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छिंडीभरका आकाश

--परशु प्रधान

      माने की नींद अचानक खुलती है और वह देखने लगता है कमरेभरका आकाश। आंखीझ्याल से सुरज की दो किरणें भीतर घुस रही हैं। पश्चिम के तरफ की छोटी सी खिड़की बन्द पड़ी है। वह अपने को थका हुआ महसूस करता है। गला प्यास से सूख गया है। आज फिर किस मुंह से घर जाए? यह क्या हो जाता है उसको सब दिन। रूपये मिलते ही क्यों वह शराब में डूब जाता है? बिछौने पर ही वह जेबें टटोलता है। और बाकी मिलता है सिर्फ एक रूपये का नोट। वह धीरे से उठकर बगलवाले कमरे में चला जाता है।

"सानी दीदी............."

सानी दीदी शराब बना रही है। पानी बदलने की आवाज अच्छी तरह से सुनाई दे रही है। माने का दिल करता है वह देखता सानी दीदी का शराब बनाना। सानी दीदी अपने ही सुर में चिल्ला उठती है - "ओए जेठी जल्दी से पानी ला, दूसरा दौर अभी बाकी है।"

"सानी दीदी थोड़ा गरम नहीं है क्या ? बहुत जकड़ हो रही है।" धीरे से कह उठता है  माने।

"थोड़ी देर ठहरो। अब सिर्फ दो बार पानी बदलना है।" मुस्कुराते हुए कहती है सानी दीदी। सानी दीदी का चेहरा ध्यान से देखता है माने। लाल-लाल आंखोंवाली अधेड़ औरत। कान में छोटे टॉप। कभी कभार जवान जैसी। माने का दिल उतावला हो उठता है उसे छेड़ने के लिए- "क्यों घर नहीं बसा लेती सानी दीदी?" गुस्सैल हंसी छोड़ती है सानी दीदी। माने को मजा आ रहा है। अचानक वह डर जाता है- न जाने क्या कहेगी गोरे की मां आज। एक एक के दश नोट लेकर चावल खरीदने चला था वह कल। और फंस गया इधर। बच्चों ने क्या खाया होगा? उफ् कितना पापी है तू माने।

उधर गोरे की मां सोच रही होगी- अब तो जल्दी ही आ जाएंगे। पचहत्तर पैसे सेर( माना ) चावल खरीद कर कितने दिन जिया जा सकता है। मकई ले आना, थोड़ी बहुत बचत भी हो जाएगी फिर मकईका चावल शक्तिदायक भी  होता है। मकई मिला क्या? बच्चे भूख से मरे जा रहे हैं। सुबह से जोंधरी की एक रोटी पर ही तो टिके हैं। अभी बाहर हल्की बारिस शुरू हो सकती है। वर्षात् का मौसम है। मकई के पत्ते सरसरा रहे हैं। एक छोटी सी छिंड़ी है। टिमटिमाती बत्ती में गोरे की मां गमगीन नजर आती है। गोरे रूआंसा होकर पूछता है- "मां बापू नहीं आए क्या?"

      "आ रहे होंगे, ठहर थोड़ी देर।" गोद में बैठी दूधमुही बच्ची को स्तनपान कराते हुए कहती है गोरे की मां। लेकिन दूध तो निकलती ही नहीं है। लड़की बिलख बिलखकर रोती है। एक विदीर्ण वातावरण छा जाता है वहां। खाने पीने को कुछ मिलेगा तब  न दूध निकलेगी। पानी के अलावा शरीर में कुछ गया ही नहीं है। उसकी आंखें नम हो जाती हैं। सदा ऐसा ही है। इस कब्र में एक पेट खाना और एक टुकड़ा कपड़ा भी नसीब नहीं है।

