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बेनामी शहर में –परशु प्रधान
हवाईजहाज में यान्त्रिक खराबी के कारण हवाईजहाज इस शहर में उतरने को बाध्य हुआ था जिस की बजह से मैं इस शहर में हूँ जिसके बारे में मुझे कतई मालूम नहीं । बचपन में कहीं भूगोल की किताब में नाम तक पढा हो सकता है । अन्यथा मैं इस शहरको बेनामी ही कहूँगा । करीब बाह्र घन्टे के लिए यहाँ रुकना था इसलिए मैं शहर घुमने निकल पडा । शहर छोटा था लेकिन जहीं-तहीं लोगों की भीड़ थी । मैने देखा सब जल्दी में थे । किसीको दूसरे के बारे में जानने या मालूमात करने की फुरसत नहीं थी । शायद शहर की भयानक दूर्गन्ध की बजह से सभी के मूंह पर छोटे कपडे की पट्टी बन्धी होती थी । छोटे-छोटे बच्चे से लेकर बुढों तक दौड़ लगा रहे थे जैसे कहीं मेले में जा रहे हों । मुझे लगा कहीं कोई बम फट गया हो या फिर लडाई शुरु हो गई हो । परन्तु खास वैसा कुछ न लगा । मैने बसस्टाप पर बैठे एक अधेड को सामान्य अंग्रेजी में पूछा - आपको अंग्रेजी आती है क्या? उसने स्वीकारोक्त्ति मे शिर हिलाया । मैने फिर पूछा- इस शहर के लोग क्यो इतना शोरगुल करते हुए दौड़ रहे हैं? क्या कोई लड़ाई छिड़ गयी है? "नहीं" उसने न मे शिर हिलाया - "ये सबलोग मन्दिर जा रहे हैं । भगवान के दर्शन और आशीर्वाद के लिए । कोईकोई अपने काम में भी जा रहे हो सकते हैं ।" मै एक रेस्तरां मे घुस गया- चाय पिने के लिए । "चाय मिलेगी ?" आहिस्ता से पूछा मैने । चाय बनानेवाली छोटी सी लड़की बोली- "यहाँ सिर्फ ठण्डी चाय मिलती है !" मैने एक ठण्डी चाय का अर्डर दे दिया । वहां और भी लोग चाय पी रहे थे । मुझे देखकर वे सब मुस्कराने लगे । मेरी चाय आ गयी थी, मैने एक चुस्की ली । वह तो लोकल शराब थी । एक घूँट लेने पर ही मेरा मुँह जल गया । वे मुस्कुराते लोग मुझे देखकर तालियां पिटने लगे। मुझे वहां और ठहरना ठीक नहीं लगा और मैं चाय के पैसे देकर बाहर निकल पड़ा। बसस्टाप मे पहले से ज्यादा भीड़ थी। ज्यादातर युवा, अधेड़, महिलाएं और पुरुष थे। बस के भीतर कदम रखना एक बड़ी लडाई जीतने के बराबर थी। मैंने एक युवतीको पूछा-"ये लोग कौन हैँ।" वह शरमाते हुए बोली- "अभी दश बजनेको हैं और हम सब ऑफिस की तरफ जा रहे हैं। आज बसें कम चल रही हैं, इसलिए आप इतने लोगों की भीड यहां देख रहे हैं।" सड़क में कुछ भिखारी थे। मैंने सोचा ये तो शहरको गहने हैं। कुछ लड़के चिल्लाचिल्लाकर पत्रिकाएं बेच रहे थे। यहां की भाषो तो मैं समझ नहीं जानता लेकिन मैंने अनुमान लगाया- मन्त्रीमण्डल बिघटन होने जा रहा है। सड़क में बैठे कुछ लोग अखबार पढ़ रहे थे। मैं दूसरे बसस्टाप में पहुंचा। उस स्टाम में कोई भी बस में चढ़ नहीं रहा था। सब बस से उतर रहे थे। मैंने एक युवक को पूछा- "यहां बस से सब क्यों उतर रहे हैं ? क्यों कोई चढ़ नहीं रहा ?" उसने जवाब दिया - "ये सब सरकारी मुलाजिम हैं। सब हाजिरी देकर लौट रहे हैं।" मैंने फिर जानना चाहा- "इनको ऑफिस में कोई