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आखिर मैं तेरा शौहर हूं निर्मला

--परशु प्रधान

फिर वही कमरा। वही शाम और वही शौहर। वे छोटी व सिकुड़ी आंखें। बेढङ्गा दबा हुआ नाक। सूअर जैसे खड़े बाल। दारू पीने से नीनी पड़ी छोटी-छोटी आंखों को लेकर कहता है - "तू अच्छी है निर्मला ?"

यह कोई घटना है या दूर्घटना? सपना है या सच? यथार्थ है या झूठ? वह खुद अपने आपमें सोच रही है- वह कहां है? क्यों है? कैसे है? कोई धूमिल सी यादें तरंगित होने जैसे,कोई सुखद सपना जैसे। वह अपने आप से पूछ रही होती है - 'यह क्या सामनेवाला बौना उसका शौहर है? क्या उससे ही दो बच्चे जनी है? क्या वह इतिहास के विरूपाक्ष जैसा कुरूप नहीं है? क्या वह उसीके सूखे होठों को चुमकर अबतक जी रही है? '

उसकी छोटी सी तन्द्रा भंग होती है। वह कठोर स्वर मे पूछ रहा है - "तू क्यों नहीं बोलती रे निर्मला? क्या तू अच्छी है?"

वह देखती है - उसकी आंकों में पश्चाताप की छोटी सी चिंगारी तक नहीं है। महीने भर तापता होनेपर यह क्या खाएगी, बच्चों को क्या खिलाएगी - कोई वास्ता नहीं।  सूअर की जैसी गुस्सैल आंकें लेकर पूछनेवाले को वह क्या जवाब देगी। उससे कुछ भी बोलने को जी नहीं करता। कोई बूरी सी गाली बक दूं - यह भी मन नहीं करता, यह नई बात तो थी नहीं। यह कोई दुर्घटना भी नहीं थी।

वह देखती है- यह सपना नहीं सच है। यह महीने के पूरे सात सौ किरायेवाला कमरा है वह भी बगैर बिजली व पानी के। हर तीन चार माह में शौहर की पगार को छोड़कर सब बढ़कर आते हैं- बिजली व पानी का किराय, दाल-चावल व तेल के भाव और फिर कमरे का किराया। हर महीने एक तारिख को मकान मालिक आकर चेतावनी दे जाता है- किराया ज्यादा दो नहीं तो कमरा खाली करो। हर छे महीने के सौ-सौ रूपये ज्यादा देती आई है वह इसी कमरे के लिए, जान की बाजी लगाकर।

"क्यों नाक भौं सिकोड़ती है रे? मैं भूखा हूं। पुलिस की पिटाई से बदन गल चुका है। कुछ गरम-वरम खिला।" यही उसकी शौहर की बोली है जो अफसरी अंदाज में फरमा रहा है।

"खाले को कुछ नहीं है।" सूखी आवाज में जवाब देती है वह।

"लाल चाय तो पिला सकती है?"

"क्यों नहीं बोलती रे? कह तो दिया मुझसे गुस्सा मत कर। जो भी करूं, हूं तो तेरा सौहर ही। तेरी दादी द्वारा पैर धो धो कर बनाया गया जमाई।" उसके आवाज में कोई नरमी नहीं है।

"चिनी खत्म हुए कई दिन बीत गए।" वह बेमन से बोली।

"तू झूठ बोलती है निर्मला। सुबह चाय के बगैर तेरी आँख नहीं खुलती, अबी मुझे पिलाने के लिए चिनी खत्म हो गई, है न?" वह स्पष्टीकरण देने लग जाता है- "क्लास खत्म कर के लौट रहा था। शाम होने को आई थी और फिर वर्षात् के लक्षण ते। वह लिफ्ट मांगने लगी। एक जवान लड़की, मुझे दया आ गई। जाना तो थानकोट तक ही लेकिन....। फिर तो...."

फिर तो लैंगवेज क्लास लेनेवाली वह चौदह पन्ध्रह बरस की लड़की लेकर उसका शौहर वीरगंज पहुंच गया था। निर्मला को क्या मालूम वीरगंज कितना दूर है? किराया कितना लगता है? वह जब हिम्मत करके टिकट लेने बसस्टाप पर पहुंची तो गांव का दूर के रिश्ते का भाइ मिला था। वही उससे पूछ बैठा था कि दो दो बच्चे लेकर वह कहां और क्यों जा रही है? पहले पहल वह जवाब देने से इन्कार करने लगी क्योंकि वह नहीं चाहती थी शौहर के भाग जाने की बात इस भाई को मालूम पड़े व थोड़ी सी इज्जत जो बची थी वह भी चली जाए। परन्तु पलक झपकते ही उसकी इज्जत धूल में मिल गई, जब उसे मालूम हुआ उसके पास वीरगंज  में ठहरने व खाने के लिए तो दूर टिकट के लिए भी पैसे नहीं है।

वह दूर के रिशेते का भाई बिलकुल अपने भाइ की तरह पूछने लगा था ः "वीरगंज क्यों जा रही हो दीदी? वहां तुम्हारा कौन है? फिर ये दोनो भांजे भांजियां?"