माने को थोड़ा नशा चढ़ गया है। अनचाहे ही उठ खड़ा होता है वह और सड़क पर आ जाता है। एक छोटी सी सड़क। कचरे का ढेर। माने को देखकर कुत्ते भौंकने लग जाते हैं। वह अपनेआप को भी कुत्ता समझने लगता है। इसलिए उसने भौंकते कुत्तों को फटकार नहीं लगाई न ही उन्हें मारने को दौड़ पड़ा। माने का साया उसके आगे चल रहा है। फिर माने की हृदय की परतें खुसुर पुसुर करने लग जाती हैं एक दूसरे से। छोटी बेटी कितनी रोई होगी। उसका मुंह नीला पड़ गया होगा, रोते रोते। वह गोरे, बेचारा। भरपेट कभी खा नहीं पाया है। गोरे की मां की तो बात ही अलग। मुझे क्या- शराब पियो और चलो। मरे जा रहे होंगे सब। कितनी मुसकिल से जमा किए थे वे दश रूपए। एक ही बार में खत्म कर दिए। शराब तो उसने ज्यादा पी नहीं थी पर बाकी के नौ रूपए कहां से लाएगा वह ? बिन रूपए कैसे मुंह दिखाएगा गोरे की मां को ? दूर से एक आदमी आता हुआ दिख रहा है। शयद वह धने हो। वह नजदीक आ पहुंचने पर माने पुकार उठता है- "ओए ! ....... धने इधर तो आ।" धने चुपचाप आगे बड़ जाता है जैसे कुछ सुना ही न हो। माने जोर से चिल्ला उठता है- "धने........ ओए धने।" इसबार धने उसके पास आकर रूकता है। उसकी आंखे भी लाल हैं। शायद वह भी शराब पीकर आया हो। क्या मैं ही हूं शराब पीनेवाला। थोड़ी सा हिम्मत बटोरकर माने कहता है- "क्या थोड़े रूपए उधार दे सकता है मुझे !" हांलाकि वह जानता था वे दोनो एक ही खेत की मूली हैं। धने माने को सिर्फ देखता भर है। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे हैं। सड़क लगभग उजड़ गई है। धने की मन की लहरें माने की जिंदगी की तरफ जाती सी लगती हैं। धने इस नदी में गोता लगाता है, तैरता है फिर आकाश की तरफ देखता है। बादल फट रहे हैं। सूरज अभी निकला नहीं है। हां - सूरज निकलने का वक्त अभी थोड़ा बाकी है। बीसवीं सदी के लोगों की जिंदकी की ओर, उनकी जिंदगी के अंधेरे पक्ष की ओर, उनकी गली की ओर और दो रास्तों की ओर।

"बोल धने, तू क्यों नहीं बोलता?" खामोशी को तोड़ते हुए कहता है माने।

"तुझे नहीं मालूम.........?" अब धने ने मुंह खोला है।

"हैं तो दे दे न। कल पूरा का पूरा लौटा दूंगा।" बमुश्किल रूलाई को रोककर माने ने कहा।

"कसम से। मेरे पास रूपए नहीं हैं।" और वह अपना रास्ता नापता नजर आता है।

दोरास्ते पर खड़ा है माने, जैसे मेले में आया हुआ कोई किशोर, जो तय नहीं कर पाता है किधर जाएं। कहां जाए ? किधर जाए ? क्यों शराब पी उसने कल? क्या शराब मिटा सकती है उसकी विवशताएं ? भर सकती है उसका खाली पेट ? सानी दीदी का बनाया शराब ! उफ ! क्या है उसमें ? क्या है इस छोटे से झोपडे़ में, बोतल के पानी में ? इस सृजन में ? एक बूंद गरम शराब। नहीं वह तो एक प्याला गरम शराब है। उसका मन करता है सीधा लौट जाए। सानी दीदी का घर नजदीक ही तो है, जो उसके आंखों में बसा है। वह चुपके से सानी दीदी के घर में घुस जाता है और बिन आवाज किए सिड़ी चढ़ जाता है। सानी दीदी आंखें फाड़कर देखती है- । सानी दीदी आंखें फाड़कर देखती है- "क्यों आया है रे माने फिर यहां ?" उसकी भौहें तन जाती हैं।

"सा...........नी  दी...........दी !" डरा हुआ है माने।

"क्या ?" आशंकाओं से घिरी है वह। चेहरे में अविश्वास छाया हुआ है।

"कल कितने रूपए.... सानी दीदी......... मैंने...?"

