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बक्ररेखा

--परशु प्रधान

     कमरे की दलिन पर लटकी हुई लाश मुझे अपनी सी ही लगती है। उसकी नीर्जिव आंखें, स्पंदनहीन दिल मुझमें बदल जाते हैं और मैं भी स्पन्दनहीन, शून्य हो जाती हूं। बाहर ठंड बढ़ रही है। इस वर्ष ठंड भी जल्दी ही शुरू हो गई। बाहर से आनेवाली हर आवाज मुझे सावधान कर देती है। मैं जितनी जल्दी हो सके उठ जाती हूं और खिड़की से बाहर देखती हूं- अंधेरा तो वैसा ही है। सूनापन वैसा ही है कुछ बदला नहीं है। ठंड अपनी तरीके से ही बढ रही है। खिड़की से ठंड भीतर घुस रही है और मुझे लगता है- इसबार मैं ठंड सह नहीं सकूंगी। मैं सिहर जाती हूं। मैं खुदको कांटेदार तार अनुभव करती हूं- जो बरफ के बीच उगता है, जिसको रातभर का तुषार और दिनभर का कुहरा कुतर रहे हैं। बूढ्ढी याद आते ही मेरा बदन असहज हो उठता है। मै गल जाती हूं। मेरी आंखे बंद रहना चाहती हैं। पर मुझे बाध्य हो स्वीकारना पड़ता है - हां वह बुढ्ढी आई थी हमेशा की तरह आंखों में विवशताएं लेकर।

      ‘फिर आ गई मामी ?’- मैं पूछती हूं । बच्चे बाहर के चौक में खेल रहे हैं। शायद झगड़ भी रहे हैं। एक लड़के रोने की आवाज आती है। एक लड़की भी रो रही है। आवाज तो मेरे बेटे की जैसी है। मैं खुदको रोक नहीं पाती, खिड़की में पहुंच जाती हूं और देखती हूं - बेटा रो रहा है - पूरे चौक को हिला रखा है उसने। आसपड़ोस की खिड़कियां भी खुली है और औरतें बाहर देख रही है।

      ‘ए दीपु! ऊपर आ जा !’ मैं डांट लगाती हूं और बैठ जाती हूं। मामी मुस्कुराती हैं। मैं भी कोशिश करती हूं कि चेहरे पे मुस्कान आ जाए। पर होंठ सुखे से लगते हैं। मैं मुस्कुरा नहीं पाती। बुढ्ढी मामी के चेहरे की तरफ देखती हूं। गाल सब मुरझा गए है । ललाट सुखी है। आंखों में कुतूहल है, एक रहस्य है, जिज्ञाशा है। उन आंखों के पानी में कुछ मछलियां कुलबुलाती हैं। फिर तुरंत ही सांप बन जाती है और फुंकार के साथ मुझे घुरती हैं। मैं पूरी आंख खोल ही नहीं पाती। मैं डर जाती हूं।

      ‘क्यों तबीयत ठीक नहीं है क्या?’ बुढ्ढी हंस देती है। उसके दांत मिले हुए नहीं हैं । मुझे घिन आ जाती है।

      ‘क्यों नखरे कर रही है? तबीयत ठीक नहीं है?’ उसने फिर पूछा।

      ‘हां ऐसा ही कुछ है।’

      ‘क्या हुआ?’

      ‘सर घूमता रहता है। बदन भारी है, सहज नहीं है’

      ‘दीपु के बाप ! .......’ मामी डरी हुई सी दिखती है। उसकी छोटी सी आंखें इधर उधर देखती हैं। फिर खुदको हलका अनुभव करके कहती है - ‘ऑफिस में हैं क्या?’

      ‘हां’ मैं स्वीकृति में शर हिला देती हूं - अभी पांच बजनवाले हैं , काश यह बुढ्ढी मामी चली जाती। पर मैं कह नहीं सकती, कहने को कमजोर पड़ गई हूं। मेरा दिल धड़कता है। बहूत सी बातें याद करनी थी पर सब भूल सी जाती हूं। बाहर...........बाहर.........सूनापन है।

      ‘आज आओगी भांजी?’

      ‘हां क्यों नहीं !’

