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आज सोमवार है
इडा याद करने लगी कि आज कौन सा दिन है,
टिवी के मनोरंजक दृश्यों से लग रहा था आज रविवार है।
अच्छा सा रविवार है, फिर उसे लगा।आज सोमवार है और
हेरेश से मिलना है। हेरेश की याद आते ही इडा को सोमवार
से ही बोरियत सी होने लगी। कितना पियक्कड़ है हेरेश,
रातभर ह्विस्की की कितनी ही बोतलें खाली करता है। और
फिर बातें करता है जमीन आसमान की। जैसे सारी रात उसी
की है और किसी की तो है ही नहीं। जैसे फिर वह
विद्यार्थी न हो कर किसी रईस का इकलौता वारिश हो। जैसे
उसके साथ डॉलर की बोरियां हो। उसका बहुत अच्छा बैंक
बैलेंश हो। वह बोरियत से खुसुर-फुसुर करता है - 'इडा !
मैं इस सेमिस्टर के बाद यहां नहीं रहनेवाला। कितना
छोटा और तंग है यह शहर। शायद न्यूयार्क नहीं तो
वाशिंगटन डी सी जाऊंगा। वहां से डॉक्टरेट भी आसानी से
किया जा सकता है। ' पर अपनी बुद्धि और ज्ञान से बहुत
परे था वह।
इडा कमरे को निहारती है। दिवाल में
पुता हुआ पीला रंग कितना ज्यादा पीला है। इडा को सख्त
पीले रंग से चीड़ है। ज्यादा नमक, ज्यादा
चिनी..........उफ् कितना बोर.........।कमरे का पर्दा
भी उतना ही पुराना। परदे की आड़ी धारियां इडा को कैसे
डराती हैं, मानो वे धारियां सांप की फणा बनकर उठती
हों। कभी कभी रातों में वह डर जाती है व चिल्लाती भी
है। इडा को अब पूरी समझ आ गयी
–
आज सोमवार है, पक्का सोमवार ही है।
हां आज सोमवार ही है,
और आज की रात एक बलिष्ठ हेरेश के नाम है। महीने में
चार सोमवार की रातों को हेरेश का साथ दिने पर इडा
निर्णय करती है
–
हेरेश।के साथ हुए सम्झौते को रद्द कर देगी। हेरेश से
स्पष्ट कह देगी 'मुझे भी तो एक दिन की फुरसत चाहिए
हेरेश। तुम और कोई गर्लफ्रेंड ढूंढो और मुझे छुट्टी
दो।
'तुम्हें छुट्टी दूं इडा ! नामुमकिन।
बिलकुल असंभव। बल्कि तुम्हारे डॉलर बड़वाने हैं तो
निसंकोच कहो ! मै तो तैयार ही हूं न ?'
'ऐसा नहीं है हेरेश ! बहुत
वर्षों
से स्वास्थ्य ठीक नहीं है। लगता है यह काम अब छोड़
दूं। लेकिन परिस्थितियां।विवशताएं भी कुछ होती हैं
हेरेश। मैं कर नहीं पा रही हूं। लेकिन छोड़ने का
प्रयास जरूर करूंगी।' इडा उसे समझाने की कोशिस करती
है। कभी कभी देर होने पर हेरेश स्वयं ही गाड़ी लेकर
उसे लेने आ पहुंचता था। फिर लगातार कॉलबेल बजाता था।
क्या करती वह ?।खुद दरवाजा खोलने को विवश हो जाती और
वही एक किस्म के दुर्गन्ध के साथ रात बिताने को बाध्य
हो जाती।
टेलिफोन की घंटी बजने लगी। रिसीवर
उठाने को मन नहीं करता। संभव है हेरेश कहता हो- आज दश
बजते ही मेरे यहां आ जाओ इडा। मैंने दो चार केन बीयर
ठीक कर रखे हैं। क्यों न दिन भर अपने आपको बीयर से बदल
दें। फिर टेलिफोन की घंटी बन्द होने का नाम ले रही।
इडा रिसीवर उठाती है। सौभाग्य से रांग नम्बर है। वह
घड़ी की तरफ नजर डालती है। दश बजने को है। शाम का
अपाइंटमेन्ट सारा दिन खराब कर देता है। अन्य दिनों में
उसे ऐसा महसूस नहीं होता रविवार जॉन्स के यहां,
मंगलबार रॉबर्ट के यहां। फिर शुक्रवार
ज्याक्सन के यहां। सबसे अच्छा तो शुक्रवार ही है। एक
तो वीकइंड ऊपर से खुशमिजाज ज्याक्सन। ज्याक्सन का
व्यक्तित्व ही कितना मनमोहक व प्रभावशाली है। जिसे
हेरेश से किसी भी अंश में तुलना नहीं किया जा सकता।
ज्याक्सन का नाम याद आते ही इडा की निरूत्साहित
इच्छाएं जाग ऊठी। पोखर में कहीं नयी मछलियां कुलबुलाई
सी लगती हैं। अब इडा को बहुत दूर अपने घर की याद सता
रही है।।जहां पिताजी की चिट्ठियों के हरफों को याद
करते ही इडा को कुछ भी अच्छा नहीं लगता - तुझे घर की
फिक्र करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ अपनी स्वास्थ्य
खयाल कर। तेरी जॉब क्या है व कॉलेज में पढाई कैसी चल
रही है ?