"क्या बक रहा है माने तू ?" जबरन मुस्कुराती है सानी दीदी।

मन में ही हिसाब कर रहा है माने। '........नौ रूपए..... नौ रूपए बोलने का हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है वह। शराब के प्याले........ उधार चाहिए........समझ जाओ न सानी दीदी...' एक झीना स्वर...... लगता है एक दर्द पक गया है भीतर। दिल रो रहा है। दिल के खुले आकाश को काले बादलों ने ढक दिया है।

"क्या माने ?" नासमझ बनने की कोशिश कर रही है सानी। चुल्हे में भात पक रहा है। माने की आवाज भी भात पकने की आवाज में कहीं गुम हो गई है। एक थाली गरम भात, एक प्यालाभर सिस्नु का झोल......। बस् इतनी सी है उसकी चाहत।

"नहीं है रे माने, शायद पैसे माग रहा है।"

"दीदी भी .........!"

"माने कभी तूने सोचा है, आमदनी तो सभी देखते हैं, मगर खर्चा कोई नहीं देखता। जोड़ीपांच माना कोदो खरीदना है वह भी मिलने से रहा...........!"

"अपना अपना दुःख तो सभी झेलते हैं न दीदी। उधर बच्चे भूखे मर रहे हैं..........इसलिए......!" एक लम्बी सांस खींचकर कहता है माने- "मैं सोने जा रहा हूं सानी दीदी थोड़ी देर।"

और लेट जाता है माने। दृष्टि पड़ती है धुएं से काले पड़ गए ठेकों में। उसकी आंखों के आकाश में सिर्फ कालिख। सो नहीं सका है वह। कल शाम की बात है, गहराती हुई शाम में ही निकल पड़ा था माने। चावल की दुकान में जाकर चावल ले आना था। चावल का दुकान का रास्ता सानी दीदी के घर के पास से होकर गुजरता था। 'थोड़ा देदो न छह पैसे का। बाहर बूंदाबांदी हो रही है। आदत जो पड़ गई। थोड़ा गम भी तो भुलाया जा सकेगा। कितना ढोएं इस गमको !' पर उसकी प्यास तो एक दो प्याले से बुझने से रही। गोरे की मां भी उन्हीं शराब के प्यालों में खो जाती है। फिर तो गहरी नींद में सो जाता है माने। भारी पलकें खुलने का नाम ही नहीं लेतीं।

ढलता हुआ दिन। फिर भी बाहर काफी गर्मी है। इस छोटे से झरोखे से हल्की सी हवा कमरे में ढुक रही है। माने की आंखें अब जाकर खुलती हैं। थोड़ा ताजा महसूस करता है वह। दूसरे कमरे आ रहीं बर्तनों की खनक उसके कानों में पड़ रही है। वह उठ जाता है, जो भी हो घर तो जाना ही होगा......... यूं ही सदा बाहर तो रह नहीं सकते न....।

पर गोरे....! उसकी मां के सुखे स्तन....! तीन महीने की बच्ची। कैसे देख पाएगा वह...? वो सुखे हुए होंठ, भूख से परेशान चेहरा, कौन सा चेहरा लेकर जाए वहां ? उस छिड़ीं में छोटा सा  किराए का कमरा कमरा। उफ ! किराया भी कितना बकाया है। काम मिले भी बहुत दिन हो गए। मिस्त्रीगिरी भी तो नहीं मिलती। बोझा ढोकर तराई भी जा सकते थे पर वही मलेरिया का डर जाने नहीं देता।