अस सवाल का जवाब निर्मला के पास नहीं था। वह सबके सामने खुल चुकी थी। उसकी आँखों में न चाहते हुए भी आंसूं भर आए - "काम तो कुछ नहीं...।"

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"फिर तो लड़की तुम्हें पकड़कर वीरगंज ले गई क्यों ?"

"हां वही तो, चला तो ता थानकोट पहुंचाने लेकिन देखो न पहुंच गए वीरगंज। कैसे पहुंचे? सच कहूं निर्मला मुझे कुछ महीं मालूम उसकी देह की सुगन्ध ने मुझे बेहोश ही कर दिया था। सचिव की लड़की थी वह। थोड़ी दूर चलें... और थोड़ी दूर ....कहते कहते ......." इसके आगे छिरिह की बोलती बंद हो गई।
पास ही के होटल से एक गर्म चाय आ पहुंछी है वह भी दूसरे दिन पैसे देने की शर्त में और वह गंभीर मुद्रा में चाय पी रहा है। "मैं भी चाय पिऊं मा?" बेटा वातावरण को बोझिल कर देता है। "मैं भी, ......" बेटी उसके ऊपर भार थोपती है।

निर्मला की आँखों में, मायके के भाई का साया आ बसता है जो अभी थोड़ी देर बाद इसी कमरे में आ पहुंचेगा, जिसने बसस्टाप से उसे लौटाकर इसी कमरे में ला छोड़ा था और जो थोड़ी सी जीने की आशा बांटकर गया था।

फिर तो दूसरे दिन से ही निर्मला इस महानगर में उसी भाई के साथ नौकरी के लिए दर बदर भटकी थी। शहर की हर गली को उसने नापा था। अपने-पहचाने, अनजाने, नाम सुने अनसुने लोगों को अपनी दुःख भरी कहानी कह सुनाई थी- " शौहर को गए हुए महिना भर होने को है। कुछ अता पता नहीं है। दो बच्चे हैं। सात आठ सौ तो कमरे का किराया ही है ऊपर से बिजली पानी जोड़ने पर तो हजार तो गए ही। साथ में दो पैसे भी नहीं, कोई छोटा मोटा काम...............।"

"छोटा मोटा जानती हो?"

"नहीं। सिखने का मौका ही नहीं मिला।"

"अङ्ग्रेजी बोलना जानती हो?"

"नहीं। बोर्डिंग स्कूल में भी नहीं पढ़ पाई।"

"छोटा मोटा हिसाब किताब तो रखती ही होगी?"

"बच्चों की रेख देख कर सकोगी?"

"बच्चे तो अपने भी हैं..........."

कोई छोटे मोटे काम के सिवा उसके लिए कुछ भी नहीं था। गांव के साधारण से स्कूल में पांच छह जमात पढ़कर आई थी वह। अपने ही स्कूल के मास्टर छिरिङ ने उसे कहां आगे पढ़ दिया? पहाड़ों में रेल व मोटर तो थे नहीं, मोटर साईकिलें भी नहीं थी। लेकिन छिरिङ ने रातोंरात बहुत से पहाड़ व नदियां पार करवाकर उसे अपने साथ लाया था और वह इस तरह शहर में आ गई थी। महीने-महीने भर नौकरी ढूंढ़ते ढूढ़ते निर्मता के पैर गल चुके थे, हाथों की ताकत गुम चुकी थी। वह हताश व निराश हो चली थी।

गांव के भाई का ही कमोबेस सहारा था। एक रात वही भाई ने उसीके साथ रातका खाना खाया था और बातों बातों में उसकी आखिरी बस भी छूट गई थी। वह उसीके कमरे मे सोया था- ठीक वैसे ही जैसे छिरिङ सोता था। उसने वही काम किया जिसका अधिकार सिर्फ छिरिङ को था। वह उस दूर के रिश्ते के भाई को उतनी दूर पैदल चले जाने के लिए भी नहीं कह सकी थी। छिरिङ की छोटी व सिकुड़ी आँखें लम्बी और बड़ी आँखों में बदल गई थीं। सूअर के जैसे कड़े बाल मुलायम और कर्लिङ बन गए थे। यह सब सपने जैसा था- वह आधी रात को आया था उसके कमरे में और मैं ही हूं छिरिङ क्या फर्क पड़ता है बोला था। वह हां भी नही कह सकी और ना भी नहीं कर पाई थी। सपने में एक फूल का पेड़ उखड़ जाने जैसा लगा था, एक तालाब में तैरने जैसा लगा था। कहीं रंग था, कहीं बादल थे, कहीं कुहरा था तो कहीं बाढ़ थी, कहीं प्रलय था। वह होश में थी और बेहोश भी थी।