      मामी के आंखों में आश्यर्य दिखाई देता है। पुराने दिन सामने आकर मेरा गला घोंटने लग जाते हैं। मुझे लग रहा है सब कुछ सपना है। कभी दिन थे - जब मामी जवान हुआ करती थी। उसके पलकों में हमेसा सपने खेला करते थे, दिल हमेशा धड़कता था। वह बहुत सुन्दर थी, बहुत ही सुन्दर। लेकिन मामा की मौत हो चुकी थी और मामी का सौन्दर्य उस अज्ञात तालाब जैसा था जिस में हवा अपने ढंग से लहरें उठवाता, जो आकाश छुने को बेकरार रहतीं। पास के दरख्त टकटकी बांधे देखते रहते, लहर लौट पड़ते और आकाश देखता ही रह जाता। पर वह दरख्त भी पुराना हो गया था बिलकुल मेरे मामा की तरह।

      ‘तुम सुन्दर हो’ मामी कहती थी - ‘एक लड़का तुम्हें वहुत पसन्द करता है’

      जब मैं मामी के घर जाती तो मुझे पसन्द करनेवाला लड़का बैठा मिलता । उसके होंठ सन्तरे के      माफिक लाल थे और चेहरे पे प्रौढ़ता चढ़ नहीं पाई थी। मामी बाहर होती थी। बैठक में वह रक्सी पी रहा होता था। प्लेटों मे मिर्च का अचार होता। ‘एक लड़का तुम्हें बहुत पसन्द करता है’  यह यही लड़का था कमरे में अचानक एक युवती को देखकर वह लड़का चौंका, थोड़ा सकुचाया और थोड़ा खिसक कर बैठ गया।

      ‘मामी कहां गई है?’ नए परिचय में मैं नम्रता की चादर ओड़े उसे पूछती हूं। देखते ही उस लड़के के गालों में रंग चढ़ आता है, वह लाल दिखता है।

      ‘तुम.............तुम सुभद्रा हो !’

      ‘हां’ मैं शरमा जाती हूं और भाग जाती हूं। इस तरह से शुरू हुआ था वह परिचय जो मैं अबतक नहीं भुला पाई हूं। मामी थी, मैं थी और एक अमीर साहू का बेटा वह लड़का था। वह लड़का मुझसे शादी करेगा, इसी विश्वाश में बहती गई। पर वैसा कुछ हुआ नहीं और वह लड़का अचानक मेरे सामने से ओझल हो गया। मामी ने आसानी से कह दिया -‘काजी को दूसरी औरत चाहिए। उन्होंने कहलवा भेजा था।’ मैं देखती ही रह गई। मामी का चेहरा कुछ भी बदला नहीं था। आवाज में भी परिवर्तन नहीं था। ‘एक आदमी तुम्हें बहुत प्यार करता है’ जैसे ही ‘काजी को दूसरी औरत चाहिए’। उसके बाद बहुत दिनों तक मैं मामी के यहां नहीं गई। मेरी जरूरत नहीं थी शायद मामी को।

      मेरी मुक्ति नहीं है। फिर एक शाम मामी हंसते हुए कहती है -‘आज तो जाना ही होगा  मैं चुपचाप चली जाती हूं। कोई विरोध नहीं, कोई विकृति नहीं। मामी का कमरा पहले से ज्यादा सजाया हुआ था। एक टेबल और कुछ कुर्सियां भी रखी हुई थीं। चादर साफ और तनी हुई थी।

      ‘मामी के कमरे ने तो अपनी काया पलट ली ! नहीं?’

      एक बार नीली पड़ गई मामी । फिर हंसते हुए कहती है- ‘क्या बदला है सुभद्रा! तुम बहुत दिनों में आई न, इसलिए तुम्हें कमरा नया लगा।’

      मामी के सानिध्य के वे दिन मैं लगातार याद कर रही हूं। एक बाध्यता है- मैं भूल नहीं सकती। सूरज डूबनेवाला है। देखती हूं - मामी के चेहरे के माफिक है। कमरे का रहस्य भी वैसा ही है।

      जानी पहचानी आवाज है - ‘भोज है बोल के आ जाना! फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए। आज मैं जल्दी में हूं भांजी, चलती हूं।’ मामी चल देती है। उसकी आंखों में विश्वास है और यह रात की तरह मेरा विश्वास पतला हो रहा है। मैं उस विश्वास को जीतने का प्रयास करती हूं। इस दलदल में फिर न डुबने की कोशिश करती हूं। बाहर आवाज नहीं है। कुछ भी नहीं गुंज रहा है, सब सूना है।

      रात गहरी होती जा रही है। दीपु के पिताजी अभी तक नहीं लौटे हैं। लेकिन.....लेकिन मेरी पूरी आंखों में मामी बसी हुई हैं। हाय ! कैसी औरत है, कितनी जिद्दी है। मेरी शादी के बाद भी उसने मुझे नहीं छोड़ा। फिर कैसे डराती भी है - ‘आ जाया करो सुभद्रा। शादी हुई, अच्छा ही हुआ। तेरे शौहर मेरे जमाइ हुए न।’ शादी के बाद भी, किसी को पति के रूप में अच्छी तरह से स्वीकार लेने के बाद भी मुझे नहीं छोड़ा मामी ने। बिते हुए कल की बात को मैं नहीं कहकर नहीं नकार पाई। याद करते ही दिल फुल जाता है। कहराते हुए रोने को दिल करता है। दीपु के पिताजी के इमान्दारी और भलमानसी का मुझे मजाक नहीं उड़ाना चाहिए था। किन्तु मामी ! .... मामी !! मैं कितनी विवश हूं। दीपु के जन्म के बाद भी मामी आसुरी अन्दाज में कहती है - ‘तू तो अब भी जवान दिखती है रे, क्या हुआ जो एक लड़का हो गया तो ! दो महीने हो गए। है न? हां कल आ जाना, कहना गुठी पूजा है................।’