सोच को लगाम देकर माने सड़क पर निकल पड़ता है। सूरज धीरे धीरे सोने जा रहा है। आशा और निराशा के निशान चिपक जाते हैं माने के हृदय में। कहीं लकड़ी लेकर बरस न पड़े बीवी, उसकी आदत जो है। बेचारी क्या करती वह भी ? भूखे बच्चों की छाया से तिलमिला उठी है वह...........। आस पास की दुकानों को बेचारगी से देखते हुए आगे बढ़ जाता है माने। एकएक रूपए के नौ नौ नोट उसकी आंखों के सामने नाच रहे हैं। बीवी का एक मात्र नथ जो अभी तक बचा हुआ था उसी को बेच कर लाए गए थे वे नोट। बेचारी वही एक नथ तो लाई थी मायके से.......धन या दहेज, जो कहें। सिर्फ एक नथ।

शाम होने को है। दिल की धड़कनें बढ़ रही हैं........शोले  उठ रहे हैं..........कांटें चुभ रहे हैं। अलसाता हुआ वह गली से गुजरकर छिड़ीं तक पहुंचता है। धूप्प अंधेरा है छिड़ीं में। कोई आवाज नहीं, कोई हलचल नहीं। वह झरोखे से भीतर झांकता है। दूर कोने में थोड़ी सी आग लपटें फेंक रही है, जी जान से। वह सांस रोके खड़ा रहता है.........लगता है, कोई जीवित नहीं बचा। उसे एक आशंका बुरी तरह से जकड़ती है, क्या मर गए सब भूख से ? हिम्मत बटोरकर धीरे से टूटा हुआ दरवाजा धकेलता है।

"मां किधर है गोरे ?"

"मां.........."

"हां, तेरी मां किधर है ?"

"बाहर गई है।"

"कब आएगी?"

"मालूम नहीं..................।" मरियल आवाज में कहता है गोरे।

"क्या पका रहे हो ?"

"आलू.........." चिमटा लेकर गोरे बर्तन टटोलता है।

"नहीं पका अभी तक ? आलू है क्या ?"

"क्या मालूम, पक जाने पर निकालकर खाने को कहा है मां ने।"

माने को गोरे का थोड़ा सा ही चेहरा दिखाई पड़ता है। आग की मद्धिम रोशनी में बुझा हुआ खाली चेहरा। एक झीनी सी आशा............पक जाने पर खाना है......पक जाने पर खाना है......।

माने चिमटा लेकर उस चीज को टटोलकर देखता है।.... यह क्या ? यह चीज तो बहुत सख्त और कड़ी है। बाहर निकालकर देखता है........अरे यह तो बट्टा है। कब पकेगा यह पत्थर ? एक आशा देकर बचाना चाहा था गोरे को उसकी मां ने। धन्य है तू , गोरे की मां ! माने की आंखें भर जाती हैं। पत्थर ... एक बट्टा....।क्यों बचे हुए एक रूपए से और कुछ खरीद लाने का साहस भी नहीं कर पाया माने। वह बाहर निकल पड़ता है- ठहर गोरे मैं कुछ ले आता हूं खाने के लिए...। फिर दो चार कदम आगे बड़ जाता है वह। छोटी सी बच्ची को दबोचे एक औरत अंधेरे में खड़ी दिखती है। पहचानने को देर नहीं लगी। न पहचानने का ढोंग करते हुए वह आगे बढ़ना चाहता है। एक झीनी आवाज उसे रोक देती है- " गोरे के बापू ! ओ गोरे के बापू........।" लड़की रो पड़ती है, हुआं ....हुआं....। दो साए । एक छोटी सी लौ अब भी छिड़ी के भीतर जल रही है। उफ......... गोरे की छोटी सी आशा....! एक हूक सी उठती है माने के दिल में। "मत रो मेरी बच्ची ! मत रो.....!" गोरे की मां बच्ची को चूप कराने में लगी है। लेकिन बच्ची है की घबराकर और जोर-शोर से रो रही है। सुखी आवाज में गोरे की मां कहती है- "दूध तो आती नहीं।किसी ने कुछ नहीं दिया, गोरे के बापू।" एक लम्बी सांस खिंचती है वह। लम्बी सी आह..........। धीरे से बोल पड़ता है माने- "तेरी नीरस छाती , खुखी हुई छाती, बंजर जमीन कैसे दूध देगी गोरे की मां ? कैसे ?"

***

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 


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