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"उसी लड़की के पैसों में पन्ध्रह बीसरोज वीरगंज के होटल में ठहरे। वीरगंज गर्मी के बावजूद अच्छी जगह है। उसके बाद वह बोली कि यहां हमारे मामा रहते हैं चलो। वहां जाना ता कि बस्.......।" बदन भर उसके बूट के नीले निसान थे। "इतनी लातें व मुक्के बरसे की बस, तीन जन्मों तक याद रहेंगे। और भी नकली मुकदमे बनाकर ठूंस सकते है।"

"मुझे क्या मतलब....... मेरे लिए तो तुम मर चुके हो।"

"क्रियाकर्म खत्म किया ? सफेद कपड़े तो नहीं हैं तेर बदन पर ?"

"तुम्हारा क्रिया कर्म तो मेरे अन्दर है छिरिङ। बाहर के सफेद कपड़े का क्या मतलब ?"

"अब ज्यादा गुस्सा मत कर। जो होना था सो हो गया। तेरे गुस्सा करने से वह घटना मिट तो नहीं जाएगी।" छिरिङ थोड़ा सामान्य हो रहा था।

यह घटना भी तो मिटनेवाली नहीं है। सारे शहर में निर्मला अकेली थी, पानी  में ऊठे लहर जैसे अकेली थी। फिर उसको अकेलेपन में गांव के उस भाई ने साथ दिया था। एक दिन उसने एक बहादुर पुरूष को कमरे में ही ला खड़ा कर दिया था जो नौकरी भी दिलवा सकता था।

"तुम्हें नौकरी निर्मला ......... एक ही मिनट में...... कहां तक पढ़ी हो ?

"गांव में भी कोई पढ़ता है क्या ?"

"नौकरी के लिए पढाई जरूरी है क्या ? अपने लोग चाहिए निर्मला यानि के मेरे जैसे लोग, समझीं तुम? सारे सचिव व डायरेक्टर मैंने ही रखे है.....कहूं तो। जहां कहोगी एक फोन कर दूंगा..... तुम्हारी नौकरी पक्की।"

"मुझे बड़ी नौकरी तो नहीं चाहिए। बस् इन बच्चों को पाल सकूं और अपना गुजारा कर सकूं.....।"

"हां हां मैं समझता हूं तुम्हारी बात को। महिलाओं की समस्याएं समझकर ही उन्हीं के उत्थान के लिए हमने गठन किया है महिलाओं की सर्वाङ्गीण विकाश बोर्ड । काफी विदेशी सहयोग प्राप्त है हमें.....। तुम उसी में रिसेप्सनिस्ट बन जाओ।"

निर्मला को लगा था - यही एक देश का बड़ा आदमी है। इतना बड़ा आदमी पहचानकर मेरे यहां ले कर आनेवाला मेरा भाई.....। वह हैरान थी। उन आंखों में छिरिङ के रंग विरंगे सपने बदल चुके थे। रात बहुत हो गई थी और फिर वे दोनो कमरे में ही थे।दोनो अब छिरिङ की जगह ले रहे थे। कभी भाई छिरिङ बनता तो कभी नौकरी देनेवाला वह बहादुर पुरुष। निर्मला को छिरिघ सपने का झीना तार जैसा लगता- जिसमें न कोई स्वर हो न ही कोई आवाज। इस सत्य को भी उसने स्वीकार कर लिया था। ना नुकुर करते करते एक और कहानी लाल रंग में लिखी गई थी। एक महीने की पगार एक हजार रूपये बतौर पेशगी उसे मिल चुके थे। वही गांव का भाई उसका सुखदुख का साथी बना हुआ था। कुछ ही दिनों में नौकरी का सपना टूट चूका था व अरब जाने का सपना अंकुरित होने लगा था।

"अभी पासपोर्ट बनवाओ। उसके लिए रकम  मैं दे रहा हूं। शौहर ने तुम्हें छोड़ा तो क्या हुआ ? हम लोग गर गए हैं क्या ? हामारा धर्म मर गया है क्या ? अब अरब जओ और ढेर सारे पैसे कमाकर  लौटो, निर्मला। ऐसे अनेकन् शौहर तुम्हें ढूंढते हुए आ धमकेंगे।" एक ऊँचा काला दलाल उसे किसी गुप्त कार्यालय में बता रहा था।