      ‘गुठी पूजा है, रात भर खाना-पीना होगा कहके मैं कैसे उनको झांसे में रखूं मामी..........’ रोनी सुरत बनाकर कहती हूं मैं।

      ‘एक बोतल ऐला और थोड़ी सी छोएला लाकर दे देना फिर तो विश्वास हो जाएगा..........’ मामी के होंठों पर मुस्कान देखना चाहती हूं मैं। लेकिन नहीं। वह कठोर दिख रही है। शायद फिर कह उठे - ‘जमाइ को बोल के तेरी.........!’ मैं बोल नहीं सकी। अपने इतिहास से मैं बहुत डरी हुई हूं, पीड़ित हूं और मुझे लगता है मैं मौत के बहुत करीब हूं। अगर दीपु के पिताजी को पता चल गया तो? हाय! वे भी तो पुरूष हैं! पर वे कभी कुछ कहते ही नहीं। ‘रातको भोज से क्यों देर आती हो? जल्दी क्यों नहीं चली आती?’ ऐसा कभी नहीं कहते। पत्थर जैसा मर्द। रात को ग्यारह बारह बजे चुपचाप कमरे में लौटती हूं - ‘गुठी के पूजा में गई थी। रात भर भोज चलती है वहां।’ कहते हुए दरवाजा खोलते ही मैं डर जाती हूं, घबरा जाती हूं। फिर जोड़ से कहती हूं - ‘दीपु के बापू भोज अभी भी चल रहा है। गुठी पूजा भी पूजा ही है। नेवारों का बड़ा त्योहार!’

      ‘नेवारों की जाती ही....................’ दीपु के पिताजी की बोली पूरी होने से पहले ही मैं कमरे में पहुंच जाती हूं। बदन में हरारत सी है, थोड़ी रक्सी की, थोड़ी वह बलवान मर्द की और थोड़ी मामी की। हरारत में ही मैं सो जाती हूं। सबेरे उठते ही रात के सपनों को याद करने की कोशिश करती हूं। मैं मेरी शक्ति की हद तक तैर रही थी, पर जब भी मैं किनारों की तरफ लपकती त्योंही किनारा मुझसे दूर भागता। उस अथाह समुद्र को याद करते हुए सुबह भी डर लगता है, दिल कांप उठता है। सबेरे भी उसके होंठों पे नयापन नहीं है। बोली भी वही पुरानी है।

      ‘भात पक गया?......’ वे सदा की भांति पूछते हैं।

      ‘पक रहा है............’ मैं निस्तेज जवाब देती हूं।

      ‘ऑफिस के लिए देर नहीं होगी क्या?’ वे सशंकित हैं। पर शुक्र है भगवान का वे मुझे शक नहीं कर सकते। रात को देर तक भोज पर न बैठने के लिए नहीं कह सकते। ऑफिस जाना और आना। कितना नियमित हैं वे। कभी ऑफिस से आते वक्त देर हो गई तो सकुचाते हुए कहते हैं- ‘आज देर हो गई। ऑफिस का काम कल के लिए भी नहीं छोड़ सकता था।’ मैं ग्लानि से भर जाती हूं। शाम ढलते ही आसानी से वे कह देते हैं- ‘आज तुम्हें भोज में नहीं जाना है क्या?..................’

      मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं है। मैं भोज का भी कोई अर्थ नहीं ढूंढ पाती  न ही मामी के कमरे का। मेरे पास मेरे शौहर के भोलेपन का, मौनता का और उपेक्षा का अर्थ नहीं है। पर मेरा हृदय अपने ही अर्थों से भरा पड़ा है - शौहर के भोलेपन का, नम्रता का और निश्चल हृदय का। मैं इन सब को अर्थ प्रदान करने लगूं तो मेरी मानसिक मृत्यु हो जाएगी। मेरा दिल टूट जाता है, लगता है जोर से रोने लग जाऊं। अगर उनके पास जाकर मेरी गलतियों के लिए क्षमा मांगने का साहस जुटा भी पाई तो मेरे शौहर तो पत्थर के देवता जैसे है, मौन रहकर क्षमा कर देंगे और मुझे मुक्ति मिल जाएगी। पर मैं ऐसा नहीं कर सकती। मैं लाचार हूं, कमजोर हूं और मेरा नारीत्व मुझे ऐसा करने नहीं देता।