काम नहीं है क्या ?" उसने उसी लहजे में जवाब दिया - "ऑफिस में इनके लिए कोई काम नहीं है। ये सब सिर्फ हाजिरी देते हैं और वेतन लेते हैं।" मुझे यह शहर ही नहीं , यहां की हर क्रियाएं ौर गतिबिधियां नये लगे। मौसम मेरे लिए अनुकूल न था - न गरम न ठंडा। सड़क में चलते चलते मैं एक बड़े महल के सामने पहुंचकर ठहर गया। महल भब्य और आधुनिक तो था ही साथ ही महल में बहुत रंगो के झंडे लगे हुए थे। वे झंडे सफेद, काले, हरे, नीले और लाल थे। कुछ झंडों में सांकेतिक चिह्न भी लगे हुए थे। किसी में सूरज, किसी में चांद तो किसी में हिमाल। किसी में पेड़ तो किसी में चिडिया। वे चिह्न देखकर मुझे बहुत अच्छा लगा। यहां ढाकर लिए लोग भी थे और पजेरो जीप में आए लोग भी थे। सिर्फ धोती कुर्ता पहने लोग भी थे। महिलाओं से ज्यादा पुरुष थे। यहां क्यों ऐसी भीड़ है ? मैंने जानना चाहा। किसी ने मुझे समझाया- "यह दूकान है न; वहां से हर तरह के झंडे खरीद सकते हैं।" "झंडो के मूल्य किस आधार पर निर्धारित किए गए हैं ?" "पहले पहले पीले रंगवाले झंडे का मूल्य ज्यादा था। इसी बीच नीले ने अच्छे पैसे वसूल किए। पर अब लाल रंग का बोलबाला है।" और भी बहुत से शहर घूमा हूं मैं लेकिन रूपये से राजनैतिक झंडे खरीदा जा सकनेवाला शहर मुझ अच्छा लगा। मुझे रात के आठ बजे एयरपोर्ट पहुंचना था। लगा क्यों न इसी अनुठे शहर की सैर में दिन बिताया जाए ? ऐसा सोचते हुए चलने लगा और एक दूसरे महल से सामने रूकने को बाध्य हो गया। मुझे लगा मैं कहीं परिकथाओं में वर्णित मकान के सामने आ गया हूं। उस भव्य और विशाल महल में एक आदमी डरते हुए कि कोई देख न ले, भीतर घुसता है और दूसरा हंसते हुए बाहर आता है। यह मकान कौन सा चमत्कारी मकान है ? यह कौन सा मकान है ? निश्चय ही यह कोई शक्तिशाली मकान होगा। मैने झट पूछ ही लिया । एक भारीभरकम आदमी ने जवाब दिया- "कुछ खास नहीं, यह मकान डाइरेक्टर और जी.एम. नियुक्त करने का मकान है। मैं आज से जी. एम. नियुक्त हो गया हूं। आप कहां से हैं ?" उसने मुझे पूछा। और मैंने जवाब दिया - "मैं विदेशी हूं प्लेन खराब होने कि बजह से आपके शहर में आ पहुंचा। शहर कुछ फर्क सा लग रहा है, इसलिए निकल पड़ा घुमने। आज शाम आठ बजे की फ्लाइट है।" फिर उस मकान से अधेड़सा आदमी निकला जो सुटेड-बुटेड था। वह पहलेवाले को कान में कुछ कह रहा था- "मुझे भन्सार( कस्टम्स) सम्हालने को कहा गया है। ज्यादा कुछ कबुलना नहीं पड़ा।" मैं अब जरा अनमना अनुभव कर रहा था। कैसी जगह पहुंच गया मैं। लगा सैल को यहीं स्थगित करके किसी लॉज में जाकर सो जाऊं। फिर भी इस शहर के बारे में और भी जानकारी लेना अच्छा लग रहा था। इतना अच्छा मौका और फिर मिले ना मिले। मै मुख्य सड़क से होकर एक गली कि तरफ मुड़ा। कुछ देर गली में चलने के बाद फूलके गमले दिखाइ दिए। और वहीं एक पोष्टर में लिखा मिला- "शहर को साफ और स्वच्छ रखें और हरियाली से ढकें।" मैंने उन गमले के फूलों को छुआ। वे बहुत अच्छे थे, सुन्दर