हमें कुछ मालूम नहीं, जिससे हम
दुविधाग्रस्त हैं - इडा अनुभव करती है ये हरफें बढ़
रही हैं या बढी हो रही हैं। उसे लगता है इन्ही हरफों
के तले दब कर कहीं वह अकाल ही मर न जाए। इडा क्या जॉब
करती है इस छोटे से शहर में ? उसके जॉब को किस तरह से
परिभाषित किया जाए ? इडा को मालूम नहीं। वह कह भी नहीं
सकती।इडा इस शहर में क्या करती है व कैसे जी रही है ?
उसे लगता है वह जी रही है निरूद्देश्य, अर्थविहीन जीवन
व प्रयोजनहीन जीवन।
आज दिन भर का काम याद करने लगी इडा।
सारे अपाइंटमेन्ट व काम बूलकर दिन यूं फिसलजाता है।
फिर आती है काली रात-वही हेरेश की रात। वह घबरा जाती
है, हेरेश की रात से। उसने हेरेश को सलाह न दी हो ऐसा
नहीं है - ‘हेरेश तुम किसी से शादी क्यों नहीं कर लेते
? 35 बरस की उमर क्या छोटी है ? अब सिर्फ 5 बरस हैं
हेरेश, तुम अपना जीवन साथी ढूंढो
! तुम तो 17-18 के किशोर लगते हो, कुछ तो कहो,
क्यों गुस्सा करते हो ?’
‘तुम गलत हो इडा
! अभी शादी करके मैं क्या बूढा हो जाऊं
? क्या तुम मुझे बूढा देखना चाहोगी ? क्या है शादी में
? एक साधारण सत्य जिसे स्वीकार भी किया जा सकता है,
अस्वीकार भी।’ हेरेश हर बात को हंसी में टाल देता।
इधर इडाको हर सोमवार को शरीर भारी
पड़ता है। मितली सी होती है। कमरा घुम रहा सा प्रतीत
होता है। बहुत महिनों से सम्हाले हुए निर्णयको उगलने
को मन करता है - ‘मैं आज नहीं आऊंगी हेरेश। मुझे माफ
करना।’
वह पूछ सकता है ‘सिर्फ मेरे यहां नहीं
आओगी या जॉब ही छोड़ दोगी ?’
‘पहली बात तो तुम्हारे यहां नहीं
आऊंगी। जॉब छोड़ने के बारे में अभी नहीं सोचा है।’
‘यह सिर्फ तुम्हारा विचार है इडा,
निर्णय नहीं। अभी क्या वजह है निराश होने की ?’ हेरेश
फिर हंसी में ही टाल देता है। इडा के हृदय के शूलों को
उसने कभी समझने की कोशिश ही नहीं की, न ही तैयार है।
हर किस्म के लोगों से व्यवहार करना
सचमुच ही मुशकिल काम है। यह सिर्फ।नादानी है, अपने
आपको खत्म करना। हर पुरुष के प्यार करने व चाहत रखने
का एक समय होता है। जब वह व़क्त गुजर जाता है या यूं
कहें जब किनारा टूट जाता है तो फिर कुछ नहीं होने
वाला। आकाश में हवाईजहाज निरन्तर उड़ रहे हैं। किसी भी
हवाईजहाज ने अब तक इडा को कहीं उड़ाकर दूर नहीं फेंका।
किसी जहाज ने भ्रमण के लिए कहीं नहीं बहाया। कितना
छोटा है उसका बैंक बैंलेंस। हर महीने उसे बढ़ाने का
संकल्प भी जॉब छोड़ने जैसा हास्यास्पद हो गया है। कभी
कास्मेटिक्स का हाहाकार तो कभी कपड़ों की जीद। कभी
दबाइयां सारे बज़ट को तोड़मरोड़ देती हैं। फिर कमरे के
एक कोने में बीयर के एक बोतल को खोलकर सारे सत्य को
भूल जाना अच्छा लगता है इडा को। लोगों के मुखड़ों को
कहीं दूर फेंक देने को जी करता है।
अपना घर है कहीं दूर, प्यार करने वाले
मा बाप हैं - इस बात को भूलकर एकाकी सोचने को जी करता
है उसका। मगर सप्ताह के पुरे दिनों से बंधी हुई है वह।
वे दिन उसकी जिन्दगी को रुटीन बनाये हुए हैं। यह रूटीन
जिन्दगी। दिवाल पर टंगा है यह जिन्दगी का रूटीन,
इम्तहान के रुटीन माफिकः
रविवार- जॉन्स
सोमवार- हेरेश
मंगलवार- रॉबर्ट
बुधवार- ग्रीन
गुरुवार- जेम्स
शुक्रवार -ज्याक्सन
शनिवार- सिल
क्यों बाहर नहीं निकल सकती इस बाड़े से
इडा ?