"यो बच्चे मैं कहां छोड़कर जाऊँ ? फिर वहां काम क्या करना है ?" उसने पूछा छ।

"इन बच्चों को बोर्डिंग में रखना होगा। हर महीने चेक भेज दिया करना काम चल जाएगा। पैसे होंगे तो सबकुछ संभव हे निर्मला ! तुम से आनेजाने भर का किराय लूंगा। वह भी  अभी मैं ही दिए देता हूं।" चेहरे से काला मगर देवता समान वह आदमी बोल रहा था।

अपना देस अपने लिए ही वीरान हो गया था। अपना शौहर दुश्मन बन बैठा था। निर्मला ने सारे रूपए जमा करके पासपोर्ट बनवाया था और टिकट का इन्तजार करने लगी थी। नजदीकी बोर्डिंग स्कूल में बच्चों को रखने का इन्तजाम भी कर लिया था उसने।

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"मुझे नींद आ रही है निर्मला ! बिछौना ठीक कर दो।" यह उसके अपने शौहर की आवाज थी जो लड़ाई हारकर बहुत थका हुआ लौट पड़ा था तब।

वह इस शौहर को चाहकर भी प्यार नहीं कर सकती थी। उसे दहाडे़ मारकर रोने को जी कर रहा था। बिते हुए एक महीने के घटनाक्रम फिल्म के दृश्यों के ती तरह उसके दिमाग में चक्कर लगा रहे थे। इन सब को निरर्थक बनाकर वह उठना चाहती थी पर पता नहीं क्यों, नहीं कर पा रही थी। कहीं उसका बदन चिपका हुआ था। वह उठना चाहकर भी नहीं उठ पा रही थी।

अरब जाने और पैसे कमाने का सपना भी कुछ दिनों में ही टूट चूका था। टिकट आया कि नहीं यह पता करने को जब गई थी तो न वहां विदेश भेजनेवाले का साइनबोर्ड था न रिवाल्वींग चेयर पर बैठनेवाला वह मोटा आदमी। वह ऑफिस तो श्पेशल मोमो दुकान में बदल चूका ता। एक दो दिन के अंतराल में साइनबोर्ड व आदमी को गायब पा कर निर्मला समझ गई थी- ऑफिस तक गायब होनेवाले इस शहर में शौहर का गायब होना एक मामूली सी बात थी। लेकिन दो वक्त की रोटी की समस्या और जटिल बन रही थी। वह क्या कर सकती है ? समाज में पैर कैसे टिका सकती है ? वह बराबर सोचा करती थी। पर दिमाग था एकदम शून्य। हर काम के लिए कुछ रूपए निवेश करने होते थे। उसके पास रूपये तो थे नहीं, नही रूपये उधार देनेवाले सहयोगी थे। उसके पास एक ही रास्ता था- खुद व बच्चों को खत्म कर देना और इस दुनियां से बिदा हो जाना। पर इसके लिए भी निश्चय और साहस नहीं जुटा पाई थी। फिर तो गांव का भाई और उसके 'सर'लोग ही निर्मला के अपने थे। जैसे भी हो जीते जाना, कमजोर बने पत्थर की तरह।

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"क्यों नहीं बोलती रे ? एक महीने में ही गूंगी हो गई क्या ? कह तो दिया आतदमी कभी कभार बिगड़ जाता है। मैं भी बिगड़ गया तो क्या आसमान टूट पड़ा ? तू क्यों एकबार मुझे माफ नहीं कर सकती रे ?" छिरिङ की सिर्फ आवाज कमरे भर है, और कुछ नहीं। बाहर सड़कों में बाहनों की आवाज भी कम हो रही है। शहर सोने की तैयारी में है।

"तुम क्यों लौट आए ?" अनचाहे ही पूछती है वह।

"तेरा और बच्चों का चेहरा यादकर लौट आया हूं। पुलिसवालों ने कितना पीटा मुझे, सारा बदन बुरी तरह दर्द कर रहा है।" वह हमदर्दी लेना चाह रहा था फिर बात पलटकर बोला - "अपने को नींद सता रही है और तुझे..........।"

"............................................।"

"तू क्यों नहीं बोलती रे ?"

"तुम नहीं लौटते तो अच्छा होता.....मैं बच्चों के साथ जीने के काबिल बन गई थी।"

"और क्या बक रही है रे तू ?"

"तुमने सुना नहीं......."

"मै तो तेरे और इन बच्चों के लिए ही जेल से लौट कर आया हूं और तू है की अपने को क्या समझ रही है ? हां ?" छिरिङ आपा खो रहा है.

"तुम्हारे न होने पर ही मुजे अच्छा होता छिरिङ, कहां कैसे जीना हे मैं जान गई हूं। फिर मुझे क्यों सता रहे हो ?" आहिस्ता से बोलती है निर्मला। वतावरण स्तब्ध है।

"आखिर मैं तेरा शौहर हूं निर्मला................।" गंभीर बनता है छिरिङ।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी


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