थे मगर प्लाष्टिक के थे। मुझे हंसी छूट गई पर मैं मन में ही हंसने लगा। क्या प्राकृतिक फूल सब निर्यात होते हैं क्या? गली के समाप्ती के बाद एक सुन्दर पुल मिला जिसकी छठा देखने लायक थी। पुल के रेलिंग में तीन युवक थे। इस शहर में यह मेरा पहला अनुभव था। मै पुल के उस पार जाना तो चाहता था पर वे तीन युवक मुझे पकड़ने के लिए झपटे- "हमलोग सिक हैं, हमें सौ डालर की जरूरत है।" "सौ डालर .........." मैं चौंक गया। उनसे पीछा छुडवाने के लिए मैंने दश डालर फेंके और दौड़ने लगा। कुछ देर तक तो उन्होने मेरा पीछा किया पर उनकी शक्ति जवाब दे गई और वे लौट गए। शाम होने को थी। पुल पार करते ही मैं एक गन्दी बस्ती में पहुंच गया जहां छोटे छोटे झोपड़ें थे। छोटे बच्चे सड़कों पर ही शौच कर रहे थे। और उनकी माताएं ग्राहको की तलाश में थीं। झोपड़े पास से एक छोटी सी नदी बहती दिखी जो इतनी प्रदूषित थी की मुझे मितली होने लगी। मैंने पूछा- "यहां क्या है और यह सुखी हुई औरतें मुझे देखकर क्यों मुस्कुरा रही हैं ?" किसी ने धीरे से जवाब दिया- "ये यौन के व्यापारी हैं। आप सस्ते में मजे लूट सकते हैं।" मैंने उनकी आंखें देखी, शून्य और बेचारी आंखें। कोई ज्योति नहीं उन आंखों में। मुझे लगा वे जिन्दगी से थक चुके हैं, विवश और बाध्य हैं। मुझे बहुत बुरा लगा और मैं जल्दी से वहां से भाग निकला। मैंने जो देखा उसे मैं कमरे में कैद नहीं कर सका क्योंकि मैं कैमरा एयरपोर्ट में ही भूल गया था। मुझे लगा अब लौटना चाहिए। लन्च ले चुका था। लौटने के क्रम में एक मोड़ में रूका जहां एक और भीड़ दिखाई दी। वह युवाओं की भीड़ थी। "युवाओं का इतना बडा़ समूह क्यों ?" मैं पूछ बैठा। किसी ने मुझसे कहा- "यह भीड़ विदेश जाना चाहनेवालों की भीड़ है। कोई अमरिका जाना चाहता है, कोई इंगलैन्ड। नौकरी के लिए लोग जापान, कोरिया और ताइवान जा रहे हैं।" "यहां इन लोगों के लिए कोई काम नहीं है क्या ?" मुझे आश्चर्य हो रहा था। "नौकरी न मिलने पर ही ये विदेश जा रहे हैं। ये सब अपने घर, खेतखलिहान बेचकर विदेश जाने की तैयारी में हैं। पर मैं नहीं जानता, ये लोग पहुचेंगे या नहीं।" किसी ने मुझे सुनाया। इधर की सभी बातें जानने को मन हुआ। विश्व का यह कौन सा देश है? विश्व का कौन सा शहर है ? गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में स्थान पाने योग्य कौन सा शहर है ? मैं इस शहर को कोई नाम देना नहीं चाहता। यहां की बिशेष बातें मैंने अपनी डायरी में नोट कर लिया है। हो सकता है विदेश में मुझे कहीं बोलना या लिखना पड़े। इस बार की यात्रा मे अचानक इस शहर में बारह घन्टे मजे से बिताने का मौका मिला उसके लिए अपने आपको खुसनसीब समझते हुए मैं प्लेन में चढ़ गया। मुझे लगा धन्य है सह शहर ! यह बेनामी शहर ! विश्व मानचित्र में कहीं न दिखनेवाल यह शहर। *** मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी
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