ब्रेकफास्ट का समय खत्म हो चला है और
लन्च के लिए नजदीकी ड्रग हाउस तक जाना जरूरी है। फिर
माथे पर सोमवार घुसकर उसे भारी बना डालता है। हेरेश का
रुखा व्यवहार।आकर उसको ठण्डा बना डालता है। कास अबी
फोन करके मैं बिमार हूं नहीं आ सकती, कह सकती पर बहुत
जिद्दी है वह।।हफ्ते मां एक वार ही तो है मैं तो नहीं
मानता बोलके गाड़ी लेकर आ धमका तो ? फिर फोन करने का
कोई मतलब नहीं। दश सेन्ट खर्च करने का कोई औचित्य
नहीं। इडा खुद से निस्पृह सी हो जाती है। कैसे काटेगी
यह लम्बा दिन ? पार्क तक जाएं ? उधर बी खर्चा ही है।
कमरे के बाहर कदम रखते ही डॉलरों के पग बनाते हुए चलना
पड़ता है। दिन पर दिन भाव आसमान छू रहे हैं। इस बड़ती
महंगाई में जीना दूभर।हो गया है। कमरे में ही झूलकर
कितना वक्त काटा जा सकता है ? यह शहर भी सठिया गया है।
इडा।जाएगी कहां ? कौन सी जगह बाकी है ? सेन्ट्रल पार्क
में भी कितना झूला जाए ? दर्जनों आदमीयों के दर्जनों
सवाल, जवाब देते देते परेशान। जिधर देखो आलमियों की
भीड़। ऐसी झल्लाहट किसी दिन नहीं होती, बगैर सोमवार
के। नीरश सोमवार।
लन्च का वक्त भी खत्म हो चला है। इडाको
भूख नहीं है। गाड़ी लेकर निरुद्देश्य चलूं तो कितनी
देर चलूं ? कितनी दूर चलूं ? किस हाईवे तक पहूंचकर
लौटूं ? जिधर देखो सड़कों के जाल बिछे हुए लगते हैं।
कौन सा रास्ता उसे कितनी देर तक कहां तक ले जा सकता है
? कहीं कोई दुर्घटना हो गयी तो ? कहीं कोई संभावना
नहीं दिखती सिवाय रात का इन्तजार करने के दिल को मोम
सा पिघलाकर। बाहर जाऊं ? फिर मन को सपनों के नंगे तार
छु रहे हैं। इडा।फोन लगाती है। उधर हेरेश ही है। वह
बोल भी न पाई थी की उघर से हेरेश की आवाज उसको हिलाकर
रख गेती है - ‘फुरसत हो तो अभी आ जाओ इडा, क्यों शामका
इन्तजार करती हो ? मैं तुम्हारे ही लिए बगैर कॉलेज गए
बैठा हूं। तुम अभी आओ।’
‘मेरी तबीयत आज.............।’
फोन में बात को बीच में ही टोककर बोलने
की आवाज आती है - ‘अकेले।रहने से कैसे तबीयत अच्छी
रहेगी ? इघर आ जाओ सब ठीक हो जाएगा। नाइट क्लब भी जाना
है न थोड़ी देर के लिए......।’
‘कह तो रही हूं .... मेरी तबीयत ठीक
नहीं...........।’
‘नो नो तुरन्त आ जाओ।’ हेरेश फोन काट
देता है। अब इडा सोच रही है, इस शहर से उसे मुक्ति
नहीं है। इस सोमवार से भा उसकी मुक्ति नहीं है। उसे न
चाहते हुए भी जीना है। उसके न चाहने से भी सोमवार आ ही
जाता है। न चाहते हुए ही उसे हेरेश के साथ रात बितानी
है। हेरेश ! हेरेश !! हेरेश !!! इडा बाथरुम में घुस
जाती है।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |