिर वह बड़बड़ाती रही - मुझे जीना है, मैं मरना नहीं चाहती। मैं अंजू को खुद बड़ी बनाना चाहती हूं। मैं अब उसके हाथ पीले करके ही मरूंगी। 'मुझे जैसे भी हो बचाओ डॉक्टर.......... मुझ में जीने का मोह जाग ऊठा है, मैं जीऊंगी डॉक्टर......मैं जीऊंगी.....।' रंजना ने चिल्लाना चाहा पर न जाने क्यों नहीं चिल्ला पाई। मामी ने देखा रंजना की हालत ठीक नहीं थी। भीगी हुई आंखें सुख गईं थीं। हाथ पांव अचानक बरफ जैसे ठंड पड़ गए थे। मामी को लगा नाटक का अन्तिम पर्दा गिर रहा है। उन्होंने झट् नर्स को बुलाया। डॉक्टर तुरंत आ गए फिर रंजना को देखकर फैसला सुना दिया- 'सी इज डेड, आइ एम सारी ! यह मर चुकी है।' 'क्या कहा डॉक्टर साहेब रंजना मर चुकी, उसे जीने की बड़ी चाह थी डॉक्टर साहब, वह जीना चाहती थी.......' मामी ने रोते हुए सुनाया। बाहर आकाश में कौवे बुरी तरह शोर करने लगे। ***
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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