      रात बहुत बीत चुकी है और दीपु  के पिताजी ऑफिस से नहीं लौटे हैं। मामी के विश्वास मेरे पास आते हैं, फिर लौट जाते हैं। वह विश्वास, वह स्वर ! इन सबके ऊपर विश्वासघात करना होगा मुझे। विद्रोह करना होगा मुझे। पर फिर मुझे ही नहीं लगता ऐसा करने से मुझे मुक्ति मिल जाएगी। मेरे अतीत में जो है वह मिटनेवाला तो नहीं है। मेरे पास तो सिर्फ मौत है। इसिलिए तो दलिन पर लटक रही लास मुझे अपनी ही लगती है। शायद दीपु के पिताजी मेरी वैसी ही लास अपने पास पड़ी पाकर दहाड़े नहीं मार सकते। वह चुपचाप देखते हैं और मन में ही कहते हैं - ‘सुभद्रा ने फांसी लगा ली और मर गई।’ खिड़की खोलकर वह चिल्ला नहीं सकते - ‘गुहार, पड़ोसियों, सुभद्रा लटक गई।’ वे चुपचाप दीपु को लेकर सो जाते हैं और अगली सुबह किसी को बिन बताए चुपके से थाने में जाकर रपट लिखा लेते हैं -‘आगे, मेरी बीवी, सुभद्रादेवी मानन्धर कल रात कल रात 9-10 बजे दलिन में फांसी लगाकर मर गई। कितने कारणों से मरी है मुझे मालूम नहीं। हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ था। ऑफिस से देर से लौटा इसलिए कल आ नहीं सका। अभी सबेरे ही रपट लिखवाने के लिए आ गया हूं। सब सच है - झूठ हुआ तो कानूनी कार्वाई के लिए तैयार हूं। सुब्बा- हरिशंकर मानन्धर।’ इस घटना की कल्पना मात्र से भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है। लगता है मन में भूकम्प रख के जी रही हूं। नजाने कब भूकम्प उठ आएगा और जिन्दगी को तोड़ जाएगा।

      ‘आज भी देर हो गई!’ दीपु के पिजाजी कमरे में ढुकते हुए कहते हैं। मैं चौंक जाती हूं।

      ‘काम बहुत ज्यादा होगा शायद...........’

      ‘हां, भात पक गया क्या? आज भोज में नहीं जाना है क्या?’ वही साधारण भाव से निसंकोच पुछते हैं वे। कुछ देर पहले की कल्पनाओं से मैं सिहर उठती हूं, धूमिल पड़ जाती हूं और चौंक सी पड़ती हूं।

      ‘दोपहर को मामी आई........................’

      ‘फिर क्या ! जाना है तो चली जाओ भोज में। मैं थका हुआ हूं, भात खाकर सो जाऊंगा। लेकिन रात को देर हो गई तो मामी के यहां ही सो जाना।’ वे बेझिझक कह देते हैं।

      ‘फिर दीपु क्या.........’

      ‘दीपु मेरे साथ सोएगा। फिर कुछ हुआ क्या?’

      फिर............फिर मेरे विश्वास  की मौत हो जाती है। मेरी कठोरता मर जाती है। मामी ! मामी !! मामी ......... मुझे चक्कर आ रहे हैं। फिर भी मामी के आंखो में विश्वास है-शौहर को खिला पिलाकर सुलाकर आएगी-ऐसा दृड़ विश्वास है। वे लोग शराब लेकर इंतजार कर रहे हैं। गलियों में बत्तियां भी बुझ चुकी हैं। लोगों का आना जाना भी कम हो गया है। मैं फिर..........मैं फिर जाने को तैयार हूं। फिर गुठी में भोज है। मेरा रक्त प्रवाह बढ़ जाता है। दम घुटा हुआ सा लगता है............. मैं जाऊं?.......फिर मैं कैसे पूछ सकती हूं? इसलिए मुझे लगता है सबसे अस्पष्ट मैं स्वयं हूं, दीपु के पिताजी नहीं, मैं ही वैसी औरत हूं जिसे समझा नहीं जा सकता -एक बत्तीस बरस की औरत श्रीमती सुभद्रा देवी मानन्धर !

 

दलिनः धरन जो ऊपरी मन्जिलको सहारा देता है।

भोजः खाने पीने लिए जमघट।

गुठीः कोआपरेटिभ जैसी संस्था जो चल-अचल संपत्ति पर चलती है।

सुब्बाः क्लर्क के समान पद सरकारी नौकरी में ।

ऐला, छोएलाः मांस के परिकार

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी

 

 

 


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