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अक्षर और चेहरा

                        --भीष्म उप्रेती

 

अक्षरका अपना चेहरा नहीं है

पर मैं अपना चेहरा देखता हूँ

अक्षर में ।

 

अक्षर मेरे सारे दम्भों को थप्पड़ मारता है ।

मेरी भलमानसी हँस देती है

एक एक करके उतरते है मेरे अभिमान

और नंगा करके मुझे कहता है - ‘यह तुम हो।’

 

अक्षर मुझे गूँथता है और बिखेरता है

आहिस्ता आहिस्ता थपथपाता है और अनुभूति करवाता है

संप्राप्ति के संग

कमजोरी के संग

और फिर मुझे सिखाता है निर्मल बनना ।

 

अक्षर के साथ अनुभव है

सत्य है

ढोंग काटने का हथियार है

उसका अपना आकार भी है ।

 

बस् अक्षर का अपना चेहरा नहीं है

पर मैं अपना चेहरा देखता हूँ

अक्षर में ।

 

मